Saturday, 23 November 2024

हरियाणा के बाद महाराष्ट्र में भाजपा की जीत से हिन्दू ध्रुवीकरण और तेज होगा

 

महाराष्ट्र और झारखंड दोनों के चुनाव परिणाम लगभग तय हो चुके हैं। महाराष्ट्र में भाजपा, एकनाथ शिंदे और अजीत पवार की महायुति ने लोकसभा चुनाव में लगे झटके से उबरकर ऐतिहासिक बहुमत हासिल कर लिया है। इस राज्य में कांग्रेस  तो चारों खाने चित्त हुई ही शरद पवार और उद्धव ठाकरे की राजनीतिक यात्रा पर भी पूर्ण विराम लग गया। 200 से अधिक सीटों पर महायुति जीतने जा रही है। भाजपा, शिंदे और अजीत तीनों ने धमाकेदार प्रदर्शन करते हुए महा विकास अगाड़ी के सारे दावों की हवा निकाल दी। महाराष्ट्र में इस चुनाव जितनी कशमकश शायद ही पहले कभी दिखी हो। दोनों गठबंधनों ने पूरा जोर लगाया। भाजपा और कांग्रेस के अलावा शिवसेना और रांकापा के विभाजित धड़े दोनों गठबंधनों में बँटे हुए थे। इस चुनाव में ये तय होना था कि असली शिवसेना और राकांपा कौन सी है। एकनाथ शिंदे और अजीत पवार के भाजपा के साथ जुड़ने के बाद ये कहा जा रहा था कि सहानुभूति क्रमशः उद्धव ठाकरे और शरद पवार के पक्ष में है। लोकसभा चुनाव परिणाम ने उस अवधारणा की पुष्टि भी की । लेकिन उसमें शिंदे गुट का प्रदर्शन संतोषजनक रहा जबकि अजीत खेमा कमजोर पड़ा। इसीलिए विधानसभा चुनाव में उसे महायुति की सबसे कमजोर कड़ी कहा जा रहा था। लेकिन भाजपा ने तो जबरदस्त प्रदर्शन किया ही शिंदे की शिवसेना और अजीत की राकांपा ने भी उम्मीद से ज्यादा सीटें जीतकर साबित कर दिया कि अब उनकी पार्टी ही असली है। राकांपा के संस्थापक शरद पवार के जीवन के आखिरी पड़ाव में उसी राजनीतिक दांव से चित्त हुए जिसके बल पर वे महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे बड़े रणनीतिकार माने जाते थे। बाला साहेब ठाकरे के पुत्र को कांग्रेस के साथ बिठा देना उन्हीं के बस की बात थी। इस चुनाव में श्री पवार ने बहुत कुछ खोया किंतु उनको ये संतोष रहेगा कि उनके किले पर फहराने वाला झण्डा अभी भी किसी पवार का ही होगा जबकि उद्धव ठाकरे अपने पिता के उत्तराधिकारी बनने के बाद उनकी विरासत को सहेजकर नहीं रख सके। आज उनकी स्थिति न खुदा ही मिला न विसाले सनम, न इधर के रहे न उधर के रहे  वाली होकर रह गई। मुसलमान उनको घास नहीं डालेंगे और हिंदुओं  से वे  खुद दूर हो गए। महाराष्ट्र के इन नतीजों को म.प्र की तर्ज पर शुरू की गई लाड़की बहन योजना का कमाल कहा जा रहा है जो काफी हद तक सही भी है किंतु बंटेंगे तो कटेंगे और एक रहेंगे तो सेफ रहेंगे जैसे नारे ने भी हिन्दू मतदाताओं को गोलबंद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लोकसभा चुनाव में आरक्षण के मुद्दे पर विपक्ष द्वारा किये गए प्रचार ने दलित और पिछड़े वर्ग को भाजपा के विरुद्ध खड़ा करने का काम किया था किंतु भाजपा ने रास्वसंघ की मदद से उन वर्गों का मत दोबारा हासिल कर लिया। मुस्लिम धर्मगुरुओं ने जिस प्रकार खुलकर महा विकास अगाड़ी के पक्ष में प्रचार किया उसने भी महायुति के पक्ष में हिन्दू ध्रुवीकरण करने में मदद की। महाराष्ट्र की ये जीत भाजपा के लिए जबरदस्त उत्साहवर्धक है। राजनीतिक  दृष्टि से दूसरे सबसे बड़े राज्य में सत्ता पर काबिज रहने का असर राष्ट्रव्यापी होगा। शरद पवार और उद्धव ठाकरे की शिकस्त से विपक्ष की राजनीति में खालीपन आ जायेगा। इंडिया  गठबंधन में कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती मिलेगी। हरियाणा  के तुरंत बाद महाराष्ट्र की बड़ी हार से राहुल गाँधी की नेतृत्व क्षमता  फिर से सवालों के घेरे में आ गई। उन पर चुनाव प्रचार ठीक से नहीं करने का आरोप भी लगा। कहते हैं उन्होंने ज्यादा समय वायनाड में प्रियंका वाड्रा को जिताने में लगाया। दूसरी तरफ झारखंड में हेमंत सोरेन  अपनी सरकार बचाने में कामयाब हो गए दिखते हैं। उनकी इस जीत में महिलाओं को प्रति माह दी जा रही धनराशि का योगदान पूरी तरह अपेक्षित था। बची - खुची कसर हेमंत के जेल जाने से संथाल समुदाय में उपजी नाराजगी ने पूरी कर दी। लेकिन झारखंड में भाजपा ने अपने स्थापित नेताओं को कमजोर करने की जो गलती की उसका दुष्परिणाम उसे भोगना पड़ा। हालांकि झारखंड छोटा सा राज्य है किंतु उसके नतीजे आगामी वर्ष होने वाले बिहार के चुनाव को प्रभावित करेंगे। लगातार दूसरी बार सरकार बनाने के बाद हेमंत आदिवासी समुदाय में बतौर नेता मजबूती से अपना प्रभाव जमाने में कामयाब हो  गए हैं। अभी तक ये गौरव उनके पिता शिबू सोरेन को हासिल रहा। भाजपा ने बाबूलाल मरांडी को प्रदेश अध्यक्ष तो बना दिया किंतु मुख्यमंत्री के तौर पर पेश नहीं करने की गलती कर दी। काँग्रेस के लिए प्रियंका की जीत खुश होने का कारण हो सकती है किंतु देश भर में हुए उपचुनावों के जो परिणाम आये उनमें उसका प्रदर्शन बेहद निरशाजनक रहा। आगामी दो वर्षों में जिन राज्यों में चुनाव होंगे उनमें कांग्रेस केवल केरल में मुकाबले में है। भाजपा ने उ.प्र , म.प्र और राजस्थान में उपचुनावों में अच्छा प्रदर्शन कर अपना आत्मविश्वास साबित कर दिया। विशेष रूप से उ.प्र में योगी सरकार ने उपचुनाव जीतकर अपना दबदबा कायम रखा। इन चुनावों की विस्तृत समीक्षा तो कई दिन चलेगी किंतु आज का दिन भाजपा को बल्ले - बल्ले और कांग्रेस के लिए मुँह छिपाने का है। लोकसभा में मिली 99 सीटों को लेकर उसको जो खुशी मिली वह हरियाणा और महाराष्ट्र ने फीकी कर दी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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