बात 3 साल पुरानी है। म.प्र की राजधानी भोपाल के हमीदिया मेडिकल कालेज के शिशु रोग वार्ड में आग लगने से 4 नौनिहालों की दर्दनाक मौत ने इस अस्पताल की व्यवस्था की पोल खोल दी। उल्लेखनीय है यहाँ अति विशिष्ट लोगों की चिकित्सा भी होती है। चूंकि बात राजधानी की थी लिहाजा शासन - प्रशासन सब चुस्त - दुरुस्त हो गए। तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने फरमान जारी कर दिया कि प्रदेश भर के अस्पतालों और ऊँची इमारतों में आग बुझाने के प्रबंधों की जाँच के बाद उपयुक्त इंतजाम न होने पर कड़ी कारवाई की जाए। फिर क्या था पूरे प्रदेश में फायर ऑडिट नामक मुहिम चल पड़ी। स्थानीय निकायों के अग्निशमन विभाग द्वारा अस्पतालों, ऊँची इमारतों और होटलों सहित व्यवसायिक परिसरों को आग बुझाने के पुख्ता प्रबंध होने का अनापत्ति प्रमाण पत्र दिया जाता है। इसमें लापरवाही के चलते ही इस तरह की दुर्घटनाएं होती हैं। लेकिन इसे विडंबना ही कहना होगा कि उसी विभाग को फायर ऑडिट का जिम्मा दिया गया। कुछ दिनों तक तो पूरे प्रदेश में खूब हल्ला मचा किंतु कितने प्रतिष्ठानों अथवा भवनों पर अपर्याप्त अग्नि शमन व्यवस्था के चलते कारवाई हुई ये शायद ही कोई जानता होगा। 1997 में दिल्ली के एक सिनेमा हाॅल में आग लगने से भी बड़ी संख्या में मौतें हुईं थीं। इस तरह के हादसों के बाद सरकार और उसके मातहत चलने वाली व्यवस्था जिस प्रकार की उदासीनता दिखाती है वह किसी अपराध से कम नहीं है। मृतकों और घायलों को मुआवजा देकर लोगों के गुस्से पर पानी डालने का कर्मकांड होता है। राजनेता भी ऐसे अवसरों पर बनावटी आँसू बहाते दिख जाते हैं। हादसे के फ़ौरन बाद जनता के मन में उठा गुस्सा भी बुलबुले की तरह ही क्षणजीवी होता है। गत रात्रि उ.प्र के झाँसी शहर के मेडिकल कालेज में भी भोपाल के हमीदिया अस्पताल जैसा हादसा घट गया , जब शिशुओं के वार्ड में आग भड़कने से 10 नवजात बच्चे काल के गाल में समा गए। हालांकि वहाँ भर्ती काफी बच्चों को सुरक्षित निकाल लिया गया । राज्य के मुख्यमंत्री के निर्देश पर उपमुख्यमंत्री सरकारी अमले के साथ घटनास्थल पर पहुँच गए और त्रिस्तरीय जाँच की घोषणा कर दी। नियमानुसार मुआवजे का ऐलान भी हो गया। दोषियों को बख्शे नहीं जाने की हुंकार भी भरी जा रही है किंतु अव्यवस्थित व्यवस्था में सुधार करने की ईमानदार सोच के अभाव में किसी सकारात्मक परिणाम की उम्मीद करना बेमानी है। जिन नवजात शिशुओं का जीवन शुरू होते ही आग की लपटों में झुलस गया उनके माता - पिता और परिजनों को उक्त हादसा जो दर्दनाक यादें दे गया उनकी क्षतिपूर्ति कुछ लाख या करोड़ों रुपयों में संभव नहीं है। ये बात पूरी तरह सच है कि इस तरह की दुर्घटना को ऐसा कोई भी इंसान जान बूझकर अंजाम नहीं देता जिसके मन में थोड़ी सी भी मानवीयता है। लेकिन ये बात भी उतनी ही सच है कि उसके पीछे मानवीय लापरवाही अवश्य रहती है। यद्यपि ऐसे हादसे उन विकसित देशों में भी होते हैं जहाँ सब कुछ चाक - चौबंद होता है। लेकिन वहाँ इस बात की चिंता की जाती है कि उसकी पुनरावृत्ति न हो। साथ ही जो व्यक्ति उसके लिए जिम्मेदार पाया जाता है वह कितने भी बड़े ओहदे पर हो , दंड से नहीं बच सकता। उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ काफी सख्त प्रशासक माने जाते हैं। सरकारी अमले में उनका खौफ भी है। लेकिन जिस नौकरशाही के भरोसे सब कुछ छोड़ रखा जाता है वह अपनी जिम्मेदारी के पालन में कितनी ईमानदार है , इस प्रश्न का उत्तर अच्छे - अच्छों के पास नहीं है। और इसीलिए बड़े से बड़े हादसे कुछ दिन तक सुर्खियां बने रहने के बाद विस्मृतियों का शिकार हो जाते हैं। झांसी में हुई दुर्घटना के कारण तो जाँच के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे किंतु प्रारम्भिक पूछताछ में ही ये स्पष्ट हो गया है कि आग बुझाने वाले संयंत्र चले ही नहीं क्योंकि वे एक्सपायर हो चुके थे।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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