दुनिया जब अर्थव्यवस्था के बारे में जानती भी नहीं थी तब से भारत में दीपावली का त्यौहार मनाया जा रहा है । कालान्तर में इसके साथ पौराणिक प्रसंग जुड़ते चले गए | न सिर्फ सनातन धर्म के अनुयायियों अपितु जैन , बौद्ध , सिख सभी इस पर्व पर हर्षोल्लास से भर उठते हैं । ये कहना भी गलत न होगा कि दीपावली भारत का सबसे बड़ा लोक महोत्सव है । पूरे विश्व में फैले भारतवंशी इसका आयोजन पूरे उत्साह और उमंग से करते हैं | अब तो अमेरिका और ब्रिटेन तक में सरकारी तौर पर दीपावली का जलसा होने लगा है । इसका कारण वहां भारतीयों की बढ़ती संख्या ही नहीं बल्कि शैक्षणिक , आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में उनकी प्रभावशाली उपस्थिति है । वैसे अन्य भारतीय तीज – त्यौहारों की तरह दीपावली भी कृषि आधारित पर्व ही है | वर्षा ऋतु की विदाई के बाद नई फसल आते ही आर्थिक और धार्मिक गतिविधियाँ शुरू होने के साथ शुरू हो जाता है शीतकाल जिसमें रबी फसल की तैयारी होती है । इस प्रकार दीपावली व्यापारिक महत्व का अवसर भी है । इसे दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक मेला भी कह सकते हैं | भारत की अर्थव्यवस्था आज भी कृषि आधारित है और दीपावली भी उसी से जुडी है । अच्छी फसल से समाज के हर वर्ग को उत्साह के साथ ही भविष्य के आर्थिक नियोजन में मदद मिलती है । जब फसल अच्छी आती है तब शादियाँ भी खूब होती हैं जिनकी वजह से बाजार में रौनक आती है । इसीलिए दीपावली को व्यवसायी समुदाय का त्यौहार कहा जाता है । इस दिन धन - धान्य की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी की पूजा का महात्म्य भी इसी वजह से है । बावजूद इसके इस त्यौहार से जुड़ी परंपराओं में सामाजिक ढांचे का भी ध्यान रखा गया था । तभी तमाम चमक – दमक के बावजूद मिट्टी का दिया और दीपावली एक दूसरे के पूरक हैं । आधुनिकता के साथ सजावट के अनेकानेक साधन विकसित होने पर भी धनकुबेरों से लेकर तो झोपड़ी में रहने वाला निर्धन भी दीपक के माध्यम से ही दीपावली मनाता है जिसके पीछे भी एक प्रतीकात्मक सोच रही है । दीपावली पर चूंकि अमावस्या होती है इसलिए दीपमालिका के माध्यम से ये प्रदर्शित किया जाता है कि निराशा के माहौल में भी आशावान होना हमारा स्वभाव है । इस प्रकार यह अँधेरे में प्रकाश उत्पन्न करने रूपी पौरुष का प्रतीक है | लक्ष्मी की पूजा और आराधना को केवल धन – संपत्ति की प्राप्ति से जोड़ना अधकचरापन है । सही मायनों में दीपावली श्रम और नैतिकता से अर्जित सम्पन्नता की प्रेरणा देती है । अमावस की अंधियारी रात को दीपों से आलोकित करने की परम्परा इस बात का द्योतक है कि हमारे आचरण में पारदर्शिता हो और हम ऐसा कुछ न करें जिसे छिपाने की जरूरत पड़े । इसके साथ ही ये पर्व हमारी सामाजिक व्यवस्था में निहित समतामूलक सोच का सर्वोत्तम उदाहरण है । इसीलिये भले ही यह लक्ष्मी जी को समर्पित है किन्तु सुख और समृद्धि की कामना करने का अधिकार सभी को है , ये इस त्यौहार का संदेश है । पूंजीवादी और साम्यवादी विचारधारा के विपरीत भारतीय सामाजिक व्यवस्था वर्ग संघर्ष जैसे दर्शन से अलग वर्ग समन्वय को पोषित करने वाली है । इस अवसर पर रोजगारमूलक सामाजिक ढांचे का सर्वोत्तम स्वरूप उभरकर सामने आता है । 21 वीं सदी ने यद्यपि काफी कुछ बदल डाला लेकिन आज भी बचत और संयम का जो संस्कार हमें विरासत में मिला उसने अनगिनत झंझावातों के बावजूद भारत को संगठित और सुरक्षित रखा । सदियों की गुलामी भी हमारे सांस्कृतिक व्यवहार को नहीं बदल सकी तो उसका बड़ा कारण हमारी पर्व परम्परा है जो हमें जड़ों से जोड़े रखती है । दीपावली इस परम्परा का शिखर है । मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में हमारे देश की भूमिका की ओर पूरा विश्व निहार रहा है । आर्थिक मजबूती के साथ सुरक्षा के क्षेत्र में बढ़ती आत्मनिर्भरता के कारण ही भारत दुनिया की बड़ी ताकतों की कतार में शामिल हो सका है । नई पीढ़ी ने ज्ञान – विज्ञान की हर विधा में अपनी प्रतिभा प्रमाणित की है । स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद की भविष्यवाणी के अनुरूप भारत विश्व का नेतृत्व करने के आत्मविश्वास से भरा हुआ है । हालाँकि राह में बाधाएं भी हैं किन्तु आज का भारत समस्याओं के समाधान के सामर्थ्य से भरपूर है । दीपावली इस आत्मविश्वास को और सुदृढ़ बनाने का पुनीत अवसर है । आइये , अपनी उन्नति के साथ ही हम अपने देश की समृद्धि हेतु भी प्रार्थना करें क्योंकि उसी के साथ हमारा भविष्य भी जुड़ा हुआ है ।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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