उ.प्र का बहराइच जिला सांप्रदायिक दंगे की आग में झुलस रहा है। देवी प्रतिमा विसर्जन जुलूस के समय एक मुस्लिम युवक द्वारा माइक का तार निकालने से विवाद शुरू हुआ। जुलूस पर पथराव होने से प्रतिमा खंडित हो गई। इससे विवाद और बढ़ा। इसके बाद एक हिन्दू युवक को घर के भीतर ले जाकर गोली मार दी गई। गोली मारने वाले मुस्लिम युवक सहित अन्य उपद्रवियों को गिरफ्तार कर लिया गया किंतु दंगे की आग पूरे जिले में फैल गई। दोनों तरफ से आरोप - प्रत्यारोप चल रहे हैं। राजनीति भी अपनी चिर - परिचित शैली में शुरू हो गई है। दोषियों को दंडित करवाने की कोशिशों के बजाय वोट बैंक की फिक्र में सपा प्रमुख अखिलेश यादव सरकार पर हमला करने में जुट गए हैं। उनके मुँह से
हत्या करने वालों की निंदा का एक शब्द भी नहीं निकला। उल्टे वे भाजपा पर आरोप लगा रहे हैं। उल्लेखनीय है उ.प्र की 10 विधानसभा सीटों के उपचुनाव होने वाले हैं। उनमें से कुछ में मुस्लिम मतदाताओं की अच्छी खासी संख्या है। सपा द्वारा घोषित उम्मीदवारों में दो मुस्लिम भी हैं। हालांकि सपा अध्यक्ष द्वारा उक्त घटना को लेकर जो रवैया प्रदर्शित किया जा रहा है वह नया नहीं है क्योंकि श्री यादव के पिता स्व. मुलायम सिंह यादव ने मुस्लिम तुष्टीकरण में कांग्रेस को भी पीछे छोड़ दिया था। माय (मुस्लिम - यादव ) नामक गठजोड़ बिहार में भी बना जिसके चलते मुलायम सिंह और लालू प्रसाद यादव की दूसरी पीढ़ी भी सत्ता का स्वाद चख सकी। राम मंदिर आंदोलन के कारण मुस्लिम समाज कांग्रेस से दूर होने लगा। इसका फ़ायदा उठाकर सपा ने मुस्लिम वोट बैंक पर नजर जमाई और उसे अपने पाले में खींचने के लिए मुलायम सिंह राम भक्तों पर गोली चलवाने तक में नहीं हिचके। उधर बिहार में लालू ने लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा रोककर खुद को मुस्लिम हितैषी साबित करने का दाँव खेला। इसके जवाब में हिंदुओं का झुकाव भाजपा की तरफ हुआ। इस खेल में सबसे अधिक नुकसान हुआ कांग्रेस का जिसके हाथ से हिन्दू और मुसलमान दोनों खिसक गए। दलित वोट बसपा ने समेट लिए। लंबे समय तक मुस्लिम मतदाता सपा और राजद का साथ देते रहे। लेकिन बीते लोकसभा चुनाव में अपने धर्मगुरुओं के निर्देशानुसार मुस्लिम उन्होंने भाजपा को हराने में सक्षम प्रत्याशी को मत देने की रणनीति अपनाई जो उ.प्र में सर्वाधिक कारगर साबित हुई। महाराष्ट्र सहित कुछ और राज्यों में भी इसका असर हुआ जिससे भाजपा लोकसभा में स्पष्ट बहुमत से वंचित रह गई। सबसे बड़ा झटका उसे उ.प्र में ही लगा जहां मोदी - योगी की जुगलबंदी को मुस्लिम गोलबंदी ने ध्वस्त कर दिया। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी में भी बहुत कम मतों से जीते। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी लखनऊ में 70 हजार के मामूली अंतर से जीत सके। कई दशक बाद उ.प्र में भाजपा सपा से पीछे रह गई। हालांकि इसके पीछे दलितों की भूमिका भी रही किंतु मुस्लिम समुदाय के मन में इस बात का एहसास पैदा हो गया कि भाजपा को 240 सीटों पर रोकने का पराक्रम उसी ने किया। जाहिर है इससे उसका हौसला बुलंद हुआ जिसकी परिणिति देश में हिंदुओं के धार्मिक आयोजनों पर पथराव के रूप में हुई। सांप्रदायिक विवाद देश में पहले भी होते आये हैं किंतु इस वर्ष गणेशोत्सव और दुर्गा पूजा पर जिस तरह का उत्पात देखने मिला वह खतरनाक संकेत है। हिन्दू देवी - देवताओं की प्रतिमाओं को ले जाने से रोकना और उन पर पत्थर फेंककर खंडित करने जैसी घटनाएं बड़ी संख्या में होना ये दर्शाता है कि इसके पीछे शातिर दिमाग काम कर रहे हैं। मुसलमानों की ये शिकायत जायज है कि मस्जिद के सामने जान - बूझकर उत्तेजित करने वाली गतिविधियां होने से विवाद पैदा होते हैं किंतु देवी प्रतिमा के जुलूस को मार्ग बदलने बाध्य करने की जिद करने वालों को रोकने उस समाज के जिम्मेदार लोग सामने क्यों नहीं आते ये बड़ा सवाल है। बहराइच में जिस हिन्दू युवक को मुस्लिमों द्वारा गोली मार दी गई यदि उसने कुछ गलत किया था तो उसे पकड़कर कानून के हवाले करना चाहिए था। लेकिन जैसा कि पिछली पंक्तियों में लिखा गया है लोकसभा चुनाव के बाद बनी राजनीतिक परिस्थितियों में मुस्लिम समाज में जो विजयोन्माद उत्पन्न हुआ उसके कारण अनेक शहरों में सांप्रदायिक तनाव देखने मिल रहा है। विजयादशमी पर रास्वसंघ के पथ संचलन पर पथराव की घटनाएं भी पहली बार हुईं। इस सबके पीछे राजनीतिक दलों की भूमिका भी है जो मुस्लिम समाज को समझाने के बजाय उल्टा भड़काते हैं। उ.प्र से आ रही खबरें निश्चित रूप से चिंतित करने वाली हैं। योगी सरकार के राज में कानून व्यवस्था काफी सुधर गई है। अपराधियों के विरुद्ध सख्ती बरती जाने से जनता राहत महसूस कर रही है। लेकिन वोट बैंक की लालच में अपराधियों को संरक्षण देने की जिस नीति पर सपा जैसे दल चल रहे हैं वह समाज विरोधी है। अशांति फैलाने वाला चाहे हिन्दू हो या मुसलमान , उसके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। धर्म के नाम पर किसी को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है। उ.प्र सरकार को हालात पर पैनी निगाह रखनी होगी क्योंकि जल्द ही वहाँ 10 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने जा रहे हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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