इसे दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच लंबे समय से चले आ रहे वार्ताओं के दौर का फलितार्थ कहें या रूस में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग के बीच होने वाली बातचीत के पहले रिश्तों में आई कड़वाहट दूर करने की कूटनीतिक पहल, ये तय कर पाना मुश्किल है। असल में चीनियों के चेहरे की जो बनावट है उसके कारण उनके मनोभाव पढ़ पाना बेहद कठिन होता है। ताजा समझौते के अनुसार दोनों देशों ने पूर्वी लद्दाख़ के डेमचोक और देपसांग इलाके से अपने सैनिक पीछे हटाना शुरू कर दिया है। इसके अंतर्गत टेंट, शेड और सैन्य वाहन आदि हटाने की कारवाई हो रही है। 2020 में गलवान घाटी में हुई फौजी झड़प के बाद पूरे लद्दाख़ क्षेत्र में युद्ध की स्थिति बनी हुई थी। भारत ने समूचे क्षेत्र में वायुसेना के साथ मिसाइलों की भी तैनाती कर दी। इसके अलावा बड़े पैमाने पर सड़कें और पुल वगैरह विकसित कर दिये गए। इसका प्रभाव ये हुआ कि चीन की तरफ से की जाने वाली घुसपैठ नियंत्रित हो गई। गलवान में हुई झड़प में भारत के एक कर्नल की शहादत हो गई थी। लेकिन जवाबी कारवाई में चीन के सैनिक बड़ी संख्या में मारे गए जिसे वह छिपाता रहा। चूंकि उस समय कोरोना का प्रकोप था इसलिए चीन को लगा कि उस निर्जन इलाके में वह अपना कब्जा जमा लेगा। दरअसल सीमा का निर्धारण नहीं होने की वजह से लद्दाख़ के बड़े इलाके में दोनों देशों की सेनाएं गश्त करती रहती हैं। अतीत में हुए समझौते के अंतर्गत तनाव की स्थिति में किसी भी ओर से गोली नहीं चलाई जाएगी। गलवान घाटी में हुई झड़प में दोनों पक्षों ने एक दूसरे के साथ हाथापाई की। बंदूकों को लाठी की तरह इस्तेमाल तो किया किंतु गोली न चलाने के करार का उल्लंघन नहीं हुआ। उसके बाद से दोनों के बीच सैन्य स्तर की बातचीत जारी रही और अनेक क्षेत्रों से सैनिक पीछे हटा लिए गए। ताजा समझौते के बाद 2020 वाली स्थिति बहाल होगी और दोनों देश निर्जन इलाके में बारी - बारी से पेट्रोलिंग कर सकेंगे जिसके पहले दूसरे पक्ष को सूचित करना होगा। जिनपिंग और श्री मोदी के बीच रूस में हुई बातचीत का ब्यौरा तो सामने नहीं आया किंतु ऐसा लगता है वह दुआ - सलाम तक सीमित रही। ये भी कहा जा सकता है कि ब्रिक्स सम्मेलन को सफल साबित करने के लिए रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने दोनों नेताओं की बातचीत के लिए जमीन तैयार की हो क्योंकि इससे अमेरिका की चिंता बढ़ेगी। वैसे भी वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका भारत के प्रति जिस तरह का दोहरा रवैया दिखा रहा है उसमें हमारे लिए भी कूटनीतिक स्तर पर पैंतरेबाजी करनी जरूरी है। विशेष रूप से बांग्लादेश में हुए सत्ता पलट में अमेरिका की भूमिका में भारत का विरोध साफ झलकता है। लेकिन समस्या ये है कि चीन से भी किसी सदाशयता की उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि वह हमारा जन्मजात शत्रु है। उसके साथ चला आ रहा सीमा विवाद लाइलाज मर्ज बन गया है। भारत के पड़ोसी देशों को उसने अपने प्रभाव क्षेत्र में ले लिया है। नेपाल, मालदीव और श्रीलंका में वामपंथी सत्ता आने के बाद बांग्लादेश में भी भारत विरोधी सरकार बन गई। पाकिस्तान से तो हमारी जन्मजात शत्रुता है। अरुणाचल और सिक्किम के साथ ही चीन की नजर भूटान पर भी है। ये बात तो पूरी तरह सही है कि वह भारत के साथ सीधे युद्ध से बचता रहा है। गलवान घाटी में किये दुस्साहस का उसे जो जवाब मिला उसके बाद वह समझ गया कि भारत अब 1962 वाला देश नहीं है। उसके पास हर वो सैन्य क्षमता है जिससे वह चीन को माकूल जवाब दे सकता है। चीन के पास बड़ी सेना जरूर है किंतु सीमाओं की भौगोलिक स्थिति देखते हुए भारतीय सेना भारी पड़ती है। सही बात ये है कि उसकी फितरत अपने पड़ोसियों को परेशान करने की है । इसलिए ये मान लेना भूल होगी कि पूर्वी लद्दाख़ से सैनिक हटाने के बाद उसकी नीयत बदल जाएगी। हालांकि भारत भी इस बात को जान गया है और इसीलिए गलवान विवाद के बाद से ही उसने कड़ा रुख अपनाया। सैन्य स्तर पर हमारी तैयारियां देखकर ही वह बातचीत के लिए रजामंद हुआ और जिस तरह की ऐंठ दिखाता था उसमें कमी आई। लेकिन विवादित क्षेत्रों से दोनों देशों के सैनिकों के पीछे हटने के बाद भी भारत को चौकन्ना रहना होगा क्योंकि चीन और धोखेबाजी एक दूसरे के पर्याय हैं। उसके द्वारा जो नरमी समय - समय पर दिखाई जाती है उसके पीछे भारत के साथ उसका व्यापार है। इसीलिए वह सीधी टक्कर से भले बचता हो किंतु अप्रत्यक्ष रूप से वह भारत विरोधी गतिविधियों को संरक्षण देने में तनिक भी संकोच नहीं करता। संरासंघ में पाकिस्तान का समर्थन इसका प्रमाण है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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