छत्तीसगढ़ वह राज्य है जिसकी सीमाएं म.प्र , उ.प्र, महाराष्ट्र, झारखंड, उड़ीसा, तेलंगाना और आंध्रप्रदेश से मिलती हैं। ये भी संयोग है कि इन सीमावर्ती इलाकों में भी आदिवासी बाहुल्य है और इसीलिए ये नक्सली आतंक के गढ़ हैं। एक जमाने में म.प्र के चंबल और बुंदेलखंड अंचल में सक्रिय डाकू बड़ी वारदात करने के बाद उ.प्र और राजस्थान भाग जाते थे। उसी रणनीति को नक्सलियों ने अपनाया । उक्त किसी भी राज्य में हिंसक घटना को अंजाम देने के बाद वे पड़ोसी राज्य में जाकर छिप जाते हैं। उनके कार्यक्षेत्र का ज्यादातर हिस्सा घने वनों से घिरा होने से छिपने में सहूलियत होती है। ये बात भी सही है कि जिस तरह से डाकुओं को समाज के एक वर्ग के साथ ही पुलिस में बैठे कतिपय लोगों का संरक्षण मिलता था ठीक वही स्थिति नक्सलियों के साथ भी है। कुछ लोग भयवश भी उनका साथ देते हैं वहीं पुलिस और प्रशासन में बैठे लोगों के अपने स्वार्थ हैं। ये बात भी गौरतलब है कि नक्सलियों के कार्यक्षेत्र का अधिकांश इलाका खनन गतिविधियों वाला है । खनन व्यवसायियों से जबरिया वसूली उनकी आय का स्रोत माना जाता है। उसके अतिरिक्त अनेक बड़े कारोबारी अपनी सुरक्षा के लिये नक्सलियों को धन देते हैं। उनकी कार्यप्रणाली चूंकि हिंसा से प्रेरित है इसलिए माओवादी विचारधारा के नाम पर नृशंस हत्याएँ कर वे अपने आतंक का साम्राज्य कायम कर सके । लेकिन केंद्र में नरेंद्र मोदी की सत्ता आने के बाद नक्सलियों के सफाये का जो अभियान शुरू किया गया उसके परिणामस्वरूप वे पहले जैसे ताकतवर नहीं रहे। उनके सशस्त्र गिरोहों का खात्मा किये जाने के साथ ही शहरी क्षेत्रों में बैठे सरपरस्तों पर नकेल कसे जाने के कारण उनकी जबरदस्त घेराबंदी संभव हो सकी। उन्हीं की भाषा में जवाब देने की शैली अपनाये जाने के अच्छे परिणाम देखने मिल रहे हैं। गत दिवस छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सुरक्षा बलों ने 30 से अधिक नक्सलियों को मार गिराया और बड़ी मात्रा में हथियार तथा गोला - बारूद भी बरामद किया। कुछ माह पहले भी लगभग दो दर्जन मार गिराए गए थे। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार के राज में नक्सलियों को प्रश्रय मिलने के आरोप लगा करते थे। कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल सहित पार्टी के अनेक नेताओं की नक्सलियों द्वारा हत्या किये जाने में भी एक पूर्व मुख्यमंत्री का हाथ बताया जाता था जो अब दुनिया में नहीं हैं। अन्य पड़ोसी राज्यों में भी कुछ राजनीतिक दल चुनाव के दौरान नक्सलियों की मदद लेते रहे हैं। वामपंथी पार्टियों को तो उनका खुला समर्थन रहता ही है। लेकिन जैसे - जैसे वामपंथी राजनीति का प्रभाव कम होता जा रहा है वैसे - वैसे नक्सलियों का ढांचा भी कमजोर पड़ने लगा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 2026 तक भारत को नक्सली आतंक से मुक्त करने का जो संकल्प लिया वह सत्य प्रतीत होने लगा है। सुरक्षा बलों के प्रयासों से नक्सल प्रभावित इलाकों के निवासियों में भी साहस का संचार होने लगा है जो अपनी और परिवार की प्राण रक्षा के लिए उनके इशारों पर नाचते थे। बड़ी संख्या में नक्सलियों के चंगुल में फंसे युवाओं ने आत्म समर्पण कर मुख्य धारा में शामिल होने की बुद्धिमत्ता भी दिखाई। वर्तमान में झारखंड और तेलंगाना छोड़कर छत्तीसगढ़ और उसके पड़ोसी राज्य उ.प्र , म.प्र , महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और उड़ीसा में भाजपा अथवा उसके सहयोगियों की सरकारों से नक्सलियों को समर्थन और सहानुभूति प्राप्त नहीं होने से भी उनकी पकड़ कमजोर हो रही है। लेकिन जंगलों से सफाया होने के बाद समाज के भीतर घुसे बैठे नक्सली मानसिकता के सफ़ेदपोशों का पर्दाफाश होना भी जरूरी है। ये लोग प्रशासन, शिक्षा, कला, साहित्य और पत्रकारिता जैसे क्षेत्रों में बैठकर नक्सली विचारधारा का प्रचार - प्रसार करते हैं। इनकी कार्यशैली व्यवस्था के प्रति विद्रोह की भावना भड़काने पर केंद्रित है। स्वयंसेवी संगठनों के जरिये भी ये अपनी गतिविधियां संचालित करते हैं। इनके विरुद्ध जाँच एजेंसियां कारवाई करती तो हैं किंतु साक्ष्य नहीं मिलने से वे बच जाते हैं। सरकार को इस ओर भी ध्यान देना चाहिए। नक्सलवादी कहने को सामाजिक विषमता और शोषण के विरुद्ध संघर्ष के लिए हथियार उठाते हैं लेकिन उनका असली उद्देश्य भारत में खूनी क्रांति के रास्ते पर चलकर नेपाल जैसी चीन समर्थित माओवादी सरकार बनाना है । इसके लिए ये देश हित के विरुद्ध कार्य करने वाली हर ताकत के साथ हाथ मिलाने तैयार रहते हैं। नेपाल की तरह ही भारत में गृहयुद्ध भड़काने की साजिश भी नक्सली विचारधारा का पोषण करने वाले रचते रहते हैं। बीते कुछ वर्षों में जे .एन .यू जैसे कुछ शिक्षण संस्थानों सहित सरकार विरोधी आंदोलनों में नक्सली मानसिकता वाले चेहरे नजर आना उसी साजिश का हिस्सा है। सरकार को आस्तीन में छिपे इन सांपों का विष दंत तोड़ना होगा। समाज में जो राष्ट्रवादी बुद्धिजीवी वर्ग है उसे भी इन तत्वों से वैचारिक स्तर पर निपटना चाहिए। भारतीय समाज में रक्तरंजित क्रांति को सामाजिक स्वीकृति कभी नहीं मिली। यही वजह है कि लेनिन और माओ के विचार तमाम प्रयासों के बाद भी मुख्यधारा में समाहित नहीं हो सके।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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