पश्चिम एशिया में एक बार फिर महायुद्ध की आशंका बढ़ने लगी है। जब तक बात इजरायल और गाज़ा पर काबिज हमास के बीच विवाद की थी तब तक तो गनीमत रही किंतु धीरे - धीरे लड़ाई का दायरा लेबनान और यमन तक बढ़ने के बाद अब ईरान तक फैलने के कगार पर है । सर्वविदित है कि हमास और हिज़बुल्लाह जैसे इस्लामिक कट्टरपंथी संगठनों को अस्त्र, शस्त्र और धन ईरान ही उपलब्ध करवाता है। अरब देशों के बीच अमेरिका का खुलकर विरोध करने वाला ईरान ही है। उसके पास परमाणु बम होने के कारण ही अमेरिका उसके प्रति द्वेष भाव रखता है। शाह पहलवी के हटने के बाद जब अयातुल्ला खोमैनी ईरान की सत्ता पर काबिज हुए तो पूरा माहौल बदल गया। शाह के दौर की आधुनिकता पलक झपकते लुप्त होने लगी । खोमैनी के शासन में ईरान पूरी तरह कट्टर इस्लामिक देश बन गया। अपार तेल संपदा के बल पर वह अमेरिका को चुनौती देने का दुस्साहस करने से भी बाज नहीं आता जिनके कारण उसने ईरान पर जबरदस्त आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये। परिणास्वरूप वह रूस की तरफ झुक गया। गत वर्ष हमास द्वारा इजरायल पर अचानक किये गए हमले के पीछे भी ईरान ही था। बीच - बीच में उसके और इजरायल के बीच भी मिसाइलों का आदान - प्रदान होता रहा किंतु सीधे युद्ध की स्थिति नहीं बनी। लेकिन बीते कुछ दिनों में हालात उसी ओर बढ़ रहे हैं। गत सप्ताह ईरान ने सैकड़ों मिसाइलें इजरायल पर बरसाकर आग में घी डाल दिया जिससे इजरायल को भी ईरान पर आक्रमण का वाजिब बहाना मिल गया। वह जिस तरह से आक्रामक है उससे लगता है अमेरिका ने उसे पूरी शह दे रखी है। लेकिन इस समूचे घटनाक्रम में दो सबसे महत्वपूर्ण बातें हैं। पहली तो ये कि ईरान का सरपरस्त रूस खुद यूक्रेन के साथ ऐसे युद्ध में फंसा हुआ है जिसका अंत समझ में नहीं आ रहा। यूक्रेन की पीठ पर अमेरिका का पूरा - पूरा हाथ होने से वह रूस जैसी महाशक्ति का मुकाबला कर रहा है। दूसरी उल्लेखनीय बात ये है कि अरब के इस्लामिक देशों के बीच पहले जैसी एकता नहीं रही। ईरान और ईराक के बीच एक दशक तक चले युद्ध ने इसकी शुरुआत की थी। फिर ईराक द्वारा कुवैत पर कब्जा किये जाने के बाद अमेरिका ने जो सैन्य कारवाई की उसने भी इस अंचल के शक्ति संतुलन को उलट - पुलट दिया। सद्दाम हुसैन और कर्नल गद्दाफ़ी जैसे जो घोर अमेरिका विरोधी राष्ट्राध्यक्ष थे उन दोनों को अमेरिका ने दुनिया से ही हटा दिया। एक और बात जो इस दौरान देखने मिल रही है वह है सऊदी अरब और इजरायल में बढ़ती नजदीकी। भले ही पश्चिम एशिया के इस्लामिक देशों पर सऊदी अरब की चौधराहट पहले जैसी नहीं रही किंतु अपनी बेशुमार तेल संपदा और संपन्नता के कारण वही ऐसा देश है जो अमेरिका के साथ बराबरी से बैठता है। चूंकि उसने भी इजरायल का विरोध बंद कर दिया वहीं अन्य अरबी देशों में एक भी कद्दावर नेता नहीं बचा जो सबको इजरायल के विरुद्ध लामबंद कर सके। जहाँ तक बात फिलीस्तीनियों की है तो यासर अराफात के बाद उनका कोई प्रभावशाली नेतृत्व है नहीं। हमास और हिजबुल्लाह जैसे आतँकवादी संगठनों ने उनकी लड़ाई अपने हाथ में लेकर उसकी गंभीरता खत्म कर दी। अराफात की छवि भी शुरू में तो आतँकवादी की ही थी किंतु जीवन के उत्तरार्ध में वे वैश्विक स्तर के नेता बनकर उभरे जिसे तीसरे विश्व के देशों का समर्थन और सहयोग मिला। इजरायल के साथ हुए ऐतिहासिक शांति समझौते के बाद तो उनकी प्रशंसा होने लगी थी। ऐसा लगने लगा कि पश्चिम एशिया में शान्ति का सूर्योदय हो चुका है लेकिन उनके निधन के बाद स्थितियाँ कुत्ते की पूँछ की तरह फिर से पुराने स्वरूप में लौट आईं। इजरायल पूरी तरह सही है और उसका हर कदम न्यायोचित है यह मान लेना अनुचित होगा किंतु वर्तमान तनाव हमास के हमले से शुरू हुआ और हिजबुल्लाह के कूदने से उसमें और वृद्धि हो गई। रही - सही कसर ईरान पूरी किये दे रहा है। ये बात पूर्णतः सत्य है कि जिस तरह हमास और हिजबुल्लाह बिना ईरान के संरक्षण के इजरायल से नहीं टकरा सकते वैसे ही इजरायल भी बिना अमेरिका की सहमति और सहयोग से एक साथ कई मोर्चे नहीं खोल सकता। इजरायल के जो तेवर हैं वे किसी बड़ी घटना का संकेत जरूर दे रहे हैं। अमेरिका ईरान को झुकाने का जो अवसर बरसों से तलाश रहा था वह उसे अनायास मिल गया है साथ ही रूस के यूक्रेन में उलझे रहने से फिलहाल किसी बड़े प्रतिरोध की संभावना भी नहीं है। लेकिन इजरायल और ईरान सीधे भिड़े तो इससे पूरी दुनिया हिल उठेगी। कोरोना के बाद यूक्रेन संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को जो नुकसान पहुंचाया उससे वह धीरे - धीरे उबरने की स्थिति में आ ही रही थी की ये संकट आ गया। चिंता का विषय ये है कि जिनको इसे रोकना चाहिए वे ही उसे भड़का रहे हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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