चुनाव आयोग ने आखिरकार महाराष्ट्र और झारखण्ड विधानसभा के साथ ही लोकसभा और विधानसभा की कुछ सीटों हेतु उपचुनावों की तारीख घोषित कर दी। जम्मू - कश्मीर और हरियाणा विधान सभा के चुनाव संपन्न होने के बाद से ही उक्त दोनों राज्यों के चुनाव पर पूरे देश की नजरें लगी हुई हैं। लोकसभा चुनाव के बाद से विपक्ष काफी उत्साहित था । उ.प्र के बाद महाराष्ट्र वह राज्य है जिसमें सत्ता होने के बाद भी भाजपा को जबरदस्त झटका लगा। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार झारखंड में तो भाजपा के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ निर्मित होती दिख रही हैं। चंपई सोरेन के भाजपा में आने से सत्ताधारी झामुमो को जबरदस्त झटका लगा है। जानकार मान रहे हैं कि उनके प्रभाव वाली 14 सीटों पर भाजपा को लाभ मिल जाएगा । लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा - शिवसेना - एनसीपी गठबंधन को अपनी सरकार बचाने के लिए जबरदस्त संघर्ष करना पड़ेगा। इसकी वजह साफ है। झारखंड में झामुमो केवल हेमंत सोरेन और उनके परिवार पर निर्भर है। चंपई उनके बेहद भरोसेमंद थे तभी जेल जाने के समय उन्होंने तमाम अटकलों के विपरीत अपनी पत्नी की बजाय उनको मुख्यमंत्री बनाया। जबकि भाजपा के पास वहाँ राज्य स्तरीय मजबूत नेतृत्व है और लोकसभा चुनाव में भी वह 14 में से 8 सीटों पर विजयी हुई। हरियाणा जीतने के बाद उसका हौसला और बुलंद हुआ है। झारखंड के पड़ोसी बिहार, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में भी भाजपा सत्ता में है, ऐसे में उसके लिए इस आदिवासी राज्य में मुकाबला आसान है। लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा को विपक्ष से पहले अपने सहयोगी दलों से निपटना होगा। राजनीतिक जगत में चल रही चर्चाओं के मुताबिक मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उपमुख्यमंत्री अजीत पवार क्रमशः अपनी पार्टी शिवसेना और एनसीपी के लिए ज्यादा से ज्यादा सीटें मांगकर उस पर दबाव बना रहे हैं। पार्टी की मजबूरी ये है कि उसे उनके समर्थन की कीमत चुकानी पड़ेगी। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 9 , शिवसेना ने 8 , एनसीपी ने 1 एक सीट जीती थी। ऐसे में मुख्यमंत्री शिंदे भाजपा पर ज्यादा से ज्यादा सीटों का दबाव बनाएंगे तो उसे ठुकरा देना उसके लिए आसान नहीं होगा। इसी तरह अजीत पवार की एनसीपी का भले ही एक सांसद जीता लेकिन शरद पवार के असर वाले इलाकों में वे ही बराबरी से मुकाबला कर सकेंगे। लिहाजा भाजपा को उनके नखरे भी उठाने होंगे। अजीत के कुछ हालिया बयानों से भाजपा आशंकित है कि कहीं चुनाव के समय वे वापस चाचा के चरणों में न गिर जाएं। बारामती सीट पर उनकी बेटी सुप्रिया सुले के विरुद्ध अपनी पत्नी को लड़वाने पर वे खेद व्यक्त कर ही चुके हैं। अजीत के लिए ये चुनाव अस्तित्व की रक्षा करने का अंतिम अवसर है। अपने साथ आये विधायकों को अगर वे टिकिट न दिलवा सके तो वे वापस शरद पवार के पास लौट सकते हैं । भाजपा को उन्हें साथ रखना जरूरी है क्योंकि उनके महायुति छोड़ देने से भाजपा को मनोवैज्ञानिक तौर पर बड़ा झटका लगेगा। ये भी गौरतलब है कि विपक्ष के पास शरद पवार, उद्धव ठाकरे जैसे बड़े चेहरे हैं। कांग्रेस का भी महाराष्ट्र पुराना गढ़ रहा है। ऐसे में देवेंद्र फड़नवीस, एकनाथ शिंदे और अजीत पवार के बल पर सरकार बनाने के लिए जरूरी 145 सीटों से अधिक जीतना आसान नहीं होगा। महिलाओं को 1500 रु. प्रति माह देने की योजना जरूर असर दिखा सकती है। इसके अलावा देश भर से आ रही खबरों से हिन्दू मतदाताओं के एक बार फिर भाजपा के पाले में जाने की संभावना भी बढ़ी है। जहाँ तक बात महा विकास आगाड़ी की है तो हरियाणा चुनाव के बाद कांग्रेस अब दबाव बनाने की स्थिति में नहीं है। नतीजे आते ही शिवसेना उद्धव गुट ने कांग्रेस पर हमला बोलते हुए उससे पूछा कि यदि वह अकेले लड़ना चाहती है तो बताये। पार्टी के मुखपत्र सामना में तो यहाँ तक लिखा गया कि जीती हुई बाजी कैसे हारी जाती है ये कांग्रेस से सीखा जा सकता है। उद्धव गुट के साथ ही शरद पवार भी कांग्रेस के सामने कड़ी शर्तें रखने से बाज नहीं आयेंगे क्योंकि उनके लिए ये चुनाव साख बचाने का अवसर है। अगाड़ी में कांग्रेस की वही स्थिति है जो महायुति में भाजपा की है। हरियाणा हारने के बाद कांग्रेस के लिए महाराष्ट्र जीतना नितांत आवश्यक हो गया है। दूसरी तरफ भाजपा के लिए भी इस बड़े राज्य में सरकार की वापसी के जरिये लोकसभा चुनाव की हार से उबरने का मौका है। यदि वह ऐसा कर सकी तब वह शरद पवार और उद्धव ठाकरे के राजनीतिक भविष्य को अंधकारमय बना सकेगी। साथ ही शिवसेना और एनसीपी में असली नकली का फैसला भी हो जाएगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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