Thursday, 17 October 2024

धारा 370 बहाल करने की मांग से दूर भाग रही कांग्रेस



जम्मू - कश्मीर में सरकार का गठन हो गया। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने जम्मू क्षेत्र से सुरेंद्र चौधरी  को उपमुख्यमंत्री बनाये जाने के साथ ही निर्दलीय रमेश शर्मा को भी मंत्री बनाया  है। तीन मुस्लिम विधायक भी मंत्री बने। 90 सदस्यों वाली विधानसभा में  10 मंत्री बनाये जा सकते हैं। अभी 4 स्थान रिक्त हैं।   हालांकि राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा भी उमर की ताजपोशी में शामिल हुए किंतु सरकार में कांग्रेस की गैर मौजूदगी ने राजनीतिक चर्चाओं को जन्म दे दिया। विधानसभा चुनाव के पूर्व हुए  गठबंधन में नेशनल काँफ्रेंस को 51 और काँग्रेस को 32 सीटें मिली थीं। नतीजों में नेशनल काँफ्रेंस ने तो 42 सीटें जीतकर अपना वर्चस्व दिखा दिया जबकि कांग्रेस केवल 6 सीटें जीत पाई। उसमें भी 5 कश्मीर घाटी में थीं ।  जम्मू क्षेत्र में उसे नेशनल काँफ्रेंस ने भाजपा के हिन्दू वोट बैंक में सेंध लगाने का जिम्मा सौंपा किंतु उसे मात्र एक सीट मिली। बाकी की 5 नेशनल काँफ्रेंस के प्रभाव क्षेत्र में  मिलीं। इस कारण कांग्रेस की वजनदारी गठबंधन में कम हो गई। यदि वह 10 सीटें जीत लेती तब  उपमुख्यमंत्री पद उसकी झोली में आता। उमर अब्दुल्ला को कुछ निर्दलीय और आम आदमी पार्टी के अकेले विधायक का समर्थन मिलने से उनके सामने बहुमत की समस्या नहीं रही । लेकिन इसके अलावा भी कांग्रेस के सरकार से बाहर रहने का एक अन्य कारण राजनीतिक जगत में चर्चा का विषय बना हुआ है। दरअसल हरियाणा के चुनाव परिणाम ने कांग्रेस को दहशत में डाल दिया है। लोकसभा चुनाव में हिन्दू मतों के बिखराव ने उसका हौसला मजबूत कर दिया था। फ़ैज़ाबाद सीट पर भाजपा की हार को वह जरूरत से ज्यादा प्रचारित कर रही थी। लेकिन हरियाणा में भाजपा ने जिस तरह से समीकरण अपने पक्ष में किये उसके बाद कांग्रेस को महाराष्ट्र में  खतरा नजर आने लगा। उसके रणनीतिकारों को ये लगने लगा कि मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप से उसे बचना होगा वरना वहाँ हिंदुओं का ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में  होते देर नहीं लगेगी। ऐसे में जम्मू कश्मीर सरकार का हिस्सा बनने पर वह धारा 370 की वापसी जैसे मुद्दे पर अपनी सहमति देने मजबूर हो जाती। उल्लेखनीय है विधानसभा चुनाव के दौरान नेशनल कांफ्रेंस ने तो धारा 370 की बहाली के साथ ही जम्मू - कश्मीर को पूर्ण राज्य बनाये जाने का मुद्दा अपने घोषणापत्र में शामिल किया और उस पर ही पूरे अभियान को केंद्रित रखा। वहीं  कांग्रेस ने पूर्ण राज्य के दर्जे की बात तो उठाई  किंतु 370 की बहाली पर मौन साधे रही। यदि  हरियाणा में वह सरकार बना ले जाती तब शायद इस विषय पर कांग्रेस भी नेशनल काँफ्रेंस के सुर में सुर मिलाती नजर आती किंतु नतीजा उल्टा आने के बाद लोकसभा चुनाव के बाद पैदा हुआ उत्साह हवा -  हवाई हो गया। नेशनल काँफ्रेंस तो ये कहती फिर रही है कि जम्मू कश्मीर के मतदाताओं ने केंद्र सरकार द्वारा धारा 370 हटाये जाने के विरुद्ध जनादेश दिया है। लेकिन कांग्रेस केवल इस बात की खुशी जताकर चुप हो गई राज्य की जनता ने भाजपा को पराजित कर दिया। पार्टी के रुख में आया यह बदलाव उसके मन में उत्पन्न डर का परिचायक है। बरखा दत्त जैसी भाजपा विरोधी पत्रकार भी ये लिखने में संकोच नहीं कर रहीं कि जम्मू कश्मीर और हरियाणा में भले स्कोर 1- 1 रहा किंतु हारी तो कांग्रेस ही। यू ट्यूब पर राहुल गाँधी के पक्ष में माहौल बनाने में जुटे पत्रकार भी हरियाणा की हार और जम्मू  -  कश्मीर में शर्मनाक प्रदर्शन के लिए जिस प्रकार से कांग्रेस नेतृत्व को भला - बुरा कह रहे हैं वह अप्रत्यक्ष तौर पर राहुल की ही आलोचना है। लोकसभा में मिलीं 99 सीटों का पूरा श्रेय कांग्रेस समर्थक प्रचारतंत्र ने चूंकि श्री गाँधी को दे दिया था इसलिए हरियाणा की पराजय को राज्य स्तर पर भले ही भूपिंदर हुड्डा के माथे मढ़ दिया गया किंतु राष्ट्रीय स्तर पर तो उसके लिये राहुल को ही जिम्मेदार माना जा रहा है। ऐसे में महाराष्ट्र में पार्टी किसी भी प्रकार का जोखिम उठाने तैयार नहीं दिखती।  उल्लेखनीय है इस मुद्दे पर ठाकरे परिवार भी प्रारंभ से ही भाजपा के साथ खड़ा रहा है।


-रवीन्द्र वाजपेयी

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