हाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा उम्मीदवारों की सूची जारी की जा रही है । प्रत्याशियों के बारे में मतदाताओं की पसंद - नापसंद तो मतगणना के बाद ही स्पष्ट होगी लेकिन सूची सार्वजनिक होते ही जिस प्रकार से विरोध और असंतोष देखने मिलता है वह राजनीति के गिरते स्तर का परिचायक है। बड़े नेताओं के मुर्दाबाद के नारे और पुतला दहन , पार्टी दफ्तरों का घेराव और आत्मदाह का प्रयास तक होता है। जिन नेताओं को लोग अपना रहनुमा मानते हैं वे ही टिकिट कटने पर खलनायक हो जाते हैं । दशकों तक पार्टी की विचारधारा को धर्मशास्त्रों की तरह पूजने वाले उसे एक झटके में रद्दी की टोकरी में फेंकने से परहेज नहीं करते। नीतिगत निष्ठा , आदर्श सब क्षण भर में बदल जाते हैं। इसके पीछे यदि नीतिगत मतभेद हो तो बात समझ आती है किंतु मौजूदा राजनीति पूरी तरह स्वार्थ केंद्रित हो चली है। नीतियां और नेता भी तभी तक सुहाते हैं जब तक वे स्वार्थों की पूर्ति करते रहें। अधिकतर लोगों का एकमात्र लक्ष्य चुनाव की टिकिट प्राप्त करना रह गया है। केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी ने कुछ साल पहले राजस्थान विधानसभा में आयोजित कार्यक्रम में कहा था कि राजनीति में काम करने वालों की महत्वाकांक्षाओं का कोई अंत नहीं है। विधायक बनने के बाद मंत्री और मंत्री बन जाने के बाद मुख्यमंत्री बन जाने के लिए हाथ - पांव मारे जाते हैं । उस आयोजन में मंच पर कांग्रेस के नेता भी मौजूद थे। हास - परिहास में गहरी और गंभीर बात कह जाने वाले श्री गड़करी ऐसे राजनेता हैं जिनको विरोधी भी पसंद करते हैं । बावजूद इसके कि वे रास्वसंघ और भाजपा की विचारधारा के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। लेकिन उनकी अपनी पार्टी में ही ऐसे लोग लुप्त होते जा रहे हैं जो निःस्वार्थ भाव से विचारधारा की सेवा करते हों। जहाँ तक बात कांग्रेस की है तो उसमें एक ही परिवार के प्रति निष्ठा के कारण विचारधारा नामक तत्व विलुप्त हो चुका है। वहीं देश भर में फैले जो दर्जनों क्षेत्रीय दल हैं वे किसी नेता या परिवार की जागीर जैसे हैं जिनका उद्देश्य केवल निहित स्वार्थ साधने के लिए सौदेबाजी और अवसरवादी गठबंधन करना है। वामपंथी दल इस बुराई से दूर माने जाते थे किंतु राष्ट्रीय राजनीति में हाशिए पर सिमटने के कारण वे भी बेमेल गठबंधन करने मजबूर लगे हैं। भाजपा के अंध विरोध में नकारात्मक राजनीति का शिकार होने से युवा पीढ़ी उनसे विमुख होती जा रही है । जिन राज्यों की राजनीति दो ध्रुवीय है उनमें नेतागिरी के इच्छुक व्यक्ति मुख्य पार्टियों में संभावनाएं तलाशते हैं। आजकल सेवा निवृत्त नौकरशाहों को भी राजनीति का चस्का लग गया है। जिंदगी भर अफसरी करने के बाद सांसद और विधायक बन जाने की योजना के साथ ऐसे लोग किसी नेता के कृपा पात्र बनकर लालबत्ती हासिल कर लेते हैं। लेकिन ज्योंही लगता है कि स्वार्थ सिद्ध नहीं हो रहा , पाला बदलने में देर नहीं करते। दरअसल ऐसे लोगों की न तो विचारधारा में रुचि होती है और न ही वे जमीनी कार्यकर्ता बनकर काम करना पसंद करते हैं। लेकिन उनकी वजह से बरसों तक दरी - फट्टा उठाने वाले कार्यकर्ता के मन में भी महत्वाकांक्षा उछाल मारने लगती हैं । और जब लगता है कि उसके योगदान की कद्र नहीं हो रही तब वह दबाव की राजनीति पर उतारू हो जाता है। हरियाणा और जम्मू - कश्मीर के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा दोनों को इसका सामना करना पड़ा। झारखण्ड में भी टिकिट कटते ही पार्टी बदलने का सिलसिला जारी है। क्षेत्रीय दलों का तो खैर कोई ईमान - धर्म नहीं है किंतु राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते भाजपा और कांग्रेस को इस सबसे सबक लेना चाहिए। अन्यथा भविष्य में वे केवल चुनाव लड़ने वाली मशीन बनकर रह जाएंगी जिसका विचारधारा से कोई संबंध नहीं होगा । वैसे भी चुनाव जीतने के लिए पार्टी की नीतियां और कार्यक्रम आकर्षण खो चुके हैं । इसीलिए मुफ्त उपहारों का लालच देकर चुनाव रूपी वैतरणी पार करने की कोशिश होने लगी है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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