बीते सप्ताह इजरायल द्वारा ईरान पर किये गए हवाई हमले के बाद पूरी दुनिया दहशत में है। स्मरणीय है कुछ समय पहले ईराक ने भी इजरायल पर मिसाइलें दागी थीं। तभी से ये आशंका थी कि नेतन्याहू पलटवार करेंगे। हालांकि इजरायल का जैसा स्वभाव और शैली है उसे देखते हुए जवाबी हमले में काफी समय उसने लगाया। लेकिन उसके बाद ईरान ने भी बदला लेने की बात कही तो इससे दोनों देशों के बीच बड़ी जंग का अंदेशा पैदा हो गया जिसके संभावित परिणामों ने वैश्विक स्तर पर हलचल मचा दी। यही वजह है कि इजरायल के हमले को उसका अधिकार बताने वाले अमेरिका ने ईरान को दोबारा हमला न करने की समझाइश भरी चेतावनी दे डाली। दुनिया की अन्य महाशक्तियाँ भी नहीं चाह रहीं कि ईरान और इजरायल में सीधी लड़ाई हो क्योंकि वैसा होने पर दुनिया की हालत दूबरे में दो असाढ़ जैसी हो जाएगी जो रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध से ही परेशान है। सही बात ये है कि रूस पर प्रतिबंध लगाने के बाद यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। विशेष रूप से गैस और कच्चे तेल की आपूर्ति रुक जाने से आम जनता त्रस्त है। अमेरिका खुद तो ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर है वहीं सऊदी अरब के शाही परिवार से अच्छे ताल्लुकात होने से उसे खास फर्क नहीं पड़ा किंतु उसके समर्थक देशों के अलावा बाकी दुनिया हलाकान हो उठी है। ऐसे में यदि ईरान और इजरायल के बीच जंग ने बड़ा रूप लिया तब वह विश्वयुद्ध का पूर्वाभ्यास ही होगा। रूस की तरह ईरान भी कच्चे तेल एवं गैस का बड़ा उत्पादक है। हालांकि अमेरिका ने उस पर काफी पहले से आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं जिनसे भारत भी संकट में आ गया। यदि रूस से सस्ता तेल उपलब्ध नहीं होता तो हमारे यहाँ भी हाहाकार मच जाता। इन सब कारणों से ही पूरी दुनिया ये चाह रही है कि ईरान और इजरायल किसी भी कीमत पर सीधी जंग में न उलझें। यद्यपि ईरान हमास और हिज़्बुल्ला जैसे इजरायल विरोधी इस्लामिक संगठनों का संरक्षक है। ये बात भी सर्वविदित है कि जिस तरह बिना अमेरिकी समर्थन और सहायता के इजरायल अपना अस्तित्व सुरक्षित नहीं रख सकता वैसे ही हमास और हिज़्बुल्ला की पीठ पर ईरान का हाथ न हो तो वे इजरायल से टकराने की सोच भी नहीं सकते। जहाँ तक बात रूस और यूक्रेन युद्ध की है तो उसका विस्तार वहीं तक सीमित है किंतु प. एशिया में चल रही जंग में हमास और हिज़्बुल्ला के साथ ईरान ने भी इजरायल के विरुद्ध मोर्चा खोला तब इस्लामिक जगत तो उसकी आग से झुलसेगा ही , कच्चे तेल का आयात करने वाले दुनिया के तमाम देश अभूतपूर्व संकट में फंस जाएंगे। रूस और चीन चूंकि ईरान के साथ हैं इसलिए अमेरिका भी उसके विरुद्ध सीधी कारवाई से बचेगा। वैसे भी अफगानिस्तान में उसके हाथ जिस बुरी तरह झुलसे उसकी जलन अभी तक कम नहीं हुई। यही वजह है कि यूक्रेन को हर तरह की सैन्य और आर्थिक सहायता देने के बावजूद न तो अमेरिका और न ही उसके सहयोगी अन्य किसी देश ने वहाँ अपनी सेनाएं भेजीं। इजरायल और हमास के बीच युद्ध में हिजबुल्ला के भी शामिल होने के बावजूद अमेरिका या इजरायल के समर्थक अन्य यूरोपीय देशों ने सीधे हस्तक्षेप नहीं किया। इसीलिए अमेरिका ने ईरान को इजरायल पर दोबारा हमला न करने के बारे में चेताया तो अवश्य किंतु ये नहीं कहा कि वैसा नहीं करने पर वह खुद मैदान में उतरेगा। कुल मिलाकर बात ये है कि इजरायल के आत्मरक्षा के अधिकार की वकालत करने वाला अमेरिका इस बात का विरोधी है कि ईरान भी इजरायली हमले का जवाब दे क्योंकि यदि दोनों के बीच हमलों का आदान - प्रदान जारी रहा तो युद्ध का केंद्र गाज़ा से हटकर ईरान स्थानांतरित हो जायेगा और तब कच्चे तेल के कुए ही नहीं जलेंगे बल्कि पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतें भी कमर तोड़कर रख देंगी। लेकिन प्रश्न ये है कि इस आशंका को टालने कौन आगे आयेगा? ये इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि दुनिया धीरे - धीरे ही सही किंतु शीतयुद्ध के पुराने दौर में लौट रही है जिसमें अमेरिका और रूस ( पूर्व सोवियत संघ) रूपी दो महारथियों ने दुनिया को वैचारिक, आर्थिक और सामरिक आधार पर बाँट रखा था। यूक्रेन के साथ रूस ने जंग छेड़कर अमेरिका के बढ़ते प्रभुत्व को ही चुनौती दी थी। भले ही वह यूक्रेन को पराजित नहीं कर पाया किंतु अमेरिकी लाॅबी द्वारा थोपे गए आर्थिक और अन्य प्रतिबंधों के बाद भी वह झुकने को तैयार नहीं है । उसकी वजह से शीतयुद्ध के दौर जैसा ध्रुवीकरण फिर होता दिखाई दे रहा है। ऐसे में यदि ईरान और इजरायल में सीधे तौर पर लड़ाई छिड़ी तो फिर उसका दुष्प्रभाव बहुत व्यापक और भीषण होगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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