Saturday, 26 October 2024

मुफ्त योजनाएं आज नहीं तो कल बंद करना ही पड़ेंगी


चुनावी राजनीति जिस तरह से बाजारवादी संस्कृति की चपेट में आ गई है उसे लेकर अब समाज के जिम्मेदार वर्ग में चिंता दिखाई देने लगी है। सबसे रोचक बात ये है कि चुनाव हारने वाली पार्टी विजेता पर आरोप लगाती है कि उसने मतदाताओं को लालच देकर चुनाव जीता। गत वर्ष इन्हीं दिनों म.प्र के विधानसभा चुनाव में सारे सर्वेक्षण कांग्रेस और भाजपा के बीच बराबरी का मुकाबला बता रहे थे। 15 माह की कमलनाथ सरकार को छोड़ दें तो लगभग दो दशक से प्रदेश में भाजपा की सरकार रहने से सामान्य अवधारणा ये थी कि जनता उससे ऊब चुकी है और 2018 की तरह एक बार फिर सत्ता पलट देगी। लेकिन चुनाव के पहले शिवराज सिंह चौहान ने लाड़ली बहना नामक योजना शुरू की और उसका इतना जबरदस्त प्रचार किया कि बाकी सारे मुद्दे  हवा में उड़ गए। हालांकि कांग्रेस भी कर्नाटक और हिमाचल में ऐसी ही गारंटियां देकर भाजपा से  सत्ता छीन चुकी थी और म.प्र में भी  ऐसे ही वायदे कर रही थी किंतु शिवराज सरकार ने चूंकि महिलाओं के खाते में हर माह पैसे जमा करवाना शुरू कर दिया था इसलिए  महिला मतदाताओं ने दिल खोलकर भाजपा को समर्थन देकर उसकी सरकार बनवा दी। लेकिन म.प्र से ज्यादा खैरात बांटने के बाद भी राजस्थान में कांग्रेस की गहलोत सरकार को लोगों ने नकार दिया। सबसे चौंकाने वाला परिणाम आया छत्तीसगढ़ में जहाँ किसी को सपने में भी कांग्रेस सरकार के बाहर होने की उम्मीद नहीं थी। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पाँच साल में जो योजनाएं संचालित कीं उनसे भाजपा काफी दबाव में थी । लगभग सभी चुनाव विशेषज्ञ मान रहे थे कि इस राज्य में कांग्रेस वापसी करेगी किंतु जब परिणाम आये तो सब आश्चर्यचकित रह गए। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में मतदाताओं ने कांग्रेस की पाँच साल पुरानी सरकार द्वारा चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं के बाद भी उसे बदल दिया जबकि म.प्र में लगभग दो  दशक से सत्ता में जमी भाजपा को एक मौका और दे दिया। यही नजारा हाल में हरियाणा में देखने मिला जहाँ पहलवान, किसान और जवान जैसे मुद्दों से भाजपा की 10 साल से चली आ रही सरकार पर खतरे के बादल मंडरा रहे थे। लेकिन जनता ने कांग्रेस की गारंटियों को ठुकराते हुए भाजपा को स्पष्ट बहुमत दे दिया। बीते लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने महिलाओं और बेरोजगारों के खाते में हर माह हजारों रुपये जमा करने का वायदा किया जिसे खटाखट बोलकर प्रचारित किया किंतु उसका उतना असर नहीं हुआ जितना  संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने के प्रचार का। उ.प्र और महाराष्ट्र में भाजपा को इन मुद्दों ने जबरदस्त नुकसान पहुंचाया किंतु कांग्रेस शासित कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में भाजपा उससे आगे रही। इसके अलावा प. बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में क्षेत्रीय दलों के सामने भाजपा असरहीन साबित हुई किंतु उड़ीसा में उसने नवीन पटनायक के अभेद्य समझे जाने वाले गढ़ को ध्वस्त कर दिया। इस सबसे ये निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि देश की राजनीति में कोई एक मुद्दा या फॉर्मूला  चुनाव जिताने में कारगर नहीं होता और हर राज्य में अलग - अलग समीकरण काम करते हैं। राममंदिर के शुभारंभ के बावजूद लोकसभा चुनाव में उ.प्र में भाजपा के निराशाजनक प्रदर्शन ने सबको चौंका दिया। इसी तरह दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन के बाद भी भाजपा  लगातार सातों सीटें जीत गई। इससे यही समझा जा सकता है कि मुफ्त उपहारों के वायदे और जाति समीकरण हर जगह काम नहीं आते। जो भाजपा नरेंद्र मोदी के नाम पर हिमाचल, दिल्ली, म.प्र , गुजरात और छत्तीसगढ़ में  लोकसभा चुनाव में विपक्ष को चारों खाने चित्त कर देती है वह प. बंगाल और तमिलनाडु में  करिश्मा नहीं दिखा पाई। राजस्थान और महाराष्ट्र में सत्ता होते हुए भी उसे नुकसान हुआ।  ऐसे में मुफ्त खैरात कितनी प्रभावशाली है इस पर विचार करने का समय आ गया है। केंद्र सरकार करोड़ों लोगों को मुफ्त अनाज और मकान बनाकर देने के बावजूद उ.प्र में आधी से ज्यादा सीटें हार जाती है। महाराष्ट्र विधानसभा के आगामी चुनाव में शिंदे सरकार के विरुद्ध विपक्ष की मजबूत मोर्चेबन्दी के बावजूद लाड़ली बहना जैसी योजना शुरू होने से बाजी फिर सत्ता पक्ष की तरफ झुकने की चर्चा होने लगी जबकि लोकसभा चुनाव में महा विकास अघाड़ी को भारी सफलता मिली थी। ये देखते हुए राजनीतिक दलों को सोचना चाहिए कि मुफ्त योजनाओं से परहेज करते हुए ऐसे मुद्दों पर चुनाव लड़ें जिनसे खजाने में शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक परिवहन  कानून व्यवस्था और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों के लिए धन बचे। वर्तमान स्थिति में सभी राज्य कर्ज के बोझ से दबते जा रहे हैं। हिमाचल और कर्नाटक में सरकार चुनावी वायदे पूरे नहीं कर पा रही और बाकी की राज्य सरकारें हर महीने कर्ज ले रही हैं। बेहतर हो इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठे क्योंकि अंततः इसका बोझ जनता पर ही पड़ेगा और आज नहीं तो कल इस मुफ्तखोरी को बंद करना ही पड़ेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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