म.प्र के बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री अपने बेबाक बयानों के लिए चर्चित रहते हैं। भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने में वे लेशमात्र भी संकोच नहीं करते। बिहार के बोधगया में दिया उनका वह ताजा बयान चर्चा के साथ ही विवाद में भी घिर गया जिसमें उन्होंने कहा था कि हिन्दू अपने धर्मगुरुओं को अपमानित करने में आगे - आगे रहते हैं जबकि मुसलमान कभी मौलवियों के विरुद्ध कुछ नहीं बोलते। उन्होंने इस बात पर भी ऐतराज जताया कि हवस के पुजारी जैसी टिप्पणी आम तौर पर सुनाई देती है लेकिन हवस का मौलवी या पादरी नहीं कहा जाता। उनका कहना है कि हिंदुओं के दिमाग में इस तरह के शब्द प्रायोजित तरीके से भरे गए हैं। उनके इस बयान पर मुस्लिम धर्मगुरुओं की आपत्ति आने पर उनका कहना है कि पुजारी हिन्दू धर्म में अत्यंत सम्मानित होता है और उनके बयान का उद्देश्य हिंदुओं को जगाना था। उनकी उक्त टिप्पणियों से राजनीतिक हल्कों में भी हलचल है। लेकिन बिना पूर्वाग्रह के सोचा जाए तो श्री शास्त्री की बातों में काफी वजनदारी है। उनमें सांप्रदायिकता खोजने वाले निश्चित रूप से बिलबिला रहे होंगे किंतु यक्ष प्रश्न ये है कि इस तरह की टिप्पणियों का केंद्र सनातन धर्म और उससे जुड़े चरित्र ही क्यों होते हैं? भारतीय फिल्मों में भी पंडित और पुजारी सामान्यतः उपहास का पात्र होता है या उसे चरित्रहीन बताया जाता है। इसके विपरीत मौलवी और पादरियों को ज्यादातर दयावान , परोपकारी और सहृदय दिखाने का चलन है। बागेश्वर धाम प्रमुख का ये कहना बिल्कुल सही है कि हिंदुओं में अपने धर्म से जुड़े सम्माननीय व्यक्तित्वों के अपमान को चुपचाप देखने की प्रवृत्ति है जबकि मुस्लिम समाज अपने धर्म गुरुओं के विरुद्ध एक बात भी न कहता और न सुनता है। ये आरोप भी सच्चाई के काफी करीब है कि हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता को ढोने का दायित्व केवल हिंदुओं के कंधों पर है। सहिष्णुता और सर्व धर्म सद्भाव की भावना भी उन्हीं से अपेक्षित है। वैसे ये बात बिल्कुल जायज है कि बहुसंख्यक होने से हिंदुओं का फर्ज है कि वे अल्पसंख्यक समुदाय पर अपनी मर्जी न थोपें परंतु उसी के साथ ही अल्पसंख्यकों को भी चाहिए कि वे हिंदुओं की भावनाओं का सम्मान करें और बजाय टकराव के रास्ते पर चलने के उनके साथ समन्वय स्थापित करें। हमारा देश बहुधर्मी है जिसमें हिन्दू, मुस्लिम, सिख, जैन, बौद्ध , पारसी और ईसाई सभी रहते हैं। इनमें हिंदुओं की संख्या 82 प्रतिशत है। ऐसे में इसे भले ही सरकारी तौर पर हिन्दू राष्ट्र घोषित न किया गया हो किंतु बागेश्वर धाम प्रमुख द्वारा भारत को हिन्दू राष्ट्र कहे जाने पर कांग्रेस के वरिष्ट नेता कमलनाथ ने भी ये कहकर उनका समर्थन किया था कि 80 फीसदी से ज्यादा हिन्दू जिस देश में रहते हों उसे हिन्दू राष्ट्र नहीं तो और क्या कहेंगे ? रही बात धर्मनिरपेक्षता की तो वामपंथी विचारधारा से ओतप्रोत सुप्रसिद्ध शायर जावेद अख्तर को दिये एक साक्षात्कार में स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने दो टूक कहा था कि भारत संविधान के कारण धर्म निरपेक्ष नहीं है बल्कि इसलिए क्योंकि यहाँ हिंदू बहुसंख्यक हैं। वे एक पुस्तक या ईश्वर से बंधे नहीं हैं। हिन्दू धर्म की सोच इतनी उदार है कि वह नास्तिक व्यक्ति को भी अपने भीतर समाहित कर लेती है। इसके उलट मुस्लिम बहुल देशों में धर्मनिरपेक्षता के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। ज्यादा दूर क्यों जाएं हमारे पड़ोसी पाकिस्तान और बांग्ला देश को ही देखें तो वहाँ रहने वाले हिंदुओं और ईसाइयों की दयनीय स्थिति किसी से छिपी नहीं है। इंडोनेशिया ही संभवतः अपवाद होगा जो मुस्लिम बहुल होने के बावजूद भारतीय संस्कृति से अपना जुड़ाव बनाये हुए है। समूचे अरब जगत में एक भी मुस्लिम बहुल देश सिवाय इस्लाम के अन्य किसी धर्म को प्रोत्साहित नहीं करता। हमारे देश में रहने वाले गैर हिंदुओं को प्राप्त धार्मिक आजादी पर किसी को आपत्ति नहीं है किंतु इसके चलते हिंदुओं के धार्मिक रीति रिवाजों और व्यक्तित्वों का अपमान किया जाना धर्मनिरपेक्षता के खोखलेपन को उजागर करता है। ये बात पूरी तरह सच है कि सैकड़ों वर्षों की गुलामी ने हिंदुओं के संगठनात्मक ढांचे को कमजोर किया है। आजादी के बाद गंगा - जमुनी संस्कृति का जो स्वांग रचा गया उसने भी बहुत नुकसान पहुंचाया। ऐसे में धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने जो मुद्दा छेड़ा उस पर हिन्दू समाज तो मंथन करे ही किंतु उनकी बात का विरोध कर रहे लोगों को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि धर्मनिरपेक्षता का पालन अकेले बहुसंख्यक समुदाय की जिम्मेदारी ही नहीं है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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