Wednesday, 9 October 2024

राहुल की राजनीतिक समझ और नेतृत्व क्षमता फिर सवालों के घेरे में


लोकसभा चुनाव में 99 सीटें जीतने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गाँधी का हौसला  सातवें आसमान पर चढ़ गया था। लोकसभा में दिये भाषणों के आधार पर  प्रशंसक उन्हें नरेंद्र मोदी का विकल्प बताने लगे। खुद श्री गाँधी  प्रधानमंत्री पर जिस तरह से कटाक्ष करने लगे उससे ऐसा लगने लगा जैसे नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद देश वे ही चलाएंगे। मोदी जी का सीना अब 56 इंच का नहीं रहा, वे  मुझसे नजर नहीं मिला सकते, भाजपा के हिंदुत्व को जनता ने नकार दिया, आप हिन्दू नहीं हो, हम जातिगत जन गणना करवाकर रहेंगे जैसी टिप्पणियों से राहुल ये साबित करने में जुटे हुए थे कि अब वे पप्पू वाली छवि से बाहर निकलकर एक परिपक्व  व्यक्ति बन गए हैं। लेकिन उनके कतिपय बयानों से स्पष्ट हो गया कि उनमें गंभीरता नहीं आई। बजट बनाने वाले अधिकारियों के अलावा किसी मिस इंडिया के दलित या ओबीसी न होने जैसे बयान देकर उन्होंने  प्रमाणित कर दिया कि वे रट्टू तोते जैसे हैं जो कुछ बातों को ही दोहराया करते हैं। अपनी पिछली अमेरिका यात्रा के दौरान भी वे जातिगत आरक्षण का मुद्दा उठाकर मजाक का पात्र बन गए ।  गत दिवस जम्मू - कश्मीर और हरियाणा विधानसभा के जो चुनाव परिणाम आये उनमें कांग्रेस का प्रदर्शन इस बात का प्रमाण  है कि राहुल को लेकर कांग्रेस ने जो उम्मीदें पाल रखी हैं वे पूरी नहीं हो सकेंगी। जम्मू - कश्मीर में पार्टी की सीटें पिछले चुनाव की तुलना में आधी रह गईं। मतदान के कुछ दिन पहले ही उमर अब्दुल्ला ने श्री गाँधी को इस बात के लिए लताड़ा कि उनको बजाय घाटी के जम्मू  के हिन्दू बहुल क्षेत्रों में सक्रिय होना चाहिए , जहाँ कांग्रेस का काम ही शुरू नहीं हुआ।   उनकी बात सही निकली क्योंकि पार्टी दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू सकी। यदि नेशनल कांफ्रेंस से गठबंधन नहीं हुआ होता तब शायद उसकी दशा पीडीपी से भी बदतर हो सकती थी। हरियाणा में तो कांग्रेस की जीत का अनुमान हर कोई लगा रहा था। चुनाव पूर्व सर्वेक्षण से लेकर एग्जिट पोल तक भाजपा के प्रति मतदाताओं की नाराजगी बताते हुए कांग्रेस की बड़ी जीत की भविष्यवाणी कर रहे थे। लोकसभा चुनाव का शानदार प्रदर्शन पार्टी की उम्मीदों का आधार था। लेकिन नतीजे पूरी तरह उलट गए। सीटें और मत प्रतिशत बढ़ने के बाद भी कांग्रेस बहुमत से दूर रह गई। राहुल ने हरियाणा में भी प्रचार किया किंतु वहाँ भी बचकानेपन से बाज नहीं आये । जलेबी की फैक्ट्री वाला बयान देकर खुद की तो हंसी उड़वाई ही, पार्टी का भी नुकसान किया। पार्टी के सबसे बड़े नेता होने के नाते उनका दायित्व था कि इस राज्य के जमीनी हालात का अध्ययन करते लेकिन वे भाजपा और प्रधानमंत्री का मजाक उड़ाने में लगे रहे और अंत में खुद मजाक का पात्र बन बैठे। दूसरी तरफ भाजपा ने लोकसभा चुनाव में आशाजनक सफलता नहीं मिलने के बाद बिना निराश हुए अगले मोर्चों पर तैयारी शुरू कर दी। वह जानती थी कि जम्मू - कश्मीर में उसको बहुमत नहीं मिलेगा किंतु उसने 2014 की अपेक्षा अपनी सीटें भी बढ़ाईं  और मत प्रतिशत में भी सबसे आगे रही। हरियाणा में लोकसभा की 5 सीटें गंवाने के बाद भी पार्टी ने बेहतर संगठन क्षमता का प्रदर्शन किया। कांग्रेस हवा में उड़ती रही जबकि भाजपा ने जमीन पर रहकर मतदाता के साथ संवाद कायम किया जिसका लाभ उसे मिला।  चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस की प्रतिक्रिया में न गंभीरता नजर आई और न ही गरिमा। जम्मू  - कश्मीर में भाजपा को पटकने की शेखी बघारने वाले पार्टी प्रवक्ता ये बताने से बचते रहे  कि वहाँ कांग्रेस का प्रदर्शन इतना दयनीय क्यों रहा? हरियाणा की हार को अप्रत्याशित और अस्वीकार्य बताकर पार्टी ने जो खिसियाहट दिखाई गई उससे ये साफ हो गया कि लोकसभा चुनाव में मिली 99 सीटों का खुमार अभी तक बना हुआ है। ईवीएम पर हार का ठीकरा फोड़ने के साथ ही चुनाव आयोग पर आरोप लगाने का घिसा - पिटा तरीका अपनाकर कांग्रेस ने साबित किया कि उसे जनादेश  का सम्मान करना नहीं आता। लोकसभा चुनाव के बाद उसके जो प्रवक्ता एग्जिट पोल करने वालों पर आग बबूला हो रहे थे वे ही कल उनके गलत होने पर आंसू बहाते दिखे। हरियाणा  की हार ने कांग्रेस  में आये अहंकार को जमीन दिखा दी। महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव) की प्रवक्ता ने उसको नसीहत देते हुए कहा कि वह सीधे मुकाबले में भाजपा के सामने नहीं टिकती। संजय राउत ने तो यहाँ तक कह दिया कि कांग्रेस महाराष्ट्र में अकेले लड़ने की इच्छुक हो तो स्पष्ट करे। उ.प्र में होने जा रहे 10 विधानसभा उपचुनावों में सपा से आधी टिकिटें मांगने का उसका दबाव भी कमजोर पड़ जायेगा। कुल मिलाकर ये कह सकते हैं कि इन चुनावों ने लोकसभा चुनाव में लगे झटके से भाजपा को उबार दिया। मोदी मैजिक का असर भी दो राज्यों  में साफ नजर आया । लेकिन दूसरी तरफ राहुल गाँधी की राजनीतिक समझ और नेतृत्व क्षमता एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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