Friday, 18 October 2024

प्रतिमा की आँखों से पट्टी हटाने मात्र से कानून का अंधापन दूर नहीं होगा


सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डी. वाय. चंद्रचूड़ आगामी 10 नवम्बर को सेवानिवृत होने जा रहे हैं।  उनके 2 वर्ष के कार्यकाल में सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक महत्वपूर्ण फैसले सुनाए। गत दिवस भी बांग्ला देश से आये घुसपैठियों के सम्बन्ध में भी एक साहसिक निर्णय सुनाया गया। उल्लेखनीय है श्री चंद्रचूड़ के स्वर्गीय पिता सर्वोच्च न्यायालय में सर्वाधिक लंबे समय तक मुख्य न्यायाधीश रहे थे। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि न्यायपालिका में वंशवाद की जो परंपरा चली आ रही है वे भी उससे लाभान्वित हुए होंगे किंतु उनकी शैक्षणिक और पेशेवर योग्यता को देखते हुए उक्त अवधारणा गलत प्रतीत होती है। श्री चंद्रचूड़ ने अपने पिता द्वारा अतीत में दिये फैसले को उलटने तक का उदाहरण पेश किया था। अनेक मामलों में उनका सरकार से टकराव भी देखने मिला। इलेक्टोरल बाँड प्रकरण इसका प्रमाण है। लेकिन उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय की कार्य पद्धति में सुधार के जो प्रयास किये वे प्रशंसनीय हैं। हालांकि उनका कितना असर हुआ इसका आकलन तो भविष्य में ही हो सकेगा किंतु  राष्ट्रीय महत्व के  सम - सामयिक मुद्दों पर वे जिस बेबाकी से अपने विचार व्यक्त करते रहे वह प्रभावित करने वाला है। अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में गत दिवस उनके एक और कार्य ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। न्यायालयों में आँख पर पट्टी बांधे , एक हाथ में तराजू और दूसरे में तलवार लिये न्याय की देवी की जो प्रतिमा देखने मिलती है वह मिस्र और ग्रीक से होते हुए अंग्रेजों के जमाने में भारत आई और इसे जन - जन में पहचान दिलवाने में फिल्मों की भी भूमिका रही। इस प्रतिमा का प्रतीकात्मक संदेश ये है कि न्याय की अपनी आँखें नहीं होतीं वह साक्ष्य पर आधारित व्यवस्था है जो उसके समक्ष खड़े व्यक्ति को न देख पाने के कारण उससे प्रभावित नहीं होती। उसके हाथ में तराजू से आशय न्याय के समक्ष सब समान हैं और तलवार इस बात का संकेत है कि अपराधी को दंड मिलकर रहेगा। इसी प्रतिमा के कारण अंधा कानून जैसे कटाक्ष प्रचलित हुए। गत दिवस ये समाचार आया कि श्री चंद्रचूड़ ने न्याय देवी की एक नई प्रतिमा बनवाकर सर्वोच्च न्यायालय के  पुस्तकालय भवन के  सामने  रखवाई है जिसकी आँखों में पट्टी नहीं  बंधी और  हाथों में तराजू के अलावा संविधान है। वैसे  ये प्रतिमा गत वर्ष ही लगा दी गई थी किंतु  उसकी खबर अब जाकर सार्वजनिक हुई। आँखों में पट्टी बांधे हुए न्याय की देवी की प्रतिमा देखने के आदी हो चुके लोगों को श्री चंद्रचूड़ की इस परिकल्पना में निहित सदाशयता कितनी पसंद आयेगी ये फ़िलहाल कहना कठिन है । लेकिन इस समाचार के प्रसारित होते ही  टिप्पणियाँ आने लगीं कि क्या न्याय देवी की प्रतिमा की आँखों से पट्टी हटने मात्र से न्याय व्यवस्था उन तमाम आरोपों से बरी हो सकेगी जो उस पर आये दिन लगते हैं। अंधा कानून जैसा शब्द सही मायनों में समाज के उस बड़े वर्ग के गुस्से की अभिव्यक्ति  है जो न्यायपालिका की देहलीज पर बड़ी उम्मीद लिए जाता है किंतु वहाँ के क्रियाकलापों को देखकर उसका मन खिन्न हो उठता है। पेशियाँ बढ़ना  , वकीलों की मोटी फीस , प्रकरणों के विशाल ढेर के मुकाबले  न्यायाधीशों की बेहद कम संख्या और न्यायपालिका में घुस गया भ्रष्टाचार का वायरस इस पवित्र पेशे की प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचाने वाला है। न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए  प्रचलित कालेजियम व्यवस्था को जारी रखने की अकड़ ने भी न्यायपालिका के प्रति सम्मान को घटाया । ये देखते हुए श्री चंद्रचूड़ यदि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को मान्यता देने का साहस दिखाते तब वह न्याय व्यवस्था  में सुधार की दिशा में उनका ऐतिहासिक योगदान होता। लोकतंत्र के जो तीन स्थापित स्तंभ हैं उनमें न्यायपालिका ही है जो विधायिका और कार्यपालिका दोनों के निर्णयों की समीक्षा करने का अधिकार रखती है। संसद के पास भले ही कानून बनाने का अधिकार होने से उसको सर्वोच्च माना जाता है किंतु जब बात कानून के राज की आती है तब न्यायपालिका का फैसला ही मान्य होता है। अपवादस्वरूप जब भी किसी सत्ताधीश ने न्यायपालिका से टकराने का दुस्साहस किया तो जनता ने उसे सजा दी। स्व. इंदिरा गाँधी और स्व. राजीव गाँधी इसके उदाहरण हैं। संसद के दोनों सदनों द्वारा सर्वसम्मति से पारित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन के प्रस्ताव को रद्द किये जाने के बाद यदि संसद चाहती तो अपनी सर्वोच्चता का प्रदर्शन कर सकती थी किंतु उसने न्यायपालिका का लिहाज किया। बेहतर होता श्री चंद्रचूड़ ऐसा कुछ कर जाएं जो न्याय व्यवस्था में विश्वास को पुनर्स्थापित कर सके। न्याय की देवी की आँखों से पट्टी हटवाने की उनकी पहल निश्चित रूप से स्वागत योग्य है किंतु मात्र इतना कर देने से कानून के अंधेपन को लेकर जनमानस में व्याप्त अवधारणा दूर नहीं होगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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