Tuesday, 1 October 2024

राज्य माता का दर्जा देने मात्र से गाय पालने के प्रति उत्साह नहीं जाग सकता

 

चुनाव से पहले सत्ता में बैठे लोगों द्वारा लोक लुभावन घोषणाएं करना एक परिपाटी है । इसी के चलते महाराष्ट्र की शिंदे सरकार ने म.प्र की लाड़ली बहना की नकल करते हुए लड़की बहिन योजना प्रारंभ की जिसमें प्रति माह 1500 रु. दिये जा रहे हैं। इस योजना का असर भी दिखाई देने लगा है । और भी ऐसे ऐलान राज्य सरकार की तरफ से किये जा रहे हैं जो मतदाता को आकर्षित कर सकें। इसी क्रम में गत दिवस देशी गाय को राज्य माता का दर्जा देने के  साथ ही उसे पालने पर प्रतिदिन 50 रु. अनुदान देने की घोषणा भी की गई। देशी नस्ल की गायों को पालने के लिए राज्य सरकार की ओर से की गई पहल सतही तौर पर तो काफी अच्छी प्रतीत होती है। लेकिन गो पालन को प्रोत्साहित करने की सरकारी योजनाओं का जो हश्र अन्य राज्यों में हुआ उसे देखते हुए महाराष्ट्र सरकार की इस घोषणा से देशी गाय पालने के लिए लोगों को आकर्षित करने का उद्देश्य पूरा होने पर संदेह करना गलत नहीं होगा। म.प्र सहित अनेक राज्यों ने गोशालाओं हेतु अनुदान देने की नीति बना रखी है किंतु उनमें गायों की दुर्दशा  किसी से छिपी नहीं है। भोपाल के निकट एक गोशाला में तो सैकड़ों गायें मर गईं। सरकार उनके रखरखाव और भरण - पोषण हेतु जो अनुदान देती है वह भी किसी मजाक से कम नहीं। पहले  शहरों के निकट पर्याप्त  खुली जगह होती थीं उनमें  गाय - भैंस को चरने भेजा जाता था। शहरों के असीमित विस्तार ने वह सुविधा  छीन ली जिससे गाय के लिए आहार का खर्च भी बढ़ गया। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि दुग्ध व्यवसाय में भैंस का उपयोग ज्यादा होने से भी गाय पालने से लोग बचने लगे। ग्रामीण क्षेत्रों में पहले कृषि के साथ गाय पालना आम था। कुछ लोग भैंस भी रखते थे किंतु जब तक बैलों से खेती होती रही तब तक गाय का पालन अनिवार्यता थी क्योंकि बछड़ा ही आगे चलकर बैल बनता था। हालाँकि खेती में मशीनों का उपयोग बढ़ने के बाद भी  ग्रामीण ही नहीं बल्कि शहरों में रहने वाले हिन्दू भी गाय के प्रति श्रद्धा रखते हैं । ज्यादातर घरों में गाय की रोटी आज भी बनती है। उसको माँ कहा जाता है। गो हत्या को पाप की श्रेणी में माना गया है। बहुसंख्यक हिंदुओं की भावनाओं का  सम्मान करते हुए देश के 28 में से 20 राज्यों में गो वध प्रतिबंधित है। हालाँकि प. बंगाल सहित पूर्वोत्तर के राज्यों में उस पर रोक नहीं है और वहाँ गोमांस खाया भी जाता है। भारत में हिंदुओं के अलावा जैन, सिख बौद्ध और पारसी भी गोमांस से परहेज करते हैं। गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग भी धर्म गुरुओं द्वारा उठाई जाती रही किंतु उस पर किसी भी सरकार ने ध्यान नहीं दिया। कुल मिलाकर गोपाल ( श्रीकृष्ण) की आराधना करने वाले देश में गाय के प्रति श्रद्धा के बावजूद उपेक्षा भाव बढ़ता गया जिससे धीरे - धीरे उसके पालन के प्रति रुचि भी घट गई। इसका सबसे ज्वलंत प्रमाण है शहरों और राजमार्गों पर बैठे गायों के झुंड। जो लोग गाय रखे हुए हैं वे भी दूध निकालने  के बाद उसे छोड़ देते हैं । जो गाय दूध देना बंद कर देती हैं वे भी बेसहारा हो जाती हैं । इसीलिए प्रति माह देश भर में हजारों गायें राजमार्गों पर ट्रकों से कुचलकर मारी जाती हैं जिनका शव वहीं सड़ता रहता है। ये सब देखते हुए महाराष्ट्र सरकार द्वारा देशी गाय को राज्य माता का दर्जा देना उसके पालन के प्रति लोगों में उत्साह का सृजन कर सकेगा ये कहना मुश्किल है। और फिर 50 रु. प्रतिदिन का अनुदान भी ऊँट के मुँह में जीरा समान ही है। वैसे गाय के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रयास हर दृष्टि से स्वागत योग्य हैं। गाय का दूध औषधि तुल्य माना जाता है। भैंस की तुलना में उसका रखरखाव भी कम खर्चीला है किंतु वह व्यवसायिक दृष्टि से फायदेमंद नहीं मानी जाती। इसीलिए अधिकतर डेरियों में भैंसे ही होती हैं। वैसे कुछ बड़े शहरों में गाय के दूध और उससे बने घी आदि की अच्छी कीमत मिलती है किंतु ग्रामीण इलाकों और मध्यम श्रेणी के शहरों में लोगों की क्रय शक्ति उतनी नहीं होती। गुजरात जैसे राज्य में अमूल ने दुग्ध उत्पादकों को जिस तरह आर्थिक संबल प्रदान किया वह व्यवस्था  मार्गदर्शक का काम कर सकती है। सही बात ये है कि अर्थ प्रधान इस युग में आस्था पर व्यवसायिकता हावी है। जिस प्रकार हिन्दी को राजभाषा बनाये जाने के बाद भी वह अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव को कम नहीं कर पा रही क्योंकि रोजगार प्राप्ति में वह उसके जितनी सहायक नहीं है। उसी तरह गाय को राज्य माता क्या राष्ट्र माता का  दर्जा दे दिया जाए तब भी उसके पालन के प्रति रुचि तब तक नहीं बढ़ेगी जब तक वह आर्थिक तौर पर  लाभदायी न हो। और भला 50 रु. रोजाना के अनुदान के लिए कौन गाय पालेगा? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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