जरात विधानसभा के पिछले चुनाव के बाद जब आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला तब संसद से सड़क तक उसके नेता ये कहते हुए जश्न मनाते दिखे कि महज 10 साल के भीतर इस दल ने ये उपलब्धि हासिल कर ली। दिल्ली के बाद पंजाब में सरकार बनाकर वह पहली ऐसी पार्टी बन गई जिसने एक केंद्र शासित राज्य में अपना प्रभुत्व कायम करने के बाद किसी पूर्ण राज्य में सरकार बनाई और वह भी प्रचंड बहुमत के साथ। हालांकि वह अनेक राज्यों में हाथ - पाँव मारती रही किंतु गुजरात में 5 विधायकों के अलावा उसे अन्य कहीं उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली। गोवा में 2 विधायकों के अलावा उसका एक विधायक हाल ही में जम्मू - कश्मीर में भी चुना गया। लोकसभा चुनाव में भी आम आदमी पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। जबकि वह विपक्षी गठबंधन इंडिया का हिस्सा थी। दिल्ली में कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ने के बावजूद उसका सफ़ाया हो गया। पंजाब में उसने अकेले लड़ने का निर्णय करते हुए दावा किया कि वह सभी 13 सीटें जीतकर विधानसभा का प्रदर्शन दोहरायेगी किंतु 3 सीटों से ही संतोष करना पड़ा। चुनाव परिणाम आते ही आम आदमी पार्टी ने ये घोषणा कर दी कि आगे वह एकला चलो की नीति पर चलेगी। इसके पीछे दिल्ली विधानसभा के आगामी चुनाव हैं जिनमें वह अपना एकाधिकार बनाये रखना चाहेगी। ये भी सही है कि दिल्ली के कांग्रेस नेता आम आदमी पार्टी को फूटी आँखों नहीं देखना चाहते। जिस शराब घोटाले में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया को जेल जाना पड़ा और अंततः श्री केजरीवाल को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा उसकी शिकायत कांग्रेस ने ही उपराज्यपाल से की थी। उक्त नेताओं के गिरफ्तार होने पर भी प्रदेश कांग्रेस द्वारा खुशी व्यक्त की गई। फिर भी हरियाणा विधानसभा के हालिया चुनाव में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस से गठजोड़ का भरसक प्रयास किया जिसे राहुल गाँधी का भी समर्थन मिला किंतु प्रादेशिक नेताओं विशेष रूप से भूपिंदर सिंह हुड्डा को चूंकि कांग्रेस की लहर का गुमान हो चला था लिहाजा उन्होंने गठबंधन से साफ इंकार कर दिया। इससे क्षुब्ध होकर श्री केजरीवाल ने 90 में से 88 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिये। उनको ये आत्मविश्वास था कि गृह प्रदेश होने के कारण उनकी पार्टी को सम्मानजनक सीटें मिल जाएंगी। वहीं त्रिशंकु की स्थिति में सत्ता का रिमोट कंट्रोल उनके पास होगा। लेकिन परिणाम ने सबको चौंका दिया। सारी अटकलें और अनुमान धरे रह गए और भाजपा ने लगातार तीसरी बार सरकार बनाकर रिकार्ड कायम कर दिया वहीं कांग्रेस भी 37 सीटों के साथ मजबूत विपक्ष बनने में सफल हो गई। लेकिन आम आदमी पार्टी के हिस्से में सभी उम्मीदवारों की जमानत जप्त होने की बदनामी ही आई। हरियाणा में हुई फजीहत से भन्नाई आम आदमी पार्टी के जले पर नमक छिड़क दिया दिल्ली कांग्रेस के नेताओं ने उसका मजाक उड़ाकर। इसीलिए उसके तत्काल बाद आम आदमी पार्टी का बयान दिल्ली विधानसभा का चुनाव अकेले लड़ने के बारे में आ गया। साथ ही उसने कांग्रेस के अहंकार पर भी तंज कसा। इस प्रतिक्रिया से ये अंदाज लगने लगा कि श्री केजरीवाल अपनी पार्टी की अलग पहिचान बनाने के लिए महाराष्ट्र और झारखंड में अकेले उतरेंगे। लेकिन पार्टी की ओर से इसके विपरीत ये बयान आ गया कि वह उक्त राज्यों के चुनाव से दूर रहेगी और अपना पूरा ध्यान दिल्ली पर केंद्रित करेगी। इस प्रकार ये स्पष्ट हो गया कि हरियाणा की हार ने श्री केजरीवाल की असीमित महत्वाकांक्षाओं को धक्का पहुंचाया है। थोक के भाव हुई जमानत जप्ती के कारण वे महाराष्ट्र और झारखंड के मुकाबले में शामिल होने की हिम्मत ही नहीं कर सके। वैसे इस फैसले से लगने लगा है कि आम आदमी पार्टी को अब जाकर ये समझ में आया कि एक दो राज्यों में मिले मतों के आधार पर भले ही उसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिल गया किंतु राष्ट्रीय पार्टी होना इतना आसान नहीं है। आम आदमी पार्टी यदि दिल्ली में मिली सफलता से अति उत्साहित होकर पैर फैलाने की जल्दबाजी न करती तब शायद उसका दामन दाग़दार न हुआ होता। प्रधानमंत्री और भाजपा से बेवजह टकराने की जिद में श्री केजरीवाल को उन नेताओं के साथ मंच पर खड़ा होने मजबूर होना पड़ा जिन्हें वे सबसे भ्रष्ट की सूची में रखते थे। ये देखते हुए उसके लिए यही बेहतर होगा कि वह धैर्य पूर्वक आगे बढ़े। बिना मजबूत संगठन और स्पष्ट विचारधारा के राष्ट्रीय स्तर पर फैलाव करना आसान नहीं होता। आज की स्थिति में पंजाब में आम आदमी पार्टी सरकार तेजी से अलोकप्रिय होती जा रही है वहीं दिल्ली में भी उसकी साख और धाक दोनों में कमी आई है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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