Saturday, 12 October 2024

सनातन , हिंदुत्व और हिन्दू राष्ट्र के प्रति बढ़ता समर्थन संघ की उपलब्धि





राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की अलख जगाने के लिए 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में स्व. डाॅ. केशव बलीराम हेडगेवार ने मुट्ठी भर लोगों के साथ जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नामक संगठन की स्थापना की थी वह शताब्दी वर्ष में प्रविष्ट हो गया। स्वाधीनता के 22 वर्ष पूर्व अस्तित्व में आये इस संगठन का उद्देश्य जाति, भाषा और सांस्कृतिक विविधता के कारण बिखरे हुए हिंदू समाज को संगठित कर एक ऐसा सामाजिक ढांचा खड़ा करना था जिससे जुड़े व्यक्ति के मन में भारत की एकता और इसके प्राचीन गौरव को पुनर्स्थापित करने का भाव हो और निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर देश हमें देता है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखें का विचार जिनकी प्रेरणा का स्रोत हो। ये प्रश्न संघ के प्रारम्भ से ही  उठता रहा है कि वह केवल हिंदुओं की ही बात क्यों करता है और जब इस देश में हिंदुओं के अलावा मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, जैन तथा पारसी आदि धर्मों के अनुयायी भी रहते हैं तब वह भारत को हिन्दू राष्ट्र क्यों कहता है ? यद्यपि भारत का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था और पाकिस्तान ने अलग होते ही खुद को इस्लामिक देश घोषित कर लिया किंतु भारत ने ऐसा करने के बजाय  सर्व धर्म समभाव के पुरातन विचार को अपनाया और सभी को अपनी आस्था और पूजा पद्धति के अनुरूप धार्मिक क्रिया हेतु स्वतंत्रता प्रदान की।  लेकिन रास्वसंघ द्वारा भारत को हिन्दू राष्ट्र कहने के पीछे उसकी भौगोलिक रचना है जो हिमालय से सिंधु ( समुद्र) फैली है। और इसी आधार पर  इसके दायरे में रहने वाले सभी लोग चाहे वे किसी भी धर्म या संप्रदाय के हों, उनकी राष्ट्रीयता हिमालय और सिंधु के संक्षिप्तीकरण के रूप में हिन्दू ही  है। यहाँ यह स्पष्ट करना जरूरी है कि भारत के बहुसंख्यक निवासियों द्वारा हजारों वर्ष से जिस धर्म का पालन किया जाता रहा उसका नाम हिन्दू न होकर सनातन है। हिन्दू शब्द तो जैसा ऊपर बताया गया भौगोलिक रचना पर आधारित है और विदेशी आक्रांताओं ने भी  इसी नाम का उपयोग किया । आजादी के दौरान भी ज्यादातर लोग इसे हिंदुस्तान ही कहते थे। और अभिवादन के लिए जय हिन्द ही कहा जाता था। आजादी के बाद 15 अगस्त 1947 को लालकिले की प्राचीर से प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने अपने भाषण की समाप्ति के बाद तीन बार जय हिन्द बोलने की जो परंपरा स्थापित की उसका पालन अब तक के सभी प्रधानमंत्री करते आ रहे हैं। इकबाल ने भी सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा लिखा।  लेकिन भारत के संविधान की प्रस्तावना में इंडिया जो कि भारत है लिखे जाने के बाद से देश का अधिकारिक नाम भारत हो गया किंतु हिंदुस्तान भी आज तक बोलचाल में है और जय हिन्द भी। संघ का हिन्दू राष्ट्र वस्तुतः धर्म के बजाय राष्ट्रीयता पर आधारित विचार है जिसे वामपंथियों ने मुस्लिम विरोधी प्रचारित करना शुरू कर दिया क्योंकि उन्हें संघ से अपने लिए खतरा नजर आने लगा था। चूँकि पं. नेहरू भी साम्यवादी विचारधारा के प्रति  आकर्षित थे अतः उनका सहारा लेकर कांग्रेस में अनेक वामपंथी घुस आये। धीरे - धीरे वे सत्ता तथा और संगठन के साथ ही शिक्षा और संस्कृति जैसे क्षेत्रों में भी काबिज होते गए। प्रशासन में भी साम्यवादी चेहरे भरे जाते रहे। इंदिरा गाँधी की सत्ता रहते तक तो कांग्रेस पूरी तरह वामपंथियों की चारागाह बन चुकी थी। इनके कारण ही संघ जैसे देशभक्त संगठन पर प्रतिबंध लगाए गए। गाँधी जी की हत्या से इसका सिलसिला शुरू हुआ जो 1992 में बाबरी ढांचा गिरने तक जारी रहा। हालांकि हर प्रतिबंध के बाद वह और शक्तिशाली होकर उभरा क्योंकि उस पर लगे आरोप साबित नहीं हो सके। संघ ने अपने को राजनीति से दूर रखा किंतु जब भी देश और लोकतंत्र पर खतरा आया उसने आगे आकर संघर्ष किया जिसके परिणाम बेहद सकारात्मक निकले। जब संघ की विचारधारा और हिंदुत्व का भाव समाज में तेजी से फैलने लगे तो वे राजनीतिक शक्तियाँ एकजुट होने लगीं जिन्हें हिंदुत्व और हिन्दू राष्ट्र से नफरत है। संघ का अंधा विरोध करने के लिए इन्होंने मुस्लिम परस्ती का दामन थामा। जिसका लाभ लेकर आतंकवाद देश की  एकता और अखंडता के लिए खतरा बन गया। बीते कुछ वर्षों में हिन्दू , हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के विरुद्ध एक सुनियोजित षडयंत्र रचा जा रहा है जिसे विदेशी शक्तियों का समर्थन प्राप्त है। देश के अनेक सीमावर्ती राज्यों में देश विरोधी ताकतों का उभार इसका प्रमाण है। संघ द्वारा सनातन धर्म के अनुयायियों के बीच सामाजिक समरसता कायम करने के जो प्रयास किये गये उनके अनुकूल  परिणाम निकलने से विरोधी ताकतें बौखलाकर बहुसंख्यक समाज में जाति आधारित विभाजन करने का खतरनाक खेल खेलने में जुटी हैं। लोकसभा चुनाव में इसका असर देखने मिल चुका है। उसके बाद से देश में मुस्लिम कट्टरपंथी जिस तेजी से आक्रामक हुए वह भारत में बांग्ला देश जैसे हालात उत्पन्न करने का प्रयास है। ऐसी स्थितियों में हिन्दू संस्कृति और हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को मजबूत करना सर्वोच्च प्राथमिकता है जिसे रास्वसंघ ही अमली जामा पहना सकता है। यही कारण है कि ज्यादातर राजनीतिक दल संघ को लेकर विष वमन किया करते हैं। लेकिन अपनी देशभक्ति , अनुशासन और सेवाभाव के कारण उसका विस्तार पूरे देश में हो चुका है। समाज के जिम्मेदार वर्ग  में ये विश्वास तेजी से मजबूत होता जा रहा है कि संघ की शक्ति ही विघटनकारी ताकतों का सामना कर सकती है। संघ का शताब्दि वर्ष में प्रवेश उम्मीदें जगाने वाला है। 99 वर्षों की उसकी गौरवशाली यात्रा विश्व इतिहास में अनोखी है। देश के बाहर भी संघ के स्वयंसेवक देश की साख और धाक जमाने में जुटे हुए हैं। सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संघ की प्रभावशाली उपस्थिति उसकी सफलता और स्वीकार्यता का प्रमाण है। महर्षि अरविंद और स्वामी विवेकानंद ने 21 सदी भारत की होने की जो भविष्यवाणी की थी , रास्वसंघ उसे  सही साबित करने में जुटा हुआ है। सनातन , हिंदुत्व और हिन्दू राष्ट्र के प्रति बढ़ता समर्थन संघ की बड़ी उपलब्धि है। शताब्दि वर्ष में उसकी भूमिका पर देश ही नहीं समूचे विश्व की निग़ाह रहेगी। 

आलेख :- रवीन्द्र वाजपेयी


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