सरे महायुद्ध के बाद दुनिया दो धड़ों में बंट गई थी। एक का नेतृत्व अमेरिका तो दूसरे का सोवियत संघ के पास था। इनसे अलग गुट निरपेक्ष देशों का भी एक संगठन बना जिसमें भारत, मिस्र, यूगोस्लाविया और इंडोनेशिया आदि थे। हालांकि इनका झुकाव कुछ - कुछ सोवियत संघ की तरफ दिखाई देता था। चीन लंबे समय तक विश्व बिरादरी से अलग - थलग रहा। लेकिन 1972 में सं.रा.संघ में प्रवेश और सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने के बाद संतुलन बदलने लगा। अमेरिका और सोवियत संघ का दबदबा मुख्य रूप से परमाणु शक्ति संपन्न होने के साथ ही अंतरिक्ष के क्षेत्र में बढ़ते कदम थे। लेकिन चीन ने जल्द ही अपनी उपस्थिति एक महाशक्ति के तौर पर महसूस करवा दी। माओ युग में बने लौह आवरण से बाहर निकलकर उसने अपने दरवाजे पूंजी निवेशकों के लिए खोल दिये। 1991 में सोवियत संघ बिखर गया और उसके मुख्य घटक रूस की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय होने का लाभ चीन को मिला। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि 21 वीं सदी के पहले दो दशक चीन के नाम लिखे जा सकते हैं। लेकिन इस दौरान रूस ने फिर पाँव जमाये और अमेरिका को चुनौती देने के लिए कूटनीतिक पहल की। ब्रिक्स नामक संगठन उसी का परिणाम है जिसमें ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका हैं। यद्यपि इस संगठन के गठन के पीछे शीतयुद्ध जैसी कोई भावना नहीं थी किंतु उसमें शामिल सभी देश वैश्विक अर्थव्यस्था में तेजी से उभर रहे थे। उदारीकरण की जो बयार 20 वीं सदी के अंतिम दौर में बही उसने साम्यवाद को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया। यहाँ तक कि चीन उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादन का गढ़ बन गया जिन्हें वह अमेरिकी पूंजीवाद का एजेंट मानकर त्याज्य समझता था। इसी के साथ बीते दो दशकों में भारत भी दुनिया की महाशक्ति के रूप में अपनी जगह बनाने में कामयाब हो गया । ये अवधारणा भी प्रबल होने लगी कि वह जल्द ही चीन को पीछे छोड़ सकता है। कोरोना के बाद दुनिया में आये बदलाव ने ब्रिक्स जैसे संगठन का महत्व बढ़ा दिया। हालांकि जी -8 और जी-20 आदि भी वैश्विक परिदृश्य को प्रभावित करते हैं किंतु उनमें शामिल ज्यादातार देश अमेरिकी प्रभाव वाले हैं। वहीं ब्रिक्स की खास बात ये है कि इसके मुख्य सदस्य रूस, चीन और भारत अमेरिका के दबाव से बाहर हैं और आर्थिक, सामरिक और तकनीकी दृष्टि से पश्चिम के संपन्न देशों से टक्कर ले रहे हैं। यूक्रेन के साथ रूस के युद्ध ने एक बार फिर पूरी दुनिया को प्रभावित किया है। इसके बाद इजरायल और हमास के बीच शुरू हुई जंग का दायरा भी बढ़ता जा रहा है। इन दोनों युद्धों का रोचक पहलू ये है कि यूक्रेन - रूस के बीच चल रही लड़ाई में चीन और भारत ने तटस्थ रुख अपनाकर एक तरह से अमेरिका को ठेंगा दिखा दिया जिसने रूस पर प्रतिबंध लगवा दिये। वहीं इजरायल और हमास के झगड़े में रूस और चीन इजरायल विरोधी हैं किंतु भारत उसके साथ खड़ा है। बावजूद उसके ब्रिक्स में ये तीनों एकजुट हैं। रूस में संपन्न ब्रिक्स की हालिया बैठक मौजूदा हालात में बेहद महत्वपूर्ण रही। इसमें जो सबसे महत्वपूर्ण बात हुई वह अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ब्रिक्स देशों की साझा मुद्रा शुरू करना। हालांकि ये बहुत ही चुनौती भरा कदम होगा क्योंकि यूरोपीय यूनियन के देशों द्वारा संचालित यूरो नामक मुद्रा भी डॉलर के दबदबे को कम नहीं कर सकी। ये भी सही है कि मौजूदा स्थिति में रूस को ऐसी मुद्रा की ज्यादा जरूरत है किंतु चीन,भारत , दक्षिण अफ्रीका और ब्राज़ील भी इससे जुड़ेंगे तो उसकी वजनदारी दुनिया के मुद्रा बाजार में बढ़ जाएगी। भारत की इस संगठन में सक्रिय भूमिका निश्चित रूप से अमेरिका को रास नहीं आ रही किंतु बीते कुछ समय से वह जिस तरह से भारत को दबाने का प्रयास कर रहा है उसे देखते हुए दूसरे विकल्प खुले रखना जरूरी है। रूस में ब्रिक्स का जो सम्मेलन संपन्न हुआ उसका समय बेहद महत्वपूर्ण था क्योंकि एक तो दुनिया में दो बड़ी लड़ाईयां लंबे समय से चल रही हैं दूसरा अमेरिका में अगले माह राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं जिसके बाद इजरायल और ईरान के बीच सीधी जंग होने की आशंका है। ब्रिक्स बैठक में नरेंद्र मोदी और जिनपिंग के बीच हुई वार्ता से हालांकि कुछ बड़ा फायदा तो नहीं हुआ किंतु कूटनीति कब कौन सी करवट ले ले ये कहना मुश्किल है। फिर भी भारत के लिए ये अच्छा है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में उसे सम्मानजनक स्थान प्राप्त होने लगा है। रूस और चीन के साथ ब्रिक्स में उसकी भागीदारी के बावजूद अमेरिका उसे रोकने की हिम्मत नहीं कर पा रहा जो साधारण बात नहीं है। राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए कूटनीति का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग करने के लिए भारत सरकार प्रशंसा की हकदार है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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