भा चुनाव के दौरान नेशनल काँफ्रेंस के नेता डाॅ.फारुख अब्दुल्ला और उनके बेटे उमर जम्मू - कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के साथ धारा 370 की बहाली का मुद्दा गर्माये रहे। घाटी के मतदाताओं पर इसका असर नेशनल काँफ्रेंस को वहाँ भारी सफलता मिलने के रूप में देखने मिला। महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी को घाटी के मतदाताओं ने इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि उसने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई थी। जमायत ए इस्लामी सहित अन्य छोटे दलों और अलगाववाद समर्थक उम्मीदवारों को भी घाटी के लोगों ने समर्थन नहीं दिया जिससे कि ऐसी सरकार बने जो पूर्ण राज्य और 370 की बहली जैसी मांगें मंजूर करवा सके। हालांकि नेशनल काँफ्रेंस को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला किंतु उसकी सहयोगी कांग्रेस को 6 सीटें मिलने से कमी पूरी हो गई। 4 निर्दलीय भी सरकार के साथ आ गए। भाजपा चूंकि काफी पीछे रह गई इसलिए सरकार को कोई खतरा नहीं है। ऐसे में आशंका होने लगी कि उमर अब्दुल्ला और उनके पिता पूर्ण राज्य और 370 के मुद्दे पर केंद्र के साथ टकराव के रास्ते पर बढ़ेंगे जिससे घाटी में अलगाववाद समर्थक ताकतें सिर उठाने लगेंगी। उल्लेखनीय है 1990 में फारूख सरकार के कार्यकाल में ही कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़ने मजबूर होना पड़ा था। गनीमत ये थी कि स्व.जगमोहन राज्यपाल थे वरना एक भी हिन्दू जीवित न लौटता। हालात को संभालने के बजाय फारुख अपनी ससुराल लंदन चले गए। इस परिवार की खासियत ये है कि ये श्रीनगर में तो अलगाववाद की भाषा बोलता है वहीं दिल्ली आकर खुद को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी बताने का नाटक करता है। विधानसभा चुनाव के दौरान पिता - पुत्र पूर्ण राज्य और 370 पर जिस ऊँची आवाज में बोल रहे थे वह परिणाम के बाद धीमी होने लगी। घाटी के मतदाताओं का भावनात्मक दोहन करने के बाद सरकार बनाने के पहले ही उमर अब्दुल्ला ने कहना शुरू कर दिया कि वे लोगों को मूर्ख नहीं बनाएंगे। पूर्ण राज्य का प्रस्ताव तो नये मंत्रीमंडल की पहली बैठक में ही पारित कर उपराज्यपाल के पास भेज दिया जाएगा ताकि वे उसे केंद्र को भेज सकें। लेकिन 370 की बहाली पर ये कहते हुए कदम पीछे खींच लिए कि जिस भाजपा ने उसे हटाया उससे इस बारे में कोई भी उम्मीद रखना मूर्खता है। इसलिए जब केंद्र में सत्ता परिवर्तन होगा तब इस दिशा में आगे बढ़ेंगे। वे यह भी बोल गए कि 370 के मुद्दे को राजनीतिक तौर पर जिंदा रखा जाएगा किंतु जम्मू - कश्मीर के हितों के लिए केंद्र से टकराव मोल नहीं लेंगे। दरअसल अब्दुल्ला परिवार समझ चुका है कि 370 की वापसी असंभव है। ऐसे में उसके लिए केंद्र सरकार से पंगा लेना नुकसान का सौदा होगा। राजनीतिक विश्लेषक तो ये तक कहने लगे कि निर्दलीय विधायकों को खींचकर उमर ने कांग्रेस को झटका दे दिया। चुनाव के दौरान ही दोनों के बीच खटास आ गई थी। जम्मू क्षेत्र में कांग्रेस को सबसे ज्यादा सीटें नेशनल कांफ्रेंस ने इस उम्मीद से दी थीं कि वह हिन्दू मतों में सेंध लगाकर भाजपा को नुकसान पहुंचाएगी। लेकिन राहुल गाँधी घाटी में ज्यादा प्रचार करते रहे। इससे नाराज होकर उमर ने उनको जम्मू में सक्रियता बढ़ाने की सलाह के साथ ही ये ताना भी मारा कि मतदान की तारीख़ बेहद नजदीक आने पर भी कांग्रेस मैदान में नजर नहीं आ रही थी। उनकी आशंका सही साबित हुई। कांग्रेस के 6 विधायक घाटी से ही जीतकर आये। जम्मू में वह एक भी सीट हासिल न कर सकी। यदि नेशनल काँफ्रेंस 42 सीटें नहीं जीतती तो राज्य एक बार फिर राजनीतिक अनिश्चितता में फंस सकता था। असल में हरियाणा के नतीजे देखकर अब्दुल्ला परिवार को ये भी लगने लगा है कि कांग्रेस के साथ रहने से केंद्र सरकार से रिश्ते हमेशा खराब रहेंगे। विधानसभा में 29 निर्वाचित और 5 मनोनीत सदस्यों के साथ भाजपा मजबूत विपक्ष के तौर पर होगी। पूर्ण राज्य बनने तक राज्य सरकार के अधिकार भी सीमित रहेंगे। और बन जाने पर भी राज्यपाल तो केंद्र द्वारा ही नियुक्त होगा जो राज्य सरकार की हर बात माने जरूरी नहीं। इसीलिए उमर अब्दुल्ला ने 370 की बहाली के लिए केंद्र से दो - दो हाथ करने का इरादा डल झील में डुबो दिया। हालांकि उनका ऐसा करना उनके चुनावी दावों के विपरीत है किंतु वे 370 के मुद्दे पर केंद्र से टकराने के बजाय देश में सत्ता बदलने तक प्रतीक्षा करने की बात कर रहे हैं तो ये उनकी समझदारी ही कही जाएगी क्योंकि नरेंद्र मोदी सरकार से इस मुद्दे पर किसी रियायत की उम्मीद वे नहीं कर सकते । वहीं कांग्रेस भी 370 हटाने की बात से दूर ही रहेगी। ये घाटी से आया पहला सकारतमक संकेत है कि वहाँ की नई सरकार के मुखिया समझ गए हैं कि 370 को बहाल करवाना दिन में सपने देखने जैसा है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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