Tuesday, 22 October 2024

आबादी बढ़ाने की होड़ में उ.प्र और बिहार भी शामिल हो गए तो


दो दक्षिण भारतीय  राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने जनसंख्या बढ़ाने के लिए जो बयान दिये वे यदि राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बन जाएं तो आश्चर्य नहीं होगा। शुरुआत की आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रा बाबू नायडू ने  नव विवाहित महिलाओं से अधिक बच्चे पैदा करने का आग्रह करते हुए जिससे कि युवा आबादी बढ़ सके। उनका मानना है कि युवा दंपत्तियों के बीच एक संतान की सोच बढ़ने से जिस अनुपात में वृद्ध बढ़ रहे हैं उसकी तुलना में युवाओं की वृद्धि दर घट रही है। परिणामस्वरूप भविष्य में  भारत उस जनसांख्यिकीय लाभ से वंचित हो जाएगा जो आज उसकी  बड़ी ताकत है। उन्होंने स्थानीय निकाय चुनाव में दो से अधिक बच्चों वालों को ही चुनाव लड़ने की पात्रता संबंधी कानून बनाये जाने की बात भी  कही। उनके बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन का बयान आ गया कि नव विवाहित 16 बच्चे पैदा करें। उन्होंने तमिल परंपरा का हवाला देते हुए  कि पहले बुजुर्ग नवविवाहित जोड़ों से कहते थे कि तुम 16 संतानें प्राप्त करो और समृद्ध जीवन जियो, तो इसका मतलब 16 संतानें नहीं बल्कि 16 प्रकार की संपत्ति थी, जिनसे आशय गाय, घर, पत्नी, संतान, शिक्षा, जिज्ञासा, ज्ञान, अनुशासन, भूमि, जल, आयु, वाहन, सोना, संपत्ति, फसल और प्रशंसा से था। लेकिन अब कोई भी  16 प्रकार की संपत्ति प्राप्त करने का आशीर्वाद नहीं दे रहा है, बल्कि केवल पर्याप्त संतान होने और समृद्ध जीवन जीने का आशीर्वाद दे रहा है। उन्होंने अपनी बात स्पष्ट करते हुए कहा कि हमारी जनसंख्या  घटने का असर आगामी परिसीमन में  तमिलनाडु की लोकसभा की सीटें घटने के रूप में देखने मिलेगा।स्मरणीय है  2029 तक  महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने के प्रावधान के कारण  लोकसभा की सीटों को बढ़ाया जाना है। इसके तत्काल बाद तमिलनाडु से ये आवाज उठी कि ऐसा होने पर उत्तर भारतीय राज्यों का संसद में वर्चस्व और बढ़ जायेगा क्योंकि अधिक आबादी के कारण उनकी लोकसभा सीटों में और वृद्धि हो जायेगी। कहा भी जाता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ से जाता है। यही वजह है कि अधिकतर प्रधानमंत्री उ. प्र से बने। दक्षिण के हिस्से राष्ट्रपति तो ढेर सारे आये किंतु   प्रधानमंत्री मात्र दो ही मिले।  मौजूदा प्रधानमंत्री भी  हालांकि हैं तो गुजरात के किंतु 2014 से लोकसभा में वे वाराणसी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। तमिलनाडु दक्षिण का एकमात्र राज्य है जहाँ उत्तर भारत और हिन्दी के प्रति शत्रुता का भाव खुलकर व्यक्त किया जाता है। पूर्व केंद्रीय मंत्री ए. राजा तो हिन्दी थोपे जाने के विरोध में देश से अलग होने जैसा  बयान भी दे चुके हैं। श्रीलंका में लिट्टे ने जब तमिल  देश का संघर्ष छेड़ा तब द्रमुक ने उसका समर्थन किया था। तमिलनाडु से ही हमेशा ये आवाज सुनाई देती रही है कि भारत के मूल निवासी द्रविड़  दक्षिण के हैं जबकि उत्तर भारत में आर्य विदेशों से आकर बसे। इस दावे के पीछे भी मूलतः भारत को दक्षिण और उत्तर में बांटने का षडयंत्र ही है। कुछ समय पहले स्टालिन के बेटे उदयनिधि ने सनातन के विरुद्ध जो निम्नस्तरीय बयान दिया था वह भी दरअसल उत्तर भारतीयों को अपमानित करने के लिए ही था। अधिक संतान उत्पन्न करने संबंधी बयान संयोग से  दो दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की ओर से आया किंतु जहाँ श्री नायडू ने देश की चिंता की वहीं स्टालिन को तमिलनाडु की लोकसभा सीटें घटने की चिंता सता रही है। असल में द्रविड़ राजनीति प्रारंभ से ही हिन्दू  और उत्तर भारत की विरोधी रही है। लेकिन स्टालिन ने जनसंख्या बढ़ाने के लिए लोकसभा सीटों के घटने का जो आधार बताया यदि वैसी ही सोच उ.प्र और बिहार में भी विकसित होने लगे तब देश में जनसंख्या विस्फोट अनियंत्रित हो जायेगा। चंद्राबाबू की छवि विकास करने वाले शासक की रही है इसलिए उन्होंने जनसंख्या बढ़ाने का जो कारण बताया वह उनकी रचनात्मक सोच का परिचायक है वहीं स्टालिन की बात में क्षेत्रीयता की बू आती है। वैसे जबसे राहुल गाँधी जाति आधारित जनगणना और जाति की संख्या के आधार पर हिस्सेदारी की बात करने लगे हैं तबसे समाज के उस वर्ग में भी ज्यादा संतान पैदा करने का विचार हिलोरें मारने लगा है जो  जातिगत आरक्षण के चलते अवसरों से वंचित हो रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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