दुर्घटना ग्रसित होने के बाद मैं मुंबई स्थित घर पर आराम कर रहा था। अचानक मोबाइल की घंटी बजी तो स्क्रीन पर रतन टाटा का नाम देखकर चौंका। हैलो कहकर नमस्कार किया तो उधर से आवाज आई मैं तुम्हें देखने आ रहा हूँ , लेकिन तुम्हारा घर ढूढ़ने में परेशानी हो रही है। मुझे अपना पता बताओ। मैंने कहा आप फोन अपने ड्रायवर को दें , मैं उसे समझा देता हूँ। मेरे इतना कहने पर जवाब मिला, ड्रायवर नहीं है कार मैं स्वयं चला रहा हूँ। मेरे लिए ये सुनना कल्पनातीत था। मैंने उन्हें पता समझाया और कुछ देर बाद वे मेरे घर पधारे। और बताया कि वे अक्सर यूँ ही अकेले निकल जाते हैं। उनकी वह सरलता मुझे भीतर तक छू गई। उस वाकये का जिक्र मैं हर जगह करता हूँ ताकि लोग सीख सकें कि इंसान सिर्फ दौलत से नहीं बल्कि अपने आचरण से बड़ा कहलाता है। उक्त वृतांत केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की जुबानी लाखों लोगों ने सुना होगा। इसी तरह का एक और उदाहरण कुछ साल पहले सुर्खियों में आया जब ये जानकारी मिलने पर कि उनका एक कर्मचारी दो साल से बीमार है स्व. टाटा उसे देखने मुंबई से पुणे गए। ऐसे अनगिनत प्रेरणादायी प्रसंगों के मुख्य पात्र रतन टाटा कल रात चल बसे। 86 वर्ष की आयु में किसी का जाना अस्वाभाविक नहीं लगता किंतु उन जैसे व्यक्ति का अवसान ऐसा खालीपन छोड़ जाता है जिसको भरना आसान नहीं है। रतन जी देश के सबसे पुराने औद्योगिक घराने के वारिस थे। आजादी के पहले ही टाटा समूह ने भारत के औद्योगिकीकरण की बुनियाद रख दी थी। उसके अलावा और भी उद्योगपति थे । कालांतर में कुछ टाटा से आगे भी निकल गये। लेकिन निःसंकोच कहा जा सकता है कि टाटा समूह ने जो प्रतिष्ठा अर्जित की वह अन्य औद्योगिक घरानों को नहीं मिल सकी। इसका कारण उसका सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहना है। वैसे तो सभी उद्योगपति परोपकार के कार्यों हेतु योगदान देते हैं।लेकिन टाटा समूह ने सामाजिक कल्याण के लिए आर्थिक सहयोग देने की जो संस्थागत व्यवस्था की वह सभी के लिए उदाहरण है। जमशेद जी टाटा (जे.आर.डी) के बाद रतन जी के कंधों पर इस समूह की जिम्मेदारी आई जिसे उन्होंने जिस कुशलता से निभाया वह पूरे विश्व के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई। आज 121 देशों में टाटा का कारोबार फैला है। लम्बे समय तक समूह के मुखिया रहने के बाद 75 वर्ष के होते ही उन्होंने अलग होने का फैसला किया और बतौर कार्यकारी अध्यक्ष मार्गदर्शन करने लगे। उनके कार्यकाल में समूह ने वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत को ला खड़ा किया। वे बहुत ही साहसी इंसान थे और इसी के चलते उन्होंने दुनिया की बड़ी - बड़ी कंपनियां खरीदकर समृद्ध भारत की कल्पना को साकार किया। विवादों से सदैव उन्होंने खुद को दूर रखा। इसीलिए न सिर्फ उद्योग जगत अपितु प्रत्येक क्षेत्र के लोग उनसे मार्गदर्शन लेते थे। देश में स्वरोजगार को विकसित करने हेतु हजारों युवा उद्यमियों को उन्होंने सहायता प्रदान की। भारत विकास की जिस राह पर तेजी से बढ़ रहा है उसमें उनका योगदान अविस्मरणीय रहेगा। भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से अलंकृत किया था । राजनीति से वे हमेशा दूर रहे। बावजूद इसके उनका नाम राष्ट्रपति पद के लिए अनेक बार चर्चा में आया। रतन जी के बारे में ये विख्यात था कि वे समूह की किसी भी बैठक में जाते तो सबसे ज्यादा रुचि इस बात में लेते कि वह कंपनी उस वित्तीय वर्ष में कितना दान करेगी ? दरअसल उनके नेतृत्व में टाटा समूह ने दान को संस्थागत रूप देकर संस्कार बना दिया। साधारण व्यक्ति से मिलते समय भी वे अहंकार शून्य रहते। यही कारण है उनके निधन से सभी वर्गों के लोग दुखी हैं। टाटा समूह ने नैतिक मूल्यों और सामाजिक सरोकारों के प्रति जिस निःस्वार्थ प्रतिबद्धता को स्थापित किया वह रतन जी के मानवीय दृष्टिकोण का प्रमाण है। वे उस दौर में जन्मे और बड़े हुए जब पूंजीवाद और समाजवाद के बीच वैचारिक संघर्ष चरम पर था। वहीं जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने उदारवाद और वैश्वीकरण भी देखा। व्यवसाय में अनेक उतार चढ़ाव भी आये। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारतीय उद्योगों के लिए संकट भी पैदा किया किंतु स्व. टाटा ने अवसरों के अनुरूप नीति बनाकर बजाय भयभीत होने के अपने कारोबार को दुनिया भर में फैलाकर भारतीय उद्यमशीलता की धाक जमाई। उन जैसे प्रतिभाशाली और शानदार इंसान सदियों में जन्म लेते हैं। उनकी सफलता और संपन्नता का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि उनका कोई विरोधी नहीं था। और ये भी कि 86 वर्ष का वह व्यक्ति देश के करोड़ों युवाओं का प्रिय और प्रेरणास्रोत रहा। उनके बारे में विख्यात उद्योगपति आनन्द महिंद्रा का ये कहना पूरी तरह सही है कि रतन टाटा को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा क्योंकि महापुरुष कभी नहीं मरते।
विनम्र श्रद्धांजलि।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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