हरियाणा और जम्मू - कश्मीर विधानसभा चुनाव की मतगणना में दोपहर 1.30 बजे तक आये रुझानों से स्पष्ट हो गया है कि जम्मू कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस आसानी से बहुमत हासिल करने जा रहे हैं। इससे किसी को आश्चर्य भी नहीं हुआ क्योंकि वहाँ भाजपा केवल जम्मू क्षेत्र में प्रभावशाली है । कश्मीर घाटी में उसे एक भी सीट भी मिल गई तो वह असंभव के संभव होने जैसा होगा। लेकिन जम्मू की 43 सीटों में उसे अपेक्षा से कम सीटें मिलना उसके लिए झटका है। बहरहाल ये शुभ संकेत है कि अलगाववाद से प्रभावित इस राज्य की राजनीति में अब्दुल्ला परिवार की सियासी जमींदारी पहले जैसी नहीं रही। नेशनल कांफ्रेंस अपने बलबूते स्पष्ट बहुमत नहीं लाती दिख रही। उसकी सहयोगी कांग्रेस भी दहाई का आंकड़ा छूने के लिए संघर्ष कर रही है। चुनाव प्रचार में फारुख अब्दुल्ला ने धारा 370 की वापसी का मुद्दा जमकर उछाला था। वहीं कांग्रेस इस सम्बन्ध में कुछ भी कहने से बचती रही। सरकार बनाने के बाद नेशनल कांफ्रेंस के लिए इस संवेदनशील विषय को उठाना कठिन होगा क्योंकि देश के बाकी हिस्सों की जनभावनाओं का ध्यान रखते हुए कांग्रेस अलगाववाद समर्थक किसी भी नीति से बचने का रास्ता अखत्यार करेगी जो अब्दुल्ला परिवार की साख को नुकसान पहुंचाने वाला होगा। भाजपा लगभग 30 सीटें जीतने के कगार पर है। नियमानुसार 5 विधायक मनोनीत होंगे जिनको सदन में मताधिकार प्राप्त होगा। जाहिर है वे भाजपा समर्थक रहेंगे। वही। वहीं 8 निर्दलीय जीत रहे हैं। पीडीपी मात्र 2 सीटों पर आगे है। इस प्रकार भाजपा प्रमुख विपक्षी दल के रूप में स्थापित हो गई जो राज्य की राजनीति में दूरगामी असर डालने वाला होगा। जाहिर है मुख्यमंत्री तो उमर अब्दुल्ला ही बनेंगे किंतु उनके लिए केंद्र सरकार से टकराव लेना नुकसान का कारण बन सकता है। ये देखते हुए फारुख, भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से निकटता स्थापित कर नया खेल रच सकते हैं। यदि ये नहीं होता तब भी विधानसभा और उसके बाहर सरकार को विपक्ष के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा। कश्मीर घाटी की राजनीतिक वजनदारी घटाने में भी भाजपा निश्चित रूप से सफल होती दिख रही है।
दूसरे जिस राज्य के परिणाम आ रहे हैं वह है हरियाणा। यहाँ सारे विश्लेषक और एग्जिट पोल कांग्रेस की इकतरफा जीत की भविष्यवाणी कर चुके थे। चुनाव के पहले ही भाजपा विरोधी पूरा तबका ये महौल बनाने में जुटा था कि कांग्रेस की लहर चलेगी। पूर्व चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव को तो कांग्रेस की सुनामी नजर आ रही थी। परिणाम आने के पहले ही भूपिंदर हुड्डा, शैलजा और रणदीप सुरुजेवाला मुख्यमंत्री बनने की कवायद में जुट गए। उनकी उम्मीदों के पीछे बेशक चुनाव पूर्व सर्वे और एग्जिट पोल के निष्कर्ष थे। किसान आंदोलन, अग्निवीर और पहलवानों के मुद्दे पर भाजपा विरोधी मतदाता जिस तरह आक्रामकता के साथ मुखर था उससे भी ये एहसास मजबूत हुआ कि भाजपा तिकड़ी नहीं बना सकेगी।। लोकसभा चुनाव में उसके हाथ से आधी सीटें ही नहीं खिसकीं बल्कि मत प्रतिशत में भी भारी गिरावट आई। इन सब कारणों से उसके समर्थक मतदाता भी निराश थे। तमाम नेता पार्टी छोड़ गए। अशोक तंवर ने तो मतदान के ठीक पहले कांग्रेस का दामन थाम लिया। राहुल गाँधी पूरे आत्मविश्वास से प्रधानमंत्री पर हमला करते रहे। मतदाताओं को जी भरकर प्रलोभन दिये गए। राज्य में सबसे प्रभावशाली जाट समुदाय की भाजपा से नाराजगी को भी बढ़ा - चढ़ाकर पेश किया जाता रहा। आज सुबह मतों की गिनती शुरू होते ही कांग्रेस तेजी से बहुमत हासिल करती दिखी किंतु कुछ देर बाद ही देखते - देखते भाजपा बहुमत के आंकड़े से आगे निकल गई । इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उसकी सरकार आसानी से लौट रही है। पिछली सरकार को टेका लगाने वाले दुष्यंत चौटाला बुरी तरह परास्त हो चुके हैं। चौटाला परिवार के अन्य छत्रप भी धराशायी होते दिख रहे हैं। सबसे बड़ी बात जाट समुदाय के राजनीतिक प्रभुत्व को इस चुनाव में चोट पहुंची। 2019 के विधानसभा चुनाव में 40 सीटों पर सिमट गई भाजपा इस बार अपने दम पर 50 के करीब है। वह भी बिना जाट नेतृत्व के और लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बावजूद। हालांकि कांग्रेस भी पिछले चुनाव की तुलना में आगे बढ़ी है किंतु उसके हिस्से में विपक्ष की जिम्मेदारी ही आई है। निर्दलीय बड़ी संख्या में खड़े हुए किंतु जनता ने उन्हें नकार दिया। आम आदमी पार्टी भी कुछ हासिल न कर सकी जबकि यह अरविंद केजरीवाल का गृहराज्य है। सही बात ये है कि गैर जाट जातियों के ध्रुवीकरण ने भाजपा का काम आसान कर दिया। हरियाणा के नतीजों से लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिले आत्मविश्वास में कमी आयेगी। वहीं ये अवधारणा कमजोर होगी कि मोदी कार्ड राज्यों में नहीं चलता। महाराष्ट्र में अब उद्धव ठाकरे और शरद पवार कांग्रेस पर हावी होंगे । वहीं झारखण्ड में भाजपा की संभावना बढ़ गई हैं। हिंदुत्व के विरुद्ध किये जा रहे दुष्प्रचार को भी हरियाणा के मतदाताओं ने ठेंगा दिखा दिया। इंडिया गठबंधन में भी टूटन बढ़ सकती है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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