हमारे यहाँ धातु में निवेश प्राचीनकाल से होता आया है। ये हमारे पूर्वजों की दूरदर्शिता ही थी जिसने समाज के प्रत्येक वर्ग को दीर्घकालीन निवेश का महत्व समझाया। धनतेरस से दीपावली पर्व का शुभारंभ हो जाता है। यह दिन अनेक पौराणिक प्रसंगों से जुड़ा है किंतु इसका मुख्य आकर्षण बाजारों में नजर आने वाली रौनक है। एक समय था जब धनतेरस पर पीतल, तांबे, काँसे के बर्तनों से लेकर सोने - चाँदी के आभूषण खरीदने का रिवाज था। हर व्यक्ति अपनी हैसियत के मुताबिक उक्त धातुओं में से कोई खरीद कर त्यौहार की खुशी मनाता था। धातु से बनी चीज चाहे वह पीतल हो या कांसा एक तरह की पूंजी ही होती है जो बरसों तक उपयोग किये जाने के बाद बेचने पर भी अपने खरीद मूल्य के बराबर तो पैसा दे ही जाती है। जबकि सोने - चांदी कितने भी पुराने क्यों न हो जाएं उन्हें बेचने पर उसके मौजूदा दाम के बराबर धन वापस मिल जाता है। समय के साथ समाज की सोच भी बदली और जरूरतें भी। जीवन स्तर में आये सुधार के अलावा बाजारवाद ने भी लोगों की मानसिकता को प्रभावित किया। मध्यम वर्ग के रूप में एक बड़ा उपभोक्ता समूह विकसित हुआ जिसने अर्थव्यवस्था की दिशा ही बदलकर रख दी। धनतेरस पर बाजार में बर्तनों की जगह वाहन, इलेक्ट्रानिक उपकरण आदि ने ले ली किंतु सोने - चांदी का आकर्षण जस का तस है। बीते कुछ समय से वैश्विक परिस्थितियों के कारण सोना - चांदी की कीमतें काफी बढ़ चुकी हैं। इसके कारण बाजार में ये आशंका थी कि इनकी बिक्री पिछले सालों की अपेक्षा कम होगी। लेकिन कल धनतेरस पर देश में 60 हजार करोड़ के कुल कारोबार में 20 हजार करोड़ रु.का सोना और 2500 करोड़ रु. की चांदी की बिक्री होना दर्शाता है कि भारतीय समाज में इन धातुओं में निवेश के प्रति आकर्षण यथावत है। पूंजी बाजार से मिली जानकारी के अनुसार बीते एक साल में सोने - चांदी की कीमतों में हुई जबरदस्त वृद्धि की वजह से उनमें निवेश करने वालों को आशातीत लाभ हुआ। दीपावली पर सोना लगभग 80 हजार प्रति ग्राम और चांदी 1 लाख रु .प्रति किलो तक पहुँचने के बाद भी उनकी बिक्री के आंकड़े उस आशंका को भी दर्शा रहे हैं जिसके अनुसार रूस और यूक्रेन में चल रही जंग के साथ ही इजरायल और ईरान के बीच युद्ध होने वाला है। लेकिन कोरोना के बाद से दुनिया के बड़े देशों की अर्थव्यवस्था में आई गिरावट ने भी उक्त मूल्यवान धातुओं की मांग बढ़ा दी। भारत तो हजारों सालों से सोने और चांदी के प्रति दीवाना रहा है। कहा जाता है कि देश के कुछ बड़े मंदिरों में जमा सोने के भंडारों का बाजार मूल्य अरबों - खरबों में होगा और ये भी कि करोड़ों भारतीय परिवारों के पास सोने और चांदी के जो आभूषण हैं यदि उनकी कीमत आंकी जाए तो देश अमेरिका को भी पीछे छोड़ देगा। ये बात भी बिल्कुल सही है कि कच्चे तेल के अलावा सोना - चांदी के आयात में भी विदेशी मुद्रा बड़ी मात्रा में खर्च होती है। कई बार ये चर्चा चली कि यदि परिवारों में रखा सोना सरकार के खजाने में होता तो हमारी हैसियत विदेशी बाजारों में विकसित देशों के बराबर होती। मंदिरों आदि के बारे में भी यही सोच है किंतु भारतीय जनमानस ऐसी चर्चा को सरकार की खस्ता हालत के तौर पर देखता है। सोना - चांदी आम भारतीय के लिए केवल प्रतिष्ठा सूचक न होकर बुरे वक्त के साथी हैं क्योंकि यही धातुएँ हैं जिन्हें कभी भी बेचकर वह अपनी आपातकालीन जरूरतें पूरी कर सकता है। गिरवी रखकर भी छोटी समस्या हल हो जाती है। यही कारण है कि वह मौका मिलते ही इन दोनों धातुओं में निवेश करने से नहीं चूकता। यद्यपि ये बात भी चुभती है कि घरों में रखा हुआ सोना व्यक्तिगत संपत्ति तो है किंतु देश की समृद्धि में उसका योगदान नहीं है। जो स्वर्ण भंडार रिजर्व बैंक के पास है वही उसका पैमाना है। यद्यपि सरकार ने निजी सोने को अपने पास जमा करने की कई योजनाएं निकालीं किंतु उनका अपेक्षित लाभ नहीं हुआ। इससे ये भी सिद्ध होता है कि जिस सरकार को जनता चुनती है उस पर उसे भरोसा कितना कम है। बेहतर होगा सरकार ऐसा कुछ करे जिससे उसके सोने के भंडार में जनता से ज्यादा सोना हो । जिस दिन ऐसा हो जाएगा भारत फिर से सोने की चिड़िया कहलाने लगेगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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