भारत और कैनेडा के रिश्तों में कुछ समय से बेहद खटास घुल गई है। इसका कारण वहाँ के प्रधानमंत्री ट्रूडो का भारत विरोधी खालिस्तानी तत्वों को दिया जा रहा संरक्षण है। ये कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि पंजाब से बड़ा खालिस्तानी गतिविधियों का केंद्र कैनेडा बन गया है। निज्जर नामक खालिस्तानी की हत्या के मामले में ट्रूडो , भारत सरकार को जिस तरह कठघरे में खड़ा कर रहे हैं उसके पीछे वहाँ होने जा रहे चुनाव हैं। अपनी खस्ता हालत देखकर उन्होंने खालिस्तानी संगठनों को खुली छूट दे रखी है ताकि सिखों के मत उन्हें मिल सकें। हालांकि वहाँ बसे सभी सिख खालिस्तान समर्थक या भारत विरोधी हैं ये सही नहीं है किंतु वे खालिस्तान समर्थकों की मुख़ालफत करने से बचते हैं। ट्रूडो इसी का लाभ उठाकर भारत पर दबाव बनाने की चाल चल रहे हैं जबकि उनकी अपनी पार्टी में इसे लेकर विरोध के स्वर उठ रहे हैं। भारत सरकार ट्रूडो द्वारा बनाये जा रहे दबाव का कड़ाई से जवाब दे रही है। लेकिन इस बीच एक जानकारी आई है कि कैनेडा में पढ़ रहे विदेशी छात्रों में 40 फीसदी संख्या भारतीय विद्यार्थियों की है। 2022 के आंकड़ों के अनुसार 4 लाख भारतीय छात्रों से उस साल 85000 करोड़ रु. कैनेडा की अर्थव्यवस्था को मिले। भारत सरकार द्वारा संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक वर्ष 2023 में 13 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेशों में पढ़ रहे थे जबकि 2022 में ये संख्या 9 लाख थी। इससे स्पष्ट है कि महज एक साल में अध्ययन हेतु विदेश जाने वाले भारतीय विद्यार्थियों की संख्या में लगभग 30 फीसदी की वृद्धि हुई। और ये भी कि इन छात्रों द्वारा विदेशों में खर्च की जाने वाले राशि 2.5 लाख करोड़ रु. से अधिक होगी। हालांकि ये कोई नई बात नहीं है। आजादी के पहले से ही भारत के छात्र उच्च अध्ययन हेतु विदेश जाते रहे हैं। महात्मा गाँधी, पं. जवाहरलाल नेहरू, जयप्रकाश नारायण, डा. राममनोहर लोहिया, ज्योति बसु, डाॅ. भीमराव आंबेडकर के अलावा बड़ी संख्या में राष्ट्रीय नेताओं ने विदेशों में शिक्षा प्राप्त की। उस दौर में भारतीय विश्वविद्यालयों में शिक्षा का स्तर किसी भी तरह कम था ये मान लेना गलत होगा। हाँ, विज्ञान के क्षेत्र में शायद शोध आदि के लिए समुचित संसाधनों का अभाव होने से अनेक वैज्ञानिक विदेश चले जाते होंगे। भारत चूंकि ब्रिटेन के अधीन था इसलिए वहाँ जाकर पढ़ना सरल भी था। मेधावी छात्रों को कुछ राजा - महाराजा छात्रवृत्ति प्रदान कर देते थे। धन संपन्न लोगों में विदेश में शिक्षा ग्रहण करना प्रतिष्ठा सूचक था। आजादी के आठ दशक पूरे होने को आ रहे हैं लेकिन अभी भी यदि भारतीय विद्यार्थियों को शिक्षा हेतु विदेश जाना पड़ रहा है तो ये विचारणीय होने के साथ ही शर्म का विषय भी है। धनकुबेरों की संतानें यदि बाहर पढ़ने जाएं तो उसे अस्वाभविक नहीं माना जाना चाहिए किंतु अब तो मध्यम वर्ग में भी कर्ज लेकर बच्चों को विदेश पढ़ने भेजने का चलन बढ़ता जा रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि उन राजनेताओं की संतानें तक विदेश पढ़ने जाती हैं जो संसद और विधानसभा में गाँव, गरीब, किसानों, मजदूरों और दलित - पिछड़ों का प्रतिनिधि होने का दावा करते हैं। उनकी औलादों को भी अपनी इच्छानुसार पढ़ने और भविष्य चुनने का अधिकार है किंतु इससे साबित होता है कि जिन नेताओं पर इस देश में गुणवत्तायुक्त शिक्षा व्यवस्था विकसित करने की जिम्मेदारी थी उन्होंने अपना दायित्व सही ढंग से नहीं निभाया। भारत - कैनेडा के बीच चल रही खींचतानी के बीच ही ये सुनने में आया कि यदि भारतीय छात्र वहाँ से लौट आयें तो उस देश के अनेक विश्वविद्यालयों में ताले लटक सकते हैं। कैनेडा, अमेरिका , जर्मनी या ब्रिटेन जैसे देश ही नहीं यूक्रेन तक में हजारों भारतीय छात्र अध्ययनरत थे जिन्हें युद्ध के बीच वापस लाया गया। लेकिन शर्मिंदगी तब सबसे ज्यादा हुई जब हाल ही में बांग्ला देश में सत्ता पलट के दौरान हुए उपद्रव के कारण मुसीबत में आये भारतीय विद्यार्थियों को सुरक्षित देश बुलाने के लिए मशक्कत करनी पड़ी। इन बातों को केवल संकटकालीन विषय मानकर भूल जाने की बजाय एक सबक के तौर पर ग्रहण करना होगा। दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी और सबसे तेज भागती अर्थव्यवस्था वाले देश के लाखों छात्र सामान्य विषयों की शिक्षा के लिए सात समंदर पार जाएं ये अटपटा लगता है। उल्टे होना तो ये चाहिए कि हमारे विश्वविद्यालय विदेशी छात्रों को आकर्षित कर सकें। ये स्थिति कैसे निर्मित होगी ये सोचने और उसके लिए समुचित प्रयास करने का समय आ गया है । मेक इन इंडिया की तरह स्टडी इन इंडिया का नारा बुलंद करना जरूरी है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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