लोकसभा चुनाव में एग्जिट पोल के निष्कर्ष गलत निकलने के बाद सर्वे करने वाली एजेंसियों के साथ - साथ उनके प्रायोजक टीवी चैनलों की भी जबरदस्त किरकिरी हुई थी। 400 पार के नारे को सही बताने वाले एग्जिट पोल विपक्ष के निशाने पर आ गए। उन पर आरोप लगा कि उन्होंने शेयर बाजार को उठाने के लिए भ्रामक आंकड़े पेश किये जिनमें मोदी सरकार प्रचंड बहुमत के साथ लौटती दिखाई गई। उससे उत्साहित होकर निवेशकों ने जमकर शेयरोंं की खरीदी कर डाली । हालांकि सरकार तो वापस आई किंतु भाजपा के स्पष्ट बहुमत से पीछे रहने की वजह से वह सहयोगी दलों का सहारा लेने मजबूर हो गई। नतीजा शेयर बाजार के धड़ाम से गिरने के रूप में सामने आया। इसके चलते उसमें पूंजी लगाने वालों को भारी नुकसान हुआ जिसका ठीकरा विपक्ष ने एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियों के साथ ही टीवी चैनलों पर फोड़ा। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों और एग्जिट पोल पर प्रतिबंध लगाए जाने की माँग भी उठी। यद्यपि सरकार का गठन होते ही शेयर बाजार चढ़ने लगा और बीते सप्ताह अपने सर्वोच्च स्तर तक जा पहुंचा। इसी दौरान जम्मू कश्मीर और हरियाणा विधान सभा के चुनाव संपन्न हुए जिनके एग्जिट पोल 5 अक्टूबर की शाम जारी किये गये । लोकसभा चुनाव में भद्द पिटने के बाद भी टीवी चैनलों ने हमेशा की तरह न सिर्फ एग्जिट पोल के निष्कर्ष दिखाये बल्कि राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को बिठाकर चर्चा भी करवाई। चूंकि नतीजे दोनों राज्यों में भाजपा को पिछड़ते बता रहे थे लिहाजा जो विपक्ष लोकसभा चुनाव के बाद एग्जिट पोल के परिणामों को सिरे से नकार रहा था वही इन निष्कर्षों को पूरी तरह प्रामाणिक मानकर खुश नजर आया। वहीं दूसरी तरफ भाजपा वालों को ये जमीनी सच्चाई से कोसों दूर प्रतीत हुए। भले ही सभी पोल सीटों की संख्या को लेकर एकमत नहीं हों लेकिन सब का ये जरूर कहना था कि भाजपा दोनों राज्यों में सत्ता से बाहर रहेगी। जम्मू कश्मीर में नेशनल काँफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनने की संभावना प्रबल है वहीं हरियाणा में कांग्रेस स्पष्ट बहुमत हासिल करने जा रही है। राजनीतिक विश्लेषक भी उक्त एग्जिट पोल को मान्य कर रहे हैं। हालांकि भाजपा को लगता है कि हरियाणा के परिणाम गत वर्ष संपन्न छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव की कहानी दोहरायेंगे । जहाँ सभी सर्वेक्षण कांग्रेस सरकार के दोबारा सत्ता में आने की भविष्यवाणी कर रहे थे किंतु जब परिणाम आये तो भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला। जहाँ तक बात जम्मू कश्मीर की है तो वहाँ जम्मू और कश्मीर घाटी में अलग - अलग माहौल है। जम्मू अंचल की 43 सीटों में से भाजपा को यदि कम से कम 35 नहीं मिलतीं तब वह सत्ता की दौड़ से बाहर हो जाएंगी क्योंकि घाटी में उसका कोई वजूद नहीं है। उसकी उम्मीद केवल इस बात पर टिकी है कि घाटी में नेशनल काँफ्रेंस और पीडीपी को कम सीटें मिलें। कुछ एग्जिट पोल में भी निर्दलीयों के बड़ी संख्या में जीतने का अनुमान लगाया गया है। उल्लेखनीय है लोकसभा चुनाव में उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती दोनों हार गए थे। उसके बाद घाटी में कुछ नये चेहरे उभरकर सामने आये। देखने वाली बात ये होगी कि त्रिशंकु की स्थिति में ये किसके साथ जायेंगे क्योंकि घाटी में धारा 370 की वापसी पर सभी एकमत हैं। वहाँ सारी 47 सीटें नेशनल काँफ्रेंस जीत जाए ये नामुमकिन है। इसी तरह जम्मू की अधिकांश सीटों पर लड़ने के बावजूद कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत अच्छा होने की उम्मीद नहीं है। मतदान के कुछ दिन पूर्व ही उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस की इस बात के लिए आलोचना भी की थी कि उसने जम्मू क्षेत्र में काम ही शुरू नहीं किया। इस राज्य में राजनीतिक अनिश्चितता बने रहने की संभावना अभी भी है। लेकिन हरियाणा में माहौल भाजपा विरोधी बनाने में विपक्ष काफी हद तक सफल हो गया था। लोकसभा चुनाव के पूर्व मुख्यमंत्री बदलने का दांव भी कारगर नहीं रहा और कांग्रेस आधी सीटें जीत गई। हालांकि इस बार भाजपा ने आखिर तक काफी जोर लगाया किंतु जिस तरह उ.प्र में यादव, दलित और मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण ने उसको लोकसभा में स्पष्ट बहुमत से वंचित कर दिया ठीक वैसे ही समीकरण हरियाणा में जाट, दलित और मुस्लिम बनाते दिखे। यदि भाजपा सवर्ण और ओबीसी मतों को थोक के भाव अपने झोली में डालने के साथ ही जाट समुदाय की एकजुटता में सेंध लगाने में सफल नहीं हो सकी तो फिर उसकी तिकड़ी बनना नामुमकिन होगा। कल दोपहर तक दोनों राज्यों की तस्वीर स्पष्ट हो जाएगी। यदि एग्जिट पोल सही साबित हुए तब भाजपा के लिए महाराष्ट्र और झारखण्ड की लड़ाई बेहद कठिन हो जाएगी।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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