Monday, 21 October 2024

प्रवासी मजदूरों की हत्या के जरिये कश्मीरी पंडितों को डराने का षडयंत्र


जम्मू - कश्मीर में नई सरकार का गठन हो गया। उम्मीद के मुताबिक  अब्दुल्ला परिवार की तीसरी पीढ़ी के उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बन गए। वे पहले भी इस पद पर रह चुके हैं। उनके पिता डाॅ. फारुख अब्दुल्ला ने लंबे समय तक इस राज्य की सत्ता संभाली और उन्हीं के राज में कश्मीर घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ। यद्यपि कश्मीर घाटी की राजनीति के दो प्रमुख स्तंभ रहे अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार की ओर से सदैव ये कहा जाता रहा कि बिना पंडितों के कश्मीर अधूरा है लेकिन  सच्चाई यही है कि घाटी के सभी नेताओं की राजनीति पूरी तरह हिन्दू विरोधी रही है। वैसे तो उमर के दादा  शेख अब्दुल्ला के  समय से ही अनेक हिन्दू नेता नेशनल काँफ्रेंस में रहे किंतु किसी को भी उभरने का अवसर नहीं दिया गया। मुख्यमंत्री  पद पर भी हमेशा मुस्लिम ही बैठा। इसका कारण कश्मीर घाटी में विधानसभा की ज्यादा सीटें होना भी था। धारा 370 हटने के बाद हुए परिसीमन में जम्मू क्षेत्र में 43 सीटें हो गईं वहीं घाटी में 47। इस चुनाव में ये संभावना भी व्यक्त की जाने लगी थी कि भाजपा को यदि जम्मू क्षेत्र में भारी सफलता मिली और त्रिशंकु विधानसभा बनी तब  पहली बार हिन्दू मुख्यमंत्री बन सकता है। इस बात की घाटी में जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई और वहाँ मुसलमानों ने नेशनल काँफ्रेंस को ऐतिहासिक जीत दिलवाकर भाजपा का रास्ता रोक दिया। उसके विपरीत जम्मू के अनेक हिन्दू बहुल क्षेत्रों में नेशनल काँफ्रेंस , कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के विधायक जीत गए। ये भी उल्लेखनीय है कि नेशनल काँफ्रेंस का पूरा चुनाव अभियान पूर्ण राज्य का दर्जा और धारा 370 की बहाली पर केंद्रित रहा। पीडीपी भी इन्हीं बातों पर जोर देती रही। लेकिन कश्मीरी पंडितों की वापसी और पुनर्वास जैसे मुद्दों पर न अब्दुल्ला परिवार ने जोर दिया और न ही मुफ्ती ने। ये बात भी स्वीकार करनी होगी कि केंद्र सरकार ने धारा 370 हटाने के साथ ही जम्मू कश्मीर को केंद्र शासित बनाकर अपने अधीन तो कर लिया किंतु  कश्मीरी पंडितों की वापसी की स्थितियाँ नहीं बन सकीं। जब भी लगा कि माहौल सुधरने को है तभी आतंकवादियों ने  बचे - खुचे कश्मीरी पंडितों की हत्या कर दहशत फैला दी। ये बात तो सही है कि घाटी में आतंकवाद  पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित है किंतु बिना स्थानीय समर्थन और संरक्षण के उसका जारी रहना असंभव है। बुरहान वानी जैसे लोगों को महानायक बनाने वाले नेताओं ने ही आतंकवाद को घाटी में कुटीर उद्योग बना दिया। विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता उमर अब्दुल्ला के हाथ में आते ही ये उम्मीद लगाई जाने लगी थी कि अब घाटी का माहौल पूरी तरह शांत हो जाएगा। लेकिन  बीते एक सप्ताह में आतंकवादियों ने दो अलग - अलग घटनाओं में अन्य राज्यों से आकर घाटी में मजदूरी कर रहे श्रमिकों को गोलियों से भून डाला। पहली वारदात शोपिया में घटित हुई जहाँ बिहार के दो श्रमिकों की हत्या हुई और उसके बाद गत दिवस खबर आई कि मुख्यमंत्री उमर के  निर्वाचन क्षेत्र गांदरबल में तीन श्रमिकों को मौत के घाट उतार दिया गया जो अन्य किसी राज्य के थे। ये दोनों वारदातें इस बात का संकेत हैं कि राज्य की सत्ता चुनी हुई सरकार के हाथ में आते ही देश विरोधी ताकतों का हौसला बुलंद होने लगा। हालांकि उपराज्यपाल के शासन में भी आतंकवादियों की गतिविधियाँ पूरी तरह नहीं रुकीं किंतु तब केंद्र के शासन के विरुद्ध नाराजगी का बहाना बनाकर उसके औचित्य को ठहराया जाता रहा। लेकिन  सत्ता कश्मीर घाटी के मुस्लिम नेता के हाथों में आने के फौरन बाद  अन्य राज्य से आकर पेट पालने वाले गरीब मजदूरों की अकारण हत्या के जरिये कश्मीरी पंडितों को चेतावनी दे दी गई कि वे घाटी में लौटने का इरादा  त्याग दें । अन्यथा उनको एक बार फिर 1990 जैसी त्रासदी झेलनी होगी। अभी जम्मू कश्मीर केंद्र शासित राज्य ही है। उमर सरकार ने पूर्ण राज्य संबंधी प्रस्ताव पारित कर उपराज्यपाल के जरिये केंद्र सरकार को भेजने की औपचारिकता पूरी कर दी है। केंद्र  यद्यपि 370 की बहाली से तो स्पष्ट तौर पर इंकार कर चुका है किंतु पूर्ण राज्य  पर सहमत  है। लेकिन इस मामले में  जल्दबाजी करने से बचना चाहिए क्योंकि भले ही  उमर ने फिलहाल 370 की बहाली का मुद्दा पृष्ठभूमि में रख दिया हो लेकिन पूर्ण राज्य का दर्जा मिलते ही  वे अपने असली रंग में आ जाएंगे। अब्दुल्ला खानदान का इतिहास भारत विरोधी हरकतों से भरा पड़ा है। इसलिए उमर सरकार पर पैनी नजर रखना होगी। ये इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ये सरकार  उन्हीं फारुख के इशारों पर चलेगी जिनके कारण कश्मीरी पंडितों को दर्दनाक हालात में अपना घर -  द्वार छोड़कर भागना पड़ा था। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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