जम्मू - कश्मीर और हरियाणा के चुनाव नतीजों का तरह- तरह से विश्लेषण हो रहा है। पहले राज्य में तो कश्मीर घाटी के अलावा जम्मू अंचल की भी कुछ सीटें मुस्लिम बाहुल्य होने से नेशनल काँफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन की बढ़त साफ दिखाई दे रही थी। नेशनल काँफ्रेंस द्वारा धारा 370 की बहाली का जो मुद्दा उठाया गया उसका लाभ उसे मिला। पीडीपी के अलावा जमायत ए इस्लामी, राशिद इंजीनियर और उन जैसे कुछ अन्य अलगाववादी गुटों के उम्मीदवारों के सफाये से स्पष्ट हो गया कि मुस्लिम मतदाताओं ने रणनीतिक मतदान किया। उनको डर था कि त्रिशंकु विधानसभा बनने पर भाजपा उसका लाभ उठा लेगी । दूसरी तरफ जम्मू की हिन्दू बहुल सीटों पर भाजपा के पक्ष में जमकर ध्रुवीकरण हुआ। हालांकि कुछ सीटों पर बागियों ने खेल बिगाड़ा जिससे प्रदेश अध्यक्ष रवीन्द्र रैना चुनाव हार गए। यदि भाजपा 35 सीटें जीत जाती तब सत्ता की चाभी उसके पास होती किंतु घाटी में मुस्लिम मतदाताओं का ध्रुवीकरण इतना जबरदस्त था कि उसने भाजपा की उम्मीदों को पूरा होने से रोक दिया। लेकिन ये भी सही है कि घाटी से आ रही खबरों के कारण ही जम्मू के हिन्दू बहुल क्षेत्रों में भाजपा 29 सीटें जीतकर मजबूत विपक्ष के तौर पर उभरी। जहाँ तक बात हरियाणा की है तो वहाँ मुस्लिम आबादी कुछ सीटों पर निर्णायक स्थिति में होने से भाजपा के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी। चुनाव परिणाम ने इस बात को साबित भी कर दिया। पाँच मुस्लिम बहुल सीटों पर कांग्रेस की इकतरफा जीत हुई। लेकिन उन सीटों से आ रहे संकेतों ने प्रदेश में कांग्रेस के समीकरण बिगाड़ दिये जो जाट, दलित और मुस्लिम मतदाताओं के एकमुश्त समर्थन की उम्मीद पर सवार होकर अपनी जीत को निश्चित मानकर चल रही थी। लोकसभा चुनाव के बाद से देश भर से आ रही खबरों ने गैर मुस्लिम मतदाताओं को भी भाजपा के पक्ष में खड़ा किया। नूह में हुए दंगों में हिंदुओं की जो पिटाई हुई थी उसकी यादों ने विधानसभा चुनाव में हिन्दू मतदाताओं को भावी खतरों के प्रति आगाह कर दिया। यही वजह रही कि ओबीसी , ब्राह्मण और वैश्य मतदाताओं के अलावा दलितों और जाटों के मत भी भाजपा की तरफ लुढ़क गए। ये बदलाव इतनी खामोशी से हुआ कि चुनाव विश्लेषक और सर्वेक्षण एजेंसियां तक नहीं भांप सकीं। चुनाव परिणाम से भौंचक कांग्रेस पहले तो ईवीएम और चुनाव आयोग पर उंगलियाँ उठाती रही लेकिन धीरे - धीरे उसे समझ में आ गया कि बाजी हाथ से निकल चुकी है। पार्टी के भीतर आरोप - प्रत्यारोप का सिलसिला भी शुरू हो गया। दलित चेहरे के रूप में मुख्यमंत्री पद की दावेदार कु. शैलजा की नाराजगी को भी वजह माना गया किंतु स्वतंत्र विश्लेषकों ने जम्मू - कश्मीर और हरियाणा के चुनाव परिणामों से निष्कर्ष निकाला कि कांग्रेस द्वारा जातीय जनगणना और मुस्लिम तुष्टीकरण पर जिस तरह जोर दिया उसने एक बार फिर हिन्दू मतदाताओं के ध्रुवीकरण की स्थितियाँ उत्पन्न कर दीं। कश्मीर घाटी में मुस्लिमों के गोलबंद होने की प्रतिक्रिया स्वरूप जम्मू में गैर मुस्लिम मत भाजपा के पक्ष में एकजुट हुए। इसी तरह हरियाणा में भी कांग्रेस द्वारा बनाई गई रणनीति इसलिए विफल साबित हुई क्योंकि उसने जाटों के साथ दलितों और मुस्लिमों के बल पर चुनाव जीतने का ख्वाब देखा। लेकिन यहाँ भी जाति के ऊपर हिंदुत्व भारी पड़ा जिसका प्रमाण जाट बाहुल्य अनेक सीटों पर भाजपा की विजय है। ये भी तब हुआ जब भाजपा ने गैर जाट नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री के तौर पर प्रस्तुत किया । जबकि कांग्रेस में भूपिंदर सिंह हुड्डा ही चेहरे थे। इससे मुख्यमंत्री पद के अन्य दावेदार कोप भवन में चले गए वहीं गैर जाट मतदाताओं में भी कांग्रेस के प्रति असंतोष बढ़ा। भाजपा को मुख्यमंत्री बदले जाने का लाभ लोकसभा चुनाव में भले न मिला हो किंतु विधानसभा चुनाव में श्री हुड्डा के मुकाबले नायब सिंह को लोगों ने पसंद किया। जम्मू - कश्मीर के चुनाव का राष्ट्रीय राजनीति पर उतना असर नहीं पड़ता किंतु हरियाणा ने पूरा राजनीतिक परिदृश्य बदल दिया। 4 जून के बाद से जो कांग्रेस हवा में उड़ रही थी वह जमीन पर आ गई। राहुल गाँधी द्वारा जाति के मुद्दे को ज्यादा हवा दिये जाने पर भी सवाल उठे। ये भी कहा गया कि वक़्फ़ संशोधन पर कांग्रेस का विरोध हिंदुओं को रास नहीं आ रहा। बीते कुछ महीनों में हिंदुओं के धर्म स्थलों और धार्मिक जुलूसों पर हुए हमलों ने लोकसभा चुनाव में भाजपा से नाराज जातीय समूहों को उसके तरफ लौटने के लिए प्रेरित किया। इसका संकेत हरियाणा से मिल गया है। इससे महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा के चुनाव में भाजपा का हौसला जहाँ मजबूत हुआ वहीं कांग्रेस विशेष रूप से राहुल गाँधी का दबदबा कम हुआ है। इंडिया गठबंधन के सहयोगी भी अब ऊँची आवाज में बोलने लगे हैं। मोदी - योगी द्वारा बंटोगे तो कटोगे का जो नारा लगाया जा रहा है उसकी चर्चा हिन्दू समाज में होने लगी है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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