Tuesday, 1 October 2024

राज्य माता का दर्जा देने मात्र से गाय पालने के प्रति उत्साह नहीं जाग सकता

 

चुनाव से पहले सत्ता में बैठे लोगों द्वारा लोक लुभावन घोषणाएं करना एक परिपाटी है । इसी के चलते महाराष्ट्र की शिंदे सरकार ने म.प्र की लाड़ली बहना की नकल करते हुए लड़की बहिन योजना प्रारंभ की जिसमें प्रति माह 1500 रु. दिये जा रहे हैं। इस योजना का असर भी दिखाई देने लगा है । और भी ऐसे ऐलान राज्य सरकार की तरफ से किये जा रहे हैं जो मतदाता को आकर्षित कर सकें। इसी क्रम में गत दिवस देशी गाय को राज्य माता का दर्जा देने के  साथ ही उसे पालने पर प्रतिदिन 50 रु. अनुदान देने की घोषणा भी की गई। देशी नस्ल की गायों को पालने के लिए राज्य सरकार की ओर से की गई पहल सतही तौर पर तो काफी अच्छी प्रतीत होती है। लेकिन गो पालन को प्रोत्साहित करने की सरकारी योजनाओं का जो हश्र अन्य राज्यों में हुआ उसे देखते हुए महाराष्ट्र सरकार की इस घोषणा से देशी गाय पालने के लिए लोगों को आकर्षित करने का उद्देश्य पूरा होने पर संदेह करना गलत नहीं होगा। म.प्र सहित अनेक राज्यों ने गोशालाओं हेतु अनुदान देने की नीति बना रखी है किंतु उनमें गायों की दुर्दशा  किसी से छिपी नहीं है। भोपाल के निकट एक गोशाला में तो सैकड़ों गायें मर गईं। सरकार उनके रखरखाव और भरण - पोषण हेतु जो अनुदान देती है वह भी किसी मजाक से कम नहीं। पहले  शहरों के निकट पर्याप्त  खुली जगह होती थीं उनमें  गाय - भैंस को चरने भेजा जाता था। शहरों के असीमित विस्तार ने वह सुविधा  छीन ली जिससे गाय के लिए आहार का खर्च भी बढ़ गया। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि दुग्ध व्यवसाय में भैंस का उपयोग ज्यादा होने से भी गाय पालने से लोग बचने लगे। ग्रामीण क्षेत्रों में पहले कृषि के साथ गाय पालना आम था। कुछ लोग भैंस भी रखते थे किंतु जब तक बैलों से खेती होती रही तब तक गाय का पालन अनिवार्यता थी क्योंकि बछड़ा ही आगे चलकर बैल बनता था। हालाँकि खेती में मशीनों का उपयोग बढ़ने के बाद भी  ग्रामीण ही नहीं बल्कि शहरों में रहने वाले हिन्दू भी गाय के प्रति श्रद्धा रखते हैं । ज्यादातर घरों में गाय की रोटी आज भी बनती है। उसको माँ कहा जाता है। गो हत्या को पाप की श्रेणी में माना गया है। बहुसंख्यक हिंदुओं की भावनाओं का  सम्मान करते हुए देश के 28 में से 20 राज्यों में गो वध प्रतिबंधित है। हालाँकि प. बंगाल सहित पूर्वोत्तर के राज्यों में उस पर रोक नहीं है और वहाँ गोमांस खाया भी जाता है। भारत में हिंदुओं के अलावा जैन, सिख बौद्ध और पारसी भी गोमांस से परहेज करते हैं। गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग भी धर्म गुरुओं द्वारा उठाई जाती रही किंतु उस पर किसी भी सरकार ने ध्यान नहीं दिया। कुल मिलाकर गोपाल ( श्रीकृष्ण) की आराधना करने वाले देश में गाय के प्रति श्रद्धा के बावजूद उपेक्षा भाव बढ़ता गया जिससे धीरे - धीरे उसके पालन के प्रति रुचि भी घट गई। इसका सबसे ज्वलंत प्रमाण है शहरों और राजमार्गों पर बैठे गायों के झुंड। जो लोग गाय रखे हुए हैं वे भी दूध निकालने  के बाद उसे छोड़ देते हैं । जो गाय दूध देना बंद कर देती हैं वे भी बेसहारा हो जाती हैं । इसीलिए प्रति माह देश भर में हजारों गायें राजमार्गों पर ट्रकों से कुचलकर मारी जाती हैं जिनका शव वहीं सड़ता रहता है। ये सब देखते हुए महाराष्ट्र सरकार द्वारा देशी गाय को राज्य माता का दर्जा देना उसके पालन के प्रति लोगों में उत्साह का सृजन कर सकेगा ये कहना मुश्किल है। और फिर 50 रु. प्रतिदिन का अनुदान भी ऊँट के मुँह में जीरा समान ही है। वैसे गाय के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रयास हर दृष्टि से स्वागत योग्य हैं। गाय का दूध औषधि तुल्य माना जाता है। भैंस की तुलना में उसका रखरखाव भी कम खर्चीला है किंतु वह व्यवसायिक दृष्टि से फायदेमंद नहीं मानी जाती। इसीलिए अधिकतर डेरियों में भैंसे ही होती हैं। वैसे कुछ बड़े शहरों में गाय के दूध और उससे बने घी आदि की अच्छी कीमत मिलती है किंतु ग्रामीण इलाकों और मध्यम श्रेणी के शहरों में लोगों की क्रय शक्ति उतनी नहीं होती। गुजरात जैसे राज्य में अमूल ने दुग्ध उत्पादकों को जिस तरह आर्थिक संबल प्रदान किया वह व्यवस्था  मार्गदर्शक का काम कर सकती है। सही बात ये है कि अर्थ प्रधान इस युग में आस्था पर व्यवसायिकता हावी है। जिस प्रकार हिन्दी को राजभाषा बनाये जाने के बाद भी वह अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव को कम नहीं कर पा रही क्योंकि रोजगार प्राप्ति में वह उसके जितनी सहायक नहीं है। उसी तरह गाय को राज्य माता क्या राष्ट्र माता का  दर्जा दे दिया जाए तब भी उसके पालन के प्रति रुचि तब तक नहीं बढ़ेगी जब तक वह आर्थिक तौर पर  लाभदायी न हो। और भला 50 रु. रोजाना के अनुदान के लिए कौन गाय पालेगा? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 30 September 2024

इजरायल के साथ रिश्ते सुधारने में ही अरब देशों का फायदा

 अक्तूबर 2023 को इजरायल पर हमास ने बड़ा हमला बोला जिसमें 1200 इजरायली नागरिकों की जान गई और 251 को बंधक बना लिया गया। इसी के साथ इजरायल ने हमास के खिलाफ जंग का एलान किया। इस बीच गाजा में इजरायली हमलों के विरोध में हिजबुल्लाह ने भी उत्तरी इजरायल को निशाना बनाना शुरू किया। उस हमले को एक साल पूरा होने में सप्ताह भर बाकी है। इस अवधि में इजरायल ने जो रौद्र रूप दिखाया उसके कारण रूस और यूक्रेन युद्ध की खबरें फीकी पड़ गईं। हमास द्वारा अचानक किये गये  मिसाइल हमलों ने इजरायल की अचूक मानी जाने वाली एयर डिफेंस प्रणाली  पर सवाल उठा दिये। हमास के लड़ाके जिस तरह इजरायली नागरिकों का अपहरण करने में कामयाब हुए उससे पूरी दुनिया स्तब्ध रह गई। यहाँ तक कि अमेरिका भी आश्चर्य में डूब गया।  वह हमला इजरायल की गुप्तचर एजेंसियों के गाल पर भी बड़ा तमाचा था जो  दुनिया भर में धाक जमा चुकी थीं। हमास के हमले के पीछे ईरान का हाथ बताया गया जो अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन है और इजरायल को मिटाने आमादा  है। असल में अमेरिका के प्रयासों से सऊदी अरब और इजरायल के बीच दोस्ती की शुरुआत स्वरूप एक समझौता अंतिम स्थिति में आ गया था जिसके बाद अरब जगत का समूचा शक्ति संतुलन बदल जाता। सं. अरब अमीरात के  देशों से इजरायल के व्यापारिक संबंध कायम होने के बाद ईरान परेशानी में था। उसे लगा कि सऊदी अरब और इजरायल में दोस्ताना कायम होने पर इस्लामिक जगत में इजरायल विरोधी भावना मंद पड़ जायेगी। वैसे भी लगातार युद्ध करते - करते  अनेक  देश हताश हो चुके हैं। अन्य कुछ देश भी इजरायल के विरोधी तो हैं किंतु सीधे टकराव से बचने लगे हैं। लेबनान  और यमन ही हैं जो ईरान की तरह अभी भी उसके प्रति नफरत से भरे हुए हैं। गत वर्ष जब हमास ने  इजरायल पर सैकड़ों मिसाइलें दागकर उसका मनोबल तोड़ने की कोशिश की तब उसने दोगुनी ताकत से पलटवार किया और हमास को समूल नष्ट करने के संकल्प के साथ गाजा पट्टी की आपूर्ति रोक दी। स्मरणीय है अतीत में हुए समझौते में गाजा और पश्चिमी हिस्से के रूप में  फिलीस्तीन के दो टुकड़े कर दिये गए।  बीच में इजरायल है। दोनों को बिजली , पानी सहित अन्य जीवनोपयोगी वस्तुओं की आपूर्ति वही करता है। हमास का हमला गाजा की तरफ से हुआ जिसकी सीमाएं मिस्र और लेबनान से मिलती हैं। इजरायल का जवाबी आक्रमण गाजा वासियों के लिए बरबादी लेकर आया। लाखों लोग बेघर हो गए  । पूरी दुनिया इजरायल पर युद्ध विराम के लिए दबाव डालती रही किंतु वह रुकने तैयार नहीं। लेकिन इस युद्ध का केंद्र अचानक गाजा के साथ ही लेबनान भी बन गया। इसका कारण वहाँ बैठा हिज़बुल्लाह नामक  संगठन है जो इस्लामिक आतंकवाद का मुखिया बना हुआ था। लेकिन बीते कुछ दिनों में ही इजरायल ने उसके सभी शीर्ष नेताओं को मार डाला। लेबनान की राजधानी बेरुत आधे से ज्यादा मलबे में तब्दील हो चुकी है। हिजबुल्लाह की पीठ पर ईरान का हाथ होने से अब ये आशंका व्यक्त की जा रही है कि इजरायल का अगला निशाना वही होगा। इसके डर से ईरान के सर्वोच्च नेता को अति सुरक्षित स्थान पर छुपना पड़ा। कहा जा रहा है पश्चिम एशिया लंबे युद्ध में फंसने जा रहा है। इजरायल के प्रधानमंत्री  नेतन्याहू ने संरासंघ महासभा को संबोधित करते हुए जो तेवर दिखाये उनसे लगता है वह इस बार इस्लामिक आतंकवाद की कमर तोड़ने पर आमादा है। ईरान भी उससे सीधे टकराने का साहस नहीं कर पा रहा। अमेरिका चूंकि इजरायल के साथ खुलकर खड़ा है इसलिए वह कदम पीछे खींचने तैयार नहीं है। लेकिन इस संकट में जो सबसे बड़ी बात सामने आई वह ये कि अरब राष्ट्रों को इजरायल के साथ संबंध सुधारकर पश्चिम एशिया को आग में जलने से बचाने की अकलमंदी दिखानी चाहिए। इजरायल विज्ञान और तकनीक में जितना आगे है उसके सामने  तेल संपदा संपन्न तमाम अरब देश भी कहीं ठहरते नहीं हैं। सं. अरब अमीरात इस बात को समझ चुका है और सऊदी अरब के नये शासक भी इजरायल के साथ अच्छे रिश्तों का फ़ायदा समझकर उससे निकटता स्थापित करना चाह रहे हैं  जिसमें ईरान रोड़े अटका रहा है। इस्लामिक देशों को अपने यहाँ बैठे आतंकवादियों को संरक्षण देना बंद करना होगा जिनके कारण उनकी छवि भी खराब होती है। इसमें दो राय नहीं कि बीते कुछ दशकों से इस्लाम के नाम पर फैलाई जा रही दहशतगर्दी ने पूरी दुनिया को अशांत  कर रखा है। अरब राष्ट्रों से लाखों लोग जान बचाकर यूरोपीय देशों में शरण लेने पहुंचे लेकिन वहाँ भी उन्होंने आंतक के बीज बो दिये। इजरायल ने हमास पर जो हमला किया वह आक्रमण का जवाब था। इसी तरह हिजबुल्लाह के विरुद्ध उसकी कारवाई भी तब हुई जब उसने हमास के समर्थन में इजरायल पर मिसाइलें दागीं। कुल मिलाकर इजरायल जो कर रहा है उसके लिए उसे हमास ने उकसाया। उसकी जगह कोई और देश होता तो वह भी ऐसा ही करता। 


-  रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 28 September 2024

पेट्रोल - डीजल : कम से कम 10 रु. सस्ते हों


दो दिनों से पेट्रोल - डीजल सस्ता किये जाने की खबरें आ रही हैं। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में आई गिरावट के चलते बीते कुछ महीनों में भारत की तेल कंपनियों ने भरपूर मुनाफा कमाया। कहने को तो पेट्रोल - डीजल की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया है किंतु ये केवल दिखावे के लिए है। केंद्र और राज्य सरकारों ने अपना पूरा नियंत्रण उन पर बना रखा है। इसीलिए दुनिया भर में कीमतें कम होने के बावजूद भारत में पेट्रोल - डीजल महंगा बेचा जा रहा है। ज्यादातर तेल कंपनियां सरकार का उपक्रम होने से उन पर पूरा नियंत्रण उसी का है। बीते सालों में एक या दो मर्तबा दाम घटाए भी गए तो बेहद कम। हालाँकि काफी समय से उनमें स्थिरता का बना रहना ही सरकारी मेहरबानी रही। दो वर्ष पहले तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दीपावली के पहले कीमतें घटने का ऐलान कर जनता को उपहार देने की बात कही। कोरोना की विभीषिका से उबरकर दुनिया यूक्रेन संकट में फंस गई। ऐसी स्थिति में आम तौर पर कच्चा तेल महंगा हो जाता है। लेकिन रूस से हुए सौदे के तहत भारत को सस्ते दामों पर कच्चा तेल मिलने से हम बड़े घाटे से बचे रहे। यही वजह है कि भारत की तेल कंपनियां भारी मुनाफा कमाने में सफल रहीं। जो खबरें अधिकृत तौर पर प्रसारित हुईं उनके अनुसार आज की स्थिति में उनको प्रति लीटर पर 15 रु. का मुनाफा है। ऐसे में यदि पिछली बार की तरह मात्र 2 से 3 रु. प्रति लीटर कीमतें घटाई जाती हैं तो इसे ऊँट के मुँह में जीरा कहा जाएगा। युद्द या किसी अन्य आपातकालीन स्थिति में जनता से अपेक्षा होती है सरकार का साथ दे किंतु  आये दिन ये दावा किया जाता है कि अर्थव्यवस्था बेहद सुखद स्थिति में है और मेक इन इंडिया की 10 वर्षीय मुहिम के कारण देश  निर्यात के क्षेत्र में भी तेजी से आगे  बढ़ रहा है । भारत में बने रक्षा उपकरणों की दुनिया भर में भारी मांग होने से व्यापार संतुलन की स्थिति सुधरी है। कूटनीतिक मंचों पर भारत को विश्व की महाशक्तियों के बराबर बिठाया जाता है। सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता  के लिए हमारे दावे का समर्थन वे देश भी करने लगे हैं जो अब तक भारत को हेय दृष्टि से देखा करते थे। देश में वैकल्पिक ईंधन का उपयोग बढ़ने से पेट्रोल डीजल की खपत कम करने का प्रयास भी रंग ला रहा है। जीएसटी और टोल टेक्स से होने वाली कमाई उम्मीद से ज्यादा होने लगी है। आयकर संग्रह   भी लक्ष्य से अधिक होना शुभ संकेत है। ये देखते हुए सबसे अच्छा तो यही होगा कि जीएसटी काउंसिल की आगामी बैठक में पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी में शामिल किया जावे। हालाँकि इसके लिए राज्यों की असहमति का बहाना बना दिया जाता है। लेकिन यदि किसी विशेष परिस्थितिवश ऐसा करना संभव न हो तब भी केंद्र सरकार पेट्रोल डीजल के दामों में कम से कम 10 रु. प्रति लीटर की कमी करे। इसके साथ ही रसोई गैस सिलेंडर के दाम  भी 150 से 200 रु. कम किये जाएं, तभी इसे सही मायनों में दीपावली उपहार माना जाएगा। यदि इसमें भी सरकार के वित्तीय सलाहकार टांग फंसाएं तो फिर ईमानदारी इसी में है कि पेट्रोलियम उत्पादों को बाजार के उतार - चढ़ाव पर छोड़ दिया जावे। काफी समय तक पेट्रोल - डीजल की कीमतों में ये प्रयोग चलता रहा जिसके कारण दैनिक स्तर पर कीमतें घटती - बढ़ती रहीं और जनता भी उसे सहज भाव से लेने लगी थी किंतु निजी क्षेत्र को आर्थिक सुधारों को अपनाने की नसीहत देने वाला सरकारी तंत्र पेट्रोल - डीजल के दामों को अपनी मुट्ठी में कैद करने  पर आमादा है। मोदी सरकार से मंहगाई को लेकर उसके प्रतिबद्ध समर्थक भी नाराज हैं। जिसमें पेट्रोल - डीजल की कीमतें बड़ा कारण है। ऐसे में जब दक्षिण एशिया के छोटे - छोटे देशों में इन चीजों के दाम भारत की तुलना में बेहद कम हैं तब हमारे यहाँ उनका 100 रु. प्रति लीटर से ज्यादा होना मुनाफाखोरी नहीं तो और क्या है? दाम घटाने की जो खबरें उड़ रही हैं उनके पीछे कुछ राज्यों के विधानसभा  चुनाव  भी हैं। खास तौर पर महाराष्ट्र को लेकर भाजपा काफी चिंतित है। ऐसे में यदि दाम घटाना ही है तो कम से कम उतने तो हों जिनसे लोग राहत का अनुभव करें। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 27 September 2024

हिमाचल के शांत माहौल में आग लगाने वालों के मंसूबों को कुचलना जरूरी


प्राकृतिक सुंदरता के साथ ही शांतिप्रियता के लिए प्रसिद्ध  हिमाचल प्रदेश इन दिनों अशांत  है। राजधानी शिमला की एक मस्जिद के अवैध निर्माण का हिन्दू संगठनों ने जब विरोध किया तब उसे तोड़ने की कवायद शुरू हुई। मस्जिद के मौलवी की ये सफाई किसी के गले नहीं उतरी कि उसे नहीं पता मस्जिद में हुआ अवैध निर्माण किसने करवाया। वह विवाद जैसे - तैसे सुलझा तो मंडी जिले की एक मस्जिद में अवैध निर्माण के विरोध में शुरू हुआ हिंदुओं का आंदोलन देखते - देखते  पूरे प्रदेश में फैल गया। हिमाचल  में मुस्लिम आबादी उंगलियों पर गिनने लायक है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में वहाँ उ.प्र से मुसलमानों के  आकर बसने का सिलसिला शुरू हुआ और उसी के साथ  तनाव की नींव पड़ गई। ये लोग यहाँ किस कारण से बसे ये स्पष्ट नहीं है। हिमाचल  में  कोई मुस्लिम धार्मिक केंद्र भी नहीं है। अवैध रूप से दुकानें खोलने और सड़कों पर रेहड़ी लगाने वालों में मुस्लिमों की बढ़ती संख्या के बीच जब उनमें  से कुछ के दस्तावेजों की जाँच हुई तब पता चला कि  ज्यादातर की जन्मतिथि 1 जनवरी है। ये जानकारी भी उजागर हुई कि राज्य के अनेक शहरों में दशकों  से  वीरान पड़ी मस्जिदों में अचानक नमाज  की शुरुआत हो गई जिसमें अन्य राज्यों से आये लोगों की बड़ी संख्या नजर आई। हिन्दू संगठनों का आरोप है कि मुस्लिम  आबादी जिस रहस्यमय तरीके से बढ़ी वह किसी बड़े षडयंत्र का हिस्सा लगता है। बहुसंख्यक आबादी को ये भी महसूस होने लगा कि अन्य राज्यों से आ रहे मुस्लिम माहौल को  तनाव ग्रस्त बना रहे हैं। मस्जिदों के इर्द गिर्द रहने वाले हिन्दू परिवारों की महिलाएं इन बाहरी तत्वों की अश्लील हरकतों  से असहज महसूस करने लगीं। जब इसकी शिकायत की गई तो जवाब मिला आप अपनी आँखें बंद कर लीजिये। हिन्दू व्यापारियों के प्रतिष्ठानों के सामने जबरन अपना कारोबार शुरू करने से भी विवाद पैदा हो रहे हैं। बड़ी मंडियों में अचानक अपरिचित व्यापारियों की आमद होने से स्थानीय व्यवसायी परेशानी में हैं।   शिमला की मस्जिद के अवैध निर्माण को तोड़ने के लिए सख्त कदम उठाये जाने का सकारात्मक असर भी हुआ। इसी क्रम में गत दिवस राज्य के एक मंत्री विक्रमादित्य सिंह द्वारा कहा गया कि उ.प्र की तरह ही  हिमाचल में भी खाद्य सामग्री बेचने वालों को अपनी आईडी और नाम लिखना होगा। इस हेतु एक समिति विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बनाये जाने की बात भी कही गई । विक्रमादित्य पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंह के पुत्र हैं ।  उनकी माँ प्रतिभा देवी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थीं और विधानसभा  चुनाव में पार्टी की जीत के बाद मुख्यमंत्री पद की दावेदार रहीं । लेकिन हाईकमान ने सुखविंदर सिंह सुक्खू की ताजपोशी करवा दी।  विक्रमादित्य मंत्री बन तो  गए किंतु कुछ विधायकों के इस्तीफे के बाद उत्पन्न राजनीतिक संकट के दौरान उन्होंने पद छोड़ दिया। यद्यपि बाद में त्यागपत्र वापस ले लिया लेकिन मुख्यमंत्री से उनके  मतभेद बने हुए हैं। इसलिए जब खाद्य सामग्री विक्रेताओं को अपनी पहिचान के साथ कर्मचारियों का नाम प्रदर्शित करने के फैसले की खबर उनके हवाले से आई तो लोग चौंक गए क्योंकि ऐसा ही आदेश उ.प्र की योगी सरकार द्वारा जारी किये जाने पर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने आसमान सिर पर उठा लिया था। लेकिन कुछ घंटों बाद ही खबर आ गई कि कांग्रेस हाईकमान इस आदेश से बहुत नाराज है और विक्रमादित्य को दिल्ली तलब किया गया है। मुख्यमंत्री श्री सुक्खू ने भी स्पष्टीकरण दिया कि अभी उक्त निर्णय लागू नहीं किया गया। लेकिन इस सबसे कांग्रेस का अधकचरापन एक बार फिर सामने आ गया। दुकान के मालिक का नाम या पहिचान प्रदर्शित करना धर्मनिरपेक्षता के लिए कौन सा खतरा है ये समझ से परे है। असली मुद्दा हिमाचल प्रदेश में आ रहे बाहरी लोगों की पहिचान उजागर करना है। मैदानी इलाकों से पहाड़ी राज्य में आकर बसने वालों का सत्यापन जरूरी है। हिमाचल के कुछ इलाके सीमावर्ती होने से सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी हैं। उस लिहाज से संदर्भित निर्णय  रोककर राज्य सरकार और कांग्रेस हाईकमान इस राज्य के सामाजिक ताने - बाने को नष्ट करने में सहायक बन  रही है। जिन इलाकों में दूर - दूर तक मुस्लिम आबादी न हो वहाँ अचानक मस्जिद बनने लगे तो संदेह होना स्वाभाविक है। उत्तराखंड  पहले से ही इस समस्या से जूझ रहा है और अब एक और पहाड़ी राज्य में वैसे ही हालात बन रहे हैं । संयोग से दोनों की सीमाएं चीन से मिलती हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 26 September 2024

राहुल के बयान से कश्मीर घाटी के अलगाववादियों का हौसला बढ़ेगा



कांग्रेस समर्थक प्रचार माध्यम लगातार ये दावा कर रहे हैं  कि राहुल गाँधी काफी परिपक्व हो गए हैं। संसद में उनके भाषणों के आधार पर ये अवधारणा बनाने का प्रयास भी जारी है कि  वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकल्प के तौर पर  स्थापित हो गए हैं। उनकी हालिया अमेरिका यात्रा में इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा ने भारतीय श्रोताओं के सामने कहा कि राहुल पप्पू  नहीं अपितु एक कुशल रणनीतिकार हैं। कोई पार्टी अपने नेता को महिमामंडित करे तो आश्चर्य नहीं होता। लेकिन ये नेता पर निर्भर है कि वह अपने को उस कसौटी पर साबित करे।  लोकसभा चुनाव में मिली 99 सीटों को लेकर श्री गाँधी में जो  उत्साह उत्पन्न हुआ वह पूरी तरह सही है किंतु अभी भी वे कुछ न कुछ ऐसा कह जाते हैं जिससे उनकी छवि तो खराब होती ही है , कांग्रेस को भी रक्षात्मक हो जाना पड़ता है। अमेरिका यात्रा में भी उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था और जातिगत जनगणना के मुद्दे पर जो टिप्पणियाँ कीं वे बेहद गैर जिम्मेदाराना थीं। वहाँ से लौटने के बाद भी वे जिस तरह से  बयानबाजी कर रहे हैं उससे उनके परिपक्व होने पर संदेह होता है। गत दिवस जम्मू कश्मीर चुनाव  में कांग्रेस का प्रचार करते हुए उन्होंने कह दिया कि भाजपा ने जम्मू कश्मीर से पूर्ण राज्य का दर्जा इसलिए छीना क्योंकि वह उप राज्यपाल के जरिये बाहरी लोगों से राज्य को चलाना चाहती थी। जब तक वे यहाँ रहेंगे जम्मू कश्मीर के खर्चे पर बाहरी लोगों को लाभ मिलता रहेगा। उनका यह कथन कश्मीर घाटी के अलगाववादियों के बयानों का समर्थन करने वाला है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के नाते उनको  इतना ज्ञान तो होना ही चाहिए कि देश के हर राज्य में राज्यपाल और  केंद्र शासित प्रदेश में उपराज्यपाल की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है। राष्ट्रपति शासन लगने पर विधानसभा के अधिकार भी संसद में निहित हो जाते हैं।  श्री गाँधी ने उपराज्यपाल के बाहरी होने का मुद्दा छेड़कर व्यर्थ की बहस को जन्म दे दिया। राज्यपाल अथवा उपराज्यपाल की नियुक्ति करते समय जाहिर तौर पर केंद्र की सत्ता में बैठी पार्टी अपने अनुकूल व्यक्तियों का चयन करती है। लेकिन वे उसी राज्य के हों ये न तो संवैधानिक तौर पर जरूरी है और न ही संघीय ढांचे की मजबूती के लिये। कांग्रेस जब - जब केंद्र की सत्ता में रही तब उसने जम्मू कश्मीर में जिन राज्यपालों को पदस्थ किया उनमें डाॅ. कर्णसिंह को छोड़कर सभी अन्य राज्यों के थे। श्री गाँधी द्वारा जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलवाने के लिए केंद्र पर दबाव बनाने की जो बात कही उस पर किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए। वह इस चुनाव का वह प्रमुख मुद्दा भी  है किंतु उपराज्यपाल को बाहरी व्यक्ति बताना संघीय ढाँचे की व्यवस्था को ध्वस्त करने का प्रयास माना जायेगा। उनके ऐसे ही बयानों के कारण उनकी राजनीतिक समझ पर संदेह होने लगता है। ऐसा कहते समय वे भूल गए कि जम्मू कश्मीर में सबसे लंबा राष्ट्रपति शासन 1990 से 96 तक लगा था। 6 वर्ष 264 दिन की उस अवधि के दौरान केंद्र में  5 साल कांग्रेस और शेष समय उसके समर्थन वाली सरकार थी। तब कश्मीर के अलगाववादी नेता और संगठन जो बातें कहते थे उन्हीं को श्री गाँधी ने एक तरह से दोहरा दिया। इस चुनाव में भी अनेक नेता जम्मू कश्मीर के भविष्य का फैसला वहीं की जनता की मर्जी पर छोड़ने की बात बोल रहे हैं। कांग्रेस की गठबंधन सहयोगी नेशनल काँफ्रेंस खुलकर धारा 370 की वापसी का वायदा कर रही है। कांग्रेस भले ही इस मुद्दे पर शांत है किंतु उसमें इस वायदे का विरोध करने का साहस भी नहीं है। शायद इसीलिए नेशनल काँफ्रेंस को वह बोझ लगने लगी। इसका प्रमाण उसके नेता उमर अब्दुल्ला द्वारा राहुल गाँधी को कश्मीर घाटी की बजाय जम्मू अंचल में ध्यान केंद्रित करने की नसीहत दिये जाने  से मिला। उन्होंने ये आरोप भी लगाया कि कांग्रेस को जम्मू क्षेत्र में ज्यादा सीटें दी गईं थीं किंतु उसने वहाँ काम शुरू ही नहीं किया जबकि मतदान को कुछ दिन ही शेष हैं। श्री अब्दुल्ला के इस बयान को गठबंधन में दरार  के तौर पर देखा जा रहा है। उल्लेखनीय है अब्दुल्ला परिवार इस बार गठबंधन के पक्ष में नहीं था किंतु राहुल पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को लेकर श्रीनगर गए और उसके लिए दबाव बनाया। लेकिन दूसरे चरण तक अब्दुल्ला परिवार को गलती का एहसास होने लगा जिसकी बानगी उमर द्वारा  नाराजगी व्यक्त किये जाने से मिली। इसके बाद भी यदि कांग्रेस को समझ नहीं आ रही तो ये उसकी इच्छा किंतु श्री गाँधी यदि इसी तरह के गैर जिम्मेदराना बयान देते रहे तो इससे उन्हें और उनकी पार्टी दोनों को नुकसान होगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 25 September 2024

शेयर बाजार की उछाल के बीच छोटे निवेशकों के हितों की सुरक्षा जरूरी



शेयर बाजार के उतार चढ़ाव किसी देश की अर्थव्यवस्था में निवेशकों के भरोसे का पैमाना माना जाता है। वैश्वीकरण के  बाद तो इसमें विदेशी पूंजी का आगमन भी बेरोकटोक होने लगा है। इस बारे में उल्लेखनीय है कि विदेशी निवेशकों का आना अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत होता है। ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि अब पूंजी के इस खेल में केवल धनवान लोग ही शामिल नहीं होते अपितु मध्यमवर्गीय निवेशकों का एक बड़ा वर्ग भी शेयर बाजार में हाथ आजमाने लगा है। बचत के परंपरागत तरीके बदल रहे हैं। बैंकों द्वारा जमा राशि पर ब्याज दर घटाए जाने के फलस्वरूप छोटे निवेशकों की शेयर बाजार में रुचि उत्पन्न हुई। इसमें भी अनेक ऐसी योजनाएं निकलीं जिनसे किश्तों में निवेश के बावजूद निश्चित लाभ मिलने का आश्वासन मिलने से बैंकों की बजाय लोग शेयर बाजार और उससे जुड़ी अन्य योजनाओं के प्रति आकर्षित हुए। उसी का परिणाम है कि चंद लोगों तक सीमित यह व्यवसाय समाज में चर्चा का विषय बन गया। शेयर बाजार को सट्टा बाजार भी कहा जाता है क्योंकि निवेशकों द्वारा लगाए गए धन पर इच्छित लाभ न मिलने के अलावा उसके डूबने का खतरा भी रहता है। शेयर बाजार का संचालन करने वाली संस्था सेबी इस बारे में आगाह भी करती रहती है। इसके बाद भी घोटाले होते हैं । बड़ी - बड़ी कंपनियां पलक झपकते डूब जाती हैं। हिंडनबर्ग रिपोर्ट जैसे हादसे भी देखने आये हैं जिन्होंने न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया के अनेक देशों के शेयर बाजारों को धराशायी कर दिया। भारत में भी हर्षद मेहता और यूनिट ट्रस्ट जैसे कांड होने के बाद शेयर बाजार लड़खड़ाया किंतु कुछ समय बाद वह पटरी पर लौट भी आया। भारत में उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद शेयर बाजार आम लोगों के घरों तक जा पहुंचा।  इसीलिए इसे लेकर सरकार को ज्यादा चिंता करनी चाहिए क्योंकि छोटे निवेशक की कमाई डूबना उसकी तबाही का कारण बन जाता है। भारत का शेयर बाजार इन दिनों कीर्तिमान तोड़ने में जुटा हुआ है। गत दिवस उसके सूचकांक  ने 85 हजार का आंकड़ा छू लिया।  लोकसभा चुनाव के पहले शेयर बाजार से आ रहे संकेतों के अनुसार मोदी सरकार की वापसी पर सूचकांक के 1 लाख तक उछलने की  उम्मीद थी। इसलिये जब एग्जिट पोल के नतीजों में ये बताया गया कि श्री मोदी को तीसरी पारी खेलने का मौका मिलने जा रहा है तो शेयर बाजार ने लंबी छलांग लगा दी। लेकिन परिणाम अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहे । भाजपा के स्पष्ट बहुमत से पीछे रहते ही शेयर बाजार धड़ाम से गिरने लगा। हालांकि बाहरी समर्थन से सरकार तो बन गई किंतु विपक्ष द्वारा उसके स्थायित्व को लेकर भ्रम पैदा करने से निवेशकों में भी डर बना रहा। विदेशी पूंजी के आगमन में भी कमी देखी गई। केंद्र सरकार के बजट में भी ऐसा कुछ नहीं दिखा जो शेयर बाजार को रास आता किंतु कुछ समय बाद से ही उसमें स्थिरता आई और उसके बाद से वह फर्राटे मारने लगा। बीच में जब विदेशी निवेशकों का भरोसा भारतीय बाजार में डगमगाया तब भी घरेलू निवेशकों ने उसको सहारा देते हुए सबको चौंका दिया। वर्तमान में जो उछाल है उसके पीछे अंतर्राष्ट्रीय कारण तो अपनी जगह हैं ही लेकिन छोटी बचत करने वालों का भरोसा बैंकों की बजाय शेयर बाजार में जिस तरह बढ़ा वह वैसे तो शुभ संकेत है किंतु सरकार को इस बात की चिंता करनी चाहिए कि मध्यमवर्गीय निवेशकों की राशि सुरक्षित रहे। शेयर बाजार पूरी तरह अनिश्चितता का खेल है। जो लोग उसकी बारीकियाँ समझते हैं वे तो हवा का रुख भांपकर सावधान हो जाते हैं किंतु छोटे निवेशकों को इसके बारे में ज्यादा पता नहीं होता। इसलिए उनको नुकसान से बचाना अर्थव्यवस्था के दूरगामी हितों की दृष्टि से जरूरी है क्योंकि  जिस तरह शेयर बाजार की उछाल  लोगों मनोबल बढ़ाती है वहीं उसका अचानक नीचे गिरना देश की प्रतिष्ठा के लिए घातक होता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 24 September 2024

ओवैसी के बयान ने खोल दी वक्फ की पोल


वक्फ संशोधन विधेयक भले ही अभी जेपीसी के पास विचारार्थ हो किंतु उ.प्र के  कौशाम्बी जिले में ग्राम सभा की 96 बीघा भूमि उससे वापस लेकर ग्राम सभा के नाम दर्ज करने का एस. डी. एम का फैसला चर्चा का विषय बना हुआ है। यह प्रकरण 1946 से लंबित था। वक्फ बोर्ड का दावा था कि अलाउद्दीन खिलजी के जमाने में बतौर माफीनामा वह भूमि मिली थी । सरकारी रिकार्ड में भी वह वक्फ संपत्ति दर्शाई गई थी किंतु 2 साल पहले यह खुलासा हुआ कि वह ग्राम सभा की भूमि है और उसके बाद अदालती आदेश पर उसे वापस ग्राम सभा के नाम दर्ज कर दिया गया। इस मामले की विस्तृत रिपोर्ट राज्य शासन द्वारा मंगवाकर अवैध तौर पर हड़पी गई जमीनें एवं अन्य संपत्तियाँ वापस लेने की मुहिम शुरू किये जाने की खबर से वक्फ बोर्ड में घबराहट है।  कौशाम्बी जैसे मामले पूरे प्रदेश में होने की आशंका जताई जा रही है। राज्य की पिछली  गैर भाजपा सरकारों  में मुस्लिम वोट बैंक के लालच में वक्फ के अवैध कब्जों वाली संपत्तियों को छीनने का साहस ही नहीं हुआ । लिहाजा सार्वजनिक भूमि को वक्फ का बताकर अवैध कब्जे होते रहे। वक्फ संशोधन का विरोध करने के साथ ही मुस्लिम समुदाय द्वारा देश भर में हिंदुओं के धर्मस्थल के अलावा सरकारी इमारतों तक को वक्फ संपत्ति बताकर खाली करने का दबाव बनाया जा रहा है। इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हिन्दू  समाज में देखने मिल रही है। इसी के चलते उ.प्र की योगी सरकार कौशाम्बी प्रकरण को आधार बनाकर पूरे राज्य में वक्फ के कब्जे वाली संपत्तियों की वैधानिकता जाँचने  जा रही है। मुस्लिम समाज इससे भन्नाया हुआ है। उसकी हमदर्द सामजवादी पार्टी तथा कांग्रेस के पेट में भी मरोड़ होने लगा है क्योंकि वक्फ संशोधन के पक्ष में वे हिन्दू भी खड़े नजर आ रहे हैं जिन्होंने गत  लोकसभा चुनाव में भाजपा के विरोध में मतदान किया था। दरअसल जबसे हिंदुओं  के संज्ञान में ये बात आई कि वक्फ जिस संपत्ति पर अपना दावा कर दे वह बिना किसी लागलपेट के उसकी हो जायेगी, तबसे उनके बीच भय व्याप्त है। विशेष रूप  से मंदिरों जैसे धार्मिक स्थलों पर वक्फ के दावों की आशंका चिंता बढ़ा रही है। लेकिन कुछ दिनों पहले मुस्लिम समाज के सांसद असदुद्दीन ओवैसी के भाषण का एक वीडियो तेजी से प्रसारित हुआ जिसमें वे मुसलमानों को वक्फ संशोधन का विरोध करने हेतु प्रेरित करने के साथ ही ये भी बोल गए कि उक्त विधेयक पारित होने पर वक्फ के हाथ से बड़े पैमाने पर संपत्तियाँ निकल जाएंगी। इसके बाद उन्होंने वह राज खोल दिया जिसके कारण मुस्लिम समाज इस संशोधन से भड़का हुआ है। ओवैसी ने खुले मंच से मुसलमानों को आगाह किया कि उ.प्र  में वक्फ के आधिपत्य में जो 1.21 लाख संपत्तियाँ हैं उनमें से 1.12 लाख के वैधानिक दस्तावेज नहीं हैं। इसलिए वक्फ संशोधन  कानून में बदला तो बिना दस्तावेज वाली संपत्तियाँ उसके हाथ से छिन जाएंगी। ओवैसी के इस बयान ने वक्फ के नाम पर देश भर में किये गए अवैध कब्जों की पोल खोलकर रख दी। लेकिन उ.प्र के कौशाम्बी में ग्राम सभा की 96 बीघा भूमि वक्फ से छीने जाने के बाद से योगी सरकार जिस तरह वक्फ के फर्जीवाड़े का पर्दाफाश करने सक्रिय हुई  वह अन्य राज्यों के लिए एक सबक है। यदि भाजपा और उसके सहयोगियों द्वारा शासित राज्यों में भी वक्फ द्वारा बिना वैधानिक दस्तावेजों के कब्जा की गई जमीनों एवं अन्य संपत्तियों को वापस लेने का अभियान छेड़ दिया गया तब गैर भाजपा राज्य सरकारें भी वैसा करने बाध्य होंगी। इस प्रकार संदर्भित संशोधन पारित होने के पहले ही वक्फ के कर्ताधर्ताओं में हड़कंप मचा हुआ है। इस बारे में ये बात भी ध्यान देने वाली है कि भले ही मौलवियों के दबाव में मुस्लिम समुदाय इस संशोधन का विरोध कर रहा हो किंतु एक वर्ग ऐसा है जो वक्फ संपत्ति पर समाज के कुछ  लोगों द्वारा कब्जा कर उसका लाभ लेने से नाराज हैं। ये आरोप भी लग रहा है कि वक्फ बोर्ड के कब्जे वाली संपत्तियों का समुचित रखरखाव न होने से उनसे अपेक्षित आय नहीं होती और समाज के जरूरतमंद लोगों के कल्याण के कार्यक्रम अधर में अटक जाते हैं। ये चर्चा भी  है कि वक्फ की अनेक संपत्तियों से होने वाली कमाई कुछ प्रभावशाली लोगों की जेब में चली जाती है। इस तरह की शिकायतें हिंदुओं सहित अन्य धर्मों के न्यासों में भी हैं किंतु वक्फ के पास सेना और रेलवे के बाद सबसे ज्यादा जमीनें हैं। इसलिए उसमें होने वाले घोटाले भी बड़े ही होंगे। ओवैसी ने तो केवल उ.प्र का खुलासा किया है। बाकी  राज्यों में  भी यही स्थिति हो तो अचरज नहीं होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी