Wednesday, 25 September 2024

शेयर बाजार की उछाल के बीच छोटे निवेशकों के हितों की सुरक्षा जरूरी



शेयर बाजार के उतार चढ़ाव किसी देश की अर्थव्यवस्था में निवेशकों के भरोसे का पैमाना माना जाता है। वैश्वीकरण के  बाद तो इसमें विदेशी पूंजी का आगमन भी बेरोकटोक होने लगा है। इस बारे में उल्लेखनीय है कि विदेशी निवेशकों का आना अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत होता है। ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि अब पूंजी के इस खेल में केवल धनवान लोग ही शामिल नहीं होते अपितु मध्यमवर्गीय निवेशकों का एक बड़ा वर्ग भी शेयर बाजार में हाथ आजमाने लगा है। बचत के परंपरागत तरीके बदल रहे हैं। बैंकों द्वारा जमा राशि पर ब्याज दर घटाए जाने के फलस्वरूप छोटे निवेशकों की शेयर बाजार में रुचि उत्पन्न हुई। इसमें भी अनेक ऐसी योजनाएं निकलीं जिनसे किश्तों में निवेश के बावजूद निश्चित लाभ मिलने का आश्वासन मिलने से बैंकों की बजाय लोग शेयर बाजार और उससे जुड़ी अन्य योजनाओं के प्रति आकर्षित हुए। उसी का परिणाम है कि चंद लोगों तक सीमित यह व्यवसाय समाज में चर्चा का विषय बन गया। शेयर बाजार को सट्टा बाजार भी कहा जाता है क्योंकि निवेशकों द्वारा लगाए गए धन पर इच्छित लाभ न मिलने के अलावा उसके डूबने का खतरा भी रहता है। शेयर बाजार का संचालन करने वाली संस्था सेबी इस बारे में आगाह भी करती रहती है। इसके बाद भी घोटाले होते हैं । बड़ी - बड़ी कंपनियां पलक झपकते डूब जाती हैं। हिंडनबर्ग रिपोर्ट जैसे हादसे भी देखने आये हैं जिन्होंने न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया के अनेक देशों के शेयर बाजारों को धराशायी कर दिया। भारत में भी हर्षद मेहता और यूनिट ट्रस्ट जैसे कांड होने के बाद शेयर बाजार लड़खड़ाया किंतु कुछ समय बाद वह पटरी पर लौट भी आया। भारत में उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद शेयर बाजार आम लोगों के घरों तक जा पहुंचा।  इसीलिए इसे लेकर सरकार को ज्यादा चिंता करनी चाहिए क्योंकि छोटे निवेशक की कमाई डूबना उसकी तबाही का कारण बन जाता है। भारत का शेयर बाजार इन दिनों कीर्तिमान तोड़ने में जुटा हुआ है। गत दिवस उसके सूचकांक  ने 85 हजार का आंकड़ा छू लिया।  लोकसभा चुनाव के पहले शेयर बाजार से आ रहे संकेतों के अनुसार मोदी सरकार की वापसी पर सूचकांक के 1 लाख तक उछलने की  उम्मीद थी। इसलिये जब एग्जिट पोल के नतीजों में ये बताया गया कि श्री मोदी को तीसरी पारी खेलने का मौका मिलने जा रहा है तो शेयर बाजार ने लंबी छलांग लगा दी। लेकिन परिणाम अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहे । भाजपा के स्पष्ट बहुमत से पीछे रहते ही शेयर बाजार धड़ाम से गिरने लगा। हालांकि बाहरी समर्थन से सरकार तो बन गई किंतु विपक्ष द्वारा उसके स्थायित्व को लेकर भ्रम पैदा करने से निवेशकों में भी डर बना रहा। विदेशी पूंजी के आगमन में भी कमी देखी गई। केंद्र सरकार के बजट में भी ऐसा कुछ नहीं दिखा जो शेयर बाजार को रास आता किंतु कुछ समय बाद से ही उसमें स्थिरता आई और उसके बाद से वह फर्राटे मारने लगा। बीच में जब विदेशी निवेशकों का भरोसा भारतीय बाजार में डगमगाया तब भी घरेलू निवेशकों ने उसको सहारा देते हुए सबको चौंका दिया। वर्तमान में जो उछाल है उसके पीछे अंतर्राष्ट्रीय कारण तो अपनी जगह हैं ही लेकिन छोटी बचत करने वालों का भरोसा बैंकों की बजाय शेयर बाजार में जिस तरह बढ़ा वह वैसे तो शुभ संकेत है किंतु सरकार को इस बात की चिंता करनी चाहिए कि मध्यमवर्गीय निवेशकों की राशि सुरक्षित रहे। शेयर बाजार पूरी तरह अनिश्चितता का खेल है। जो लोग उसकी बारीकियाँ समझते हैं वे तो हवा का रुख भांपकर सावधान हो जाते हैं किंतु छोटे निवेशकों को इसके बारे में ज्यादा पता नहीं होता। इसलिए उनको नुकसान से बचाना अर्थव्यवस्था के दूरगामी हितों की दृष्टि से जरूरी है क्योंकि  जिस तरह शेयर बाजार की उछाल  लोगों मनोबल बढ़ाती है वहीं उसका अचानक नीचे गिरना देश की प्रतिष्ठा के लिए घातक होता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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