Wednesday, 18 September 2024

कामचलाऊ मुख्यमंत्री की छवि से निकलना आतिशी के लिए बड़ी चुनौती




आखिरकार दिल्ली के नये मुख्यमंत्री का नाम सामने आ ही गया। अरविंद केजरीवाल के त्यागपत्र के बाद  दिल्ली सरकार में मंत्री रहीं आतिशी उनकी उत्तराधिकारी बनीं। हालांकि आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में जो लोग शामिल हैं उन्हें दरकिनार करते हुए आतिशी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाना चौंकाने वाला निर्णय माना जा रहा है किंतु पार्टी के सर्वोच्च नेता अरविंद केजरीवाल जिस तरह की राजनीति के लिए जाने जाते हैं उसमें ऐसा होना अस्वाभविक भी नहीं है। मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के जेल जाने के बाद आतिशी ने दिल्ली सरकार और आम आदमी पार्टी दोनों का काम जिस कुशलता से संभाला उसे उनकी पदोन्नति का कारण बताया जा रहा है । अब तक सत्ता और संगठन के खेल में वे काफी अनुभवी भी हो चुकी हैं। सबसे बड़ी बात है उनका स्वयंसेवी संगठन  (एन.जी.ओ) में कार्य करने का अनुभव जो आम आदमी पार्टी की कार्यशैली का आधार है। श्री केजरीवाल के अलावा पार्टी के कुछ अन्य बड़े नेता भी इन्हीं संगठनों से होकर राजनीति से जुड़े। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन  में भी ज्यादातर वही गैर राजनीतिक लोग थे जिनकी रुचि सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने की रही। आतिशी ने भी ऑक्सफोर्ड जैसे प्रतिष्ठित वि.वि से शिक्षा ग्रहण करने के उपरांत म.प्र में एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में कार्य किया।  कहा जा रहा है उनके मुख्यमंत्री बनने से  कम से कम दिल्ली विधानसभा चुनाव में तो आधी आबादी इस कदम से आम आदमी पार्टी के पक्ष में झुक ही जायेगी। लेकिन  उनमें सबसे बड़ी कमी ये है कि वे कठपुतली बनी रहकर काम करेंगी । गत दिवस उन्होंने  स्वीकार  भी किया  कि भले ही वे इस कुर्सी पर बैठ जाएं किंतु  मुख्यमंत्री तो श्री केजरीवाल ही रहेंगे। ये बात पूरी तरह सही है कि पार्टी में अनेक नेता ऐसे हैं जो मुख्यमंत्री बनाये जाने योग्य थे किंतु श्री केजरीवाल ने बहुत सोच - समझकर गोटी चली। महिला मुख्यमंत्री के तौर पर वे अपनी पत्नी सुनीता केजरीवाल को भी चुन सकते थे। उनकी गिरफ्तारी के बाद वे जिस तरह सक्रिय हुईं उससे दिल्ली में भी राबड़ी देवी की पुनरावृत्ति होने की चर्चा आम थी किंतु श्री केजरीवाल को बिहार और दिल्ली के सामाजिक ढांचे का अंतर पता है। इसलिए उन्होंने वक़्त की नज़ाकत को समझते हुए आतिशी के सिर पर ताज रखा , जिनका रिमोट कंट्रोल पूरी तरह से उनके पास रहेगा। एक महिला मुख्यमंत्री के रूप में वे जयललिता, मायावती, और ममता बनर्जी की बराबरी कैसे कर सकेंगी , ये बड़ा सवाल है। ऐसे में श्री केजरीवाल का ये आशावाद सफल नहीं हो सकेगा कि आतिशी के जरिये वे देश भर की महिला मतदाताओं को लुभा सकेंगे। इसका एक कारण ये भी है कि उन्होंने विधानसभा चुनाव के बाद दोबारा दिल्ली की गद्दी संभालने की बात कही जिसका आतिशी ने भी समर्थन किया। इस प्रकार  बतौर मुख्यमंत्री उनकी छवि  कामचलाऊ की ही रहेगी। वैसे भी  श्री केजरीवाल को  मुख्यमंत्री पद जिन हालातों में  छोड़ना पड़ा उनमें त्याग जैसे किसी भाव की बात सोचना निरर्थक है। जमानत पर रिहा होने के बाद उन्होंने गैर भाजपा मुख्यमंत्रियों तक को ये समझाइश दे डाली कि यदि वे गिरफ्तार होते हैं तब त्यागपत्र न दें। उनका ये बयान ही काफी कुछ कह जाता है। सही बात ये है कि मुख्यमंत्री रहते हुए भी उससे जुड़े जरूरी कार्य नहीं कर पाने के कारण  संवैधानिक संकट बढ़ रहा था। उन्हें डर था कि ऐसे में विधानसभा भंग की जा सकती है और वैसा होने पर राजनीतिक समीकरण उलट - पुलट सकते सकते हैं। इसीलिए जेल से बाहर आते ही उन्होंने पद छोड़ने की घोषणा कर डाली और बिना देर किये आतिशी को उत्तराधिकारी बना दिया। उनका ये सोचना जल्दबाजी होगी  कि उनके त्यागपत्र देने  से हरियाणा विधानसभा के चुनाव में आम आदमी पार्टी पंजाब जैसा करिश्मा दिखाने में सफल हो जायेगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव में वे वोट कटवा की भूमिका निभा सकते हैं किंतु सत्ता की दौड़ में नहीं हैं। लेकिन कहीं कांग्रेस ने हरियाणा जीत लिया तब वह दिल्ली में आम आदमी पार्टी के वोटों में सेंध लगाने में जरूर सक्षम हो जाएगी।  आने वाले कुछ महीने देश की राजनीति में बड़ी उथलपुथल के रहेंगे जिनमें ये भी तय हो जाएगा कि आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय विकल्प बनने की कोई संभावना है या नहीं ? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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