लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी इन दिनों अमेरिका में हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद इस देश की उनकी यह पहली यात्रा है। लोकसभा चुनाव में 2014 और 2019 की अपेक्षा अधिक सफलता मिलने से उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा हुआ है। आक्रामक शैली में दिये जा रहे बयान इसका प्रमाण हैं। हालांकि वे जो कुछ भारत में बोलते हैं ज्यादातर वही बातें अमेरिका में उनके द्वारा कही जा रही हैं किंतु कुछ मुद्दों पर वे आपत्तिजनक बातें बोल गए जिन पर देश के भीतर विपरीत प्रतिक्रिया हो रही है। वॉशिंगटन के निकट वर्जीनिया में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए कांग्रेस नेता ने कहा कि लड़ाई इस बात की है कि क्या एक सिख को भारत में पगड़ी या कड़ा पहनने का अधिकार है या नहीं? या एक सिख के रूप में वह गुरुद्वारा जा सकते हैं या नहीं? लड़ाई इसी बात के लिए है और यह सिर्फ उनके लिए ही नहीं बल्कि सभी धर्मों के लिए है। इस बयान से ये आशय निकलता है मानों भारत में सिखों को पगड़ी और कड़ा पहिनने से रोका जा रहा हो। उनका यह बयान अमेरिका, कैनेडा और ब्रिटेन में कार्यरत खालिस्तान समर्थक संगठनों का हौसला बुलंद करने वाला है। इसके अलावा उन्होंने लोकसभा चुनाव पर भी प्रश्नचिन्ह लगाते हुए कहा कि यदि ईमानदारी से होते तो एनडीए को 246 सीटों से ज्यादा नहीं मिलतीं। उनका ये कहना भी अपरिपक्वता को दर्शाता है कि 2014 के बाद भारत ऐसे दौर में पहुँच गया है जहाँ लोकतंत्र की नींव पर हमला हो रहा है। लेकिन जो सबसे खतरनाक बात वे पूरे दौरे में दोहराते रहे वह है आरक्षण और जातिगत जनगणना पर उनकी वही टिप्पणियां जो वे देश में करते आये हैं। उन्होंने दलित, आदिवासी और पिछड़ों के प्रति निष्पक्ष न होने की बात करते हुए सरकारी और अन्य क्षेत्रों के साथ ही मीडिया में भी उनकी हिस्सेदारी का शिगूफा छोड़ दिया जो चौंकाने वाला है। उल्लेखनीय है कुछ दिनों पहले प्रयागराज में दिये अपने भाषण में उन्होंने दलित और आदिवासी समाज से किसी के मिस इंडिया न बनने जैसा बचकाना मुद्दा उठाया था। जहाँ तक जातिगत जनगणना का प्रश्न है तो उनका कहना है कि इसके जरिये जो आंकड़े मिलेंगे उनके आधार पर विभिन्न जातियों की हिस्सेदारी तय करने की नीति बनाई जावेगी। इसके लिए उन्होंने आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से अधिक करने की बात भी कही। लेकिन आज तक श्री गाँधी ये स्पष्ट नहीं कर सके कि जिन्हें वे 90 फीसदी बताते हैं उनके बीच हिस्सेदारी का बंटवारा कैसे होगा? जातिगत जनगणना में क्या मुसलमान भी आयेंगे जिनके बीच हिंदुओं से अधिक जातियाँ हैं । धर्म परिवर्तन कर ईसाई बने दलितों की क्या स्थिति रहेगी क्योंकि उस धर्म में तो जाति है ही नहीं। राहुल द्वारा मीडिया में हिस्सेदारी की जो चर्चा छेड़ी वह भी बेतुकी है क्योंकि आज तक चाहे पत्रकारिता हो या फिल्में और टीवी, उनमें कभी जाति का सवाल उठा ही नहीं। हिन्दी फिल्मों के तीन बड़े नायक मुस्लिम हैं। उनकी फ़िल्मों को मिलने वाली सफलता के पीछे हिन्दू दर्शक ज्यादा होते हैं। स्व. मो. रफी की जयंती पर मुस्लिम तो शायद ही कुछ करते हों किंतु हिन्दू आगे - आगे नजर आते हैं। टीवी धारावाहिकों के कलाकारों की जाति और धर्म कभी मुद्दा नहीं बना। महाभारत में अर्जुन की भूमिका मुस्लिम ने निभाई थी। इसी तरह पत्रकारिता के क्षेत्र में जातिगत प्रतिनिधित्व जैसी बात कभी सोचने में भी नहीं आई। दलित जातियों पर हुए अत्याचारों पर पत्रकार सदैव मुखर रहे। आरक्षण को लेकर श्री गाँधी द्वारा जो कुछ कहा जा रहा है उसके पीछे की राजनीति किसी से छिपी नहीं है। लेकिन वे भूल रहे हैं कि इस तरह के मुद्दों पर लंबे समय तक राजनीति नहीं की जा सकती वरना मायावती, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव अपने इर्द - गिर्द ऊँची जातियों के लोगों को न रखते। उल्लेखनीय है लोकसभा के लिए चुन जाने के बाद उ.प्र विधानसभा में अपने स्थान पर नेता प्रतिपक्ष बनाने के लिए अखिलेश ने एक ब्राह्मण विधायक को चुना। यदि श्री गाँधी इस पर आपत्ति करते तब लगता कि उनके मन में वंचित वर्ग के लिए हमदर्दी है। कुल मिलाकर ये लगता है वे बजाय दूरगामी सोच के तात्कालिक लाभ की नीति पर चल रहे हैं जो उनके और कांग्रेस के लिए तो खतरनाक है ही देर सवेर इंडिया गठबंधन के लिए भी मुसीबत पैदा करेगा। देश के जिन राज्यों में भी पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के नाम पर राजनीति होती है उनमें से ज्यादातर में कांग्रेस घुटनों के बल पर है। राहुल जिस रास्ते पर चल रहे हैं वह भटकाव भरा तो है ही, उसमें गड्ढे भी बहुत हैं। अमेरिका में जहाँ जाति और धर्म किसी को अवसर देने के आधार नहीं होते वहाँ इस तरह की बातें करने का कोई लाभ नहीं। भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए उन्होंने ये पूछने का दुस्साहस नहीं किया कि उनमें कितने दलित, आदिवासी या पिछड़े हैं क्योंकि उनको पता है कि विदेशों में कार्यरत भारतीय योग्यता के बल पर गए न कि आरक्षण के। बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी भारत में योग्य लोगों को ही रोजगार देती हैं। ये सब देखते हुए जातिगत जनगणना और आरक्षण जैसे मुद्दे विदेशों में उठाने से बचना चाहिए।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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