Friday, 6 September 2024

सिंगापुर जैसे विश्व व्यापार के अनेक केंद्र भारत में भी बन सकते हैं


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विकासमूलक सोच निश्चित  तौर पर प्रशंसनीय है। देश को  विश्वस्तरीय पहिचान दिलवाने के लिए वे निरंतर प्रयासरत रहते हैं। जब गुजरात में उन्होंने सरदार पटेल की मूर्ति जो संसार में सबसे ऊँची है  बनवाने की शुरुआत की तो  तरह - तरह के सवाल उठाये गए। उसकी लागत और निकटवर्ती क्षेत्रों को विकसित करने पर प्रस्तावित धनराशि को फिजूल खर्ची निरूपित किया गया। लेकिन कुछ ही वर्षों में वह पूरा खर्च वसूल हो गया । उस क्षेत्र की अर्थव्यस्था में भी जबरदस्त सुधार देखने मिला। वाराणसी में विश्वनाथ और उज्जैन में महाकाल परिसर के नवीनीकरण पर खर्च किये गए अरबों रूपयों की सार्थकता भी साबित हो चुकी है। बुलेट ट्रेन का प्रकल्प भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। ये सब विकसित और समृद्ध भारत के प्रमाण पत्र हैं। मुंबई में समुद्र पर बनाई गई लिंक रोड से भी लोगों का समय बचने लगा तथा जाम में भी कमी आई। राष्ट्रीय राजमार्गों के विकास के कारण सड़क यातायात में हुई वृद्धि बदलते भारत की तस्वीर पेश करती है। कहने का आशय यह है कि विकसित होने का अर्थ केवल विदेशी मुद्रा भंडार का भरा होना नहीं बल्कि विकास का दिखना भी है। उस दृष्टि से स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की दूरगामी सोच  की दाद देनी होगी जिन्होंने स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी विराट परियोजना के साथ ही पक्की ग्रामीण सड़कें बनवाने का भागीरथी प्रयास किया। 2014 में देश की सत्ता संभालने के  साथ ही श्री मोदी ने अटल जी से भी एक कदम आगे बढ़ाते हुए अनेक नये काम प्रारम्भ करवाये जिनमें शौचालय जैसे मामूली नजर आने वाले कार्यों को प्राथमिकता दी  गई वहीं दूसरी ओर हवाई अड्डे और बंदरगाह भी बनाये। देश को आत्मनिर्भर बनाने हेतु रक्षा उपकरणों का उत्पादन बढ़ाने के अभियान के कारण देश उनका निर्यात करने की क्षमता अर्जित कर सका। इसीलिए अपनी सिंगापुर यात्रा में उन्होंने भारत में भी कई सिंगापुर बनाने की चर्चा छेड़ दी। उल्लेखनीय है कि कभी मलेशिया का हिस्सा रहा सिंगापुर शहर अब एक स्वतन्त्र देश है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में उसकी गणना विकसित देशों के बराबर होती है। क्षेत्रफल की दृष्टि से बेहद छोटा सिंगापुर भारत जैसे विशाल देश को वित्तीय और तकनीकी सहायता देने की हैसियत रखता है। श्री मोदी ने अपनी इस यात्रा में उसके साथ सेमी कंडक्टर सम्बन्धी जो समझौता किया वह इसका प्रमाण है। सिंगापुर की तरह एक ज़माने में हाँगकाँग भी इसी तरह चर्चित हुआ करता था। जिसे ब्रिटेन ने चीन से लीज पर लेकर मुक्त अर्थव्यवस्था का केंद्र बनाया। हालांकि वह लीज खत्म हो गई और उस पर चीन का आधिपत्य दोबारा हो गया किंतु वह शहर आज भी विश्व व्यापार का प्रमुख केंद्र है। एक और उदाहरण दुबई का है जो बीते कुछ दशकों में ही निवेशकों का स्वर्ग बन गया। ऐसे में प्रधानमंत्री द्वारा भारत में कई सिंगापुर जैसी बात कहकर जो संकेत दिया वह देश को नया स्वरूप दे सकता है। कुछ समय पहले ही उन्होंने भारत के पास अनेकानेक द्वीप होने की बात कही थी। मालदीव से तनातनी के बाद जब उन्होंने भारतीय पर्यटकों को  लक्षद्वीप भ्रमण की सलाह दी तो  मालदीव के माथे पर पसीना आने लगा वहीं लक्षद्वीप में निवेश करने की होड़ लग गई। प्रधानमंत्री ने देश में कई सिंगापुर की संभावना किन स्थानों को सोचकर बताई ये तो स्पष्ट नहीं है किंतु वे बिना सोचे - समझे ऐसी बातें नहीं कहते , लिहाजा ये मानकर चला जा सकता है कि उनके मन में इसे लेकर कोई कार्ययोजना जरूर आकार ले चुकी होगी। हालांकि सिंगापुर एक दो बरस में नहीं बन सकता और फिर हमारे देश की भ्रष्ट नौकरशाही के चलते किसी भी काम में अड़ंगेबाजी होने लगती है। राजनीति भी आये दिन रुकावटें पैदा करने से नहीं चूकती। लेकिन इस सबकी उपेक्षा करते हुए इस तरह की सोच को कार्य रूप में परिणित करना वैश्विक प्रतिस्पर्धा में खड़े रहने के लिए जरूरी है। श्री मोदी से उम्मीद है वे भारत में सिंगापुर की तर्ज पर कुछ क्षेत्रों को विश्व व्यापार का केंद्र बनाने के अभियान की शुरुआत जल्द करेंगे। ऐसे कार्यों में संसाधनों की कोई कमी नहीं पड़ती क्योंकि दुनिया भर से निवेशक वहाँ दौड़े - दौड़े चले आते हैं। दुबई इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। गौरतलब है वहाँ भारत के हजारों लोगों ने भी संपत्ति और अन्य कार्यों में अरबों रुपये लगा रखे हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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