कराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी अपने बयानों के लिए चर्चित रहते हैं। राम मंदिर सहित अनेक मुद्दों पर वे मोदी सरकार की कड़ी आलोचना कर चुके हैं। हालांकि अपने को प्रधानमंत्री का शुभचिंतक बताते हुए दावा करते हैं कि वे जो आलोचना करते हैं वह उनके भले के लिए होती है। गत दिवस उन्होंने मांग की कि हिंदुओं के धर्मस्थलों का प्रबंधन धर्मगुरुओं को सौंपा जाना चाहिए। अन्य शंकराचार्यों से मिलकर इस बारे में कानूनी कारवाई के संकेत भी उन्होंने दिये। तिरुपति देवस्थानम के लड्डुओं में पशु चर्बी युक्त घी का उपयोग होने के खुलासे पर अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए शंकराचार्य जी ने कहा कि अब बद्रीनाथ मंदिर में भी सीधी भरती किये जाने से इस तरह की गड़बड़ियों की आशंका बढ़ रही है। आज़ादी के 77 वर्ष बाद भी हिंदुओं के प्रमुख धर्मस्थलों का प्रशासनिक नियंत्रण सरकारी नौकरशाहों के हाथ में होने पर उन्होंने रोष जताया। हिन्दू हितों के संरक्षण में शंकराचायों की भूमिका आलोचनाओं के घेरे में रहती है। सोशल मीडिया पर आने वाली प्रतिक्रियाएं इसका प्रमाण हैं। बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए अत्याचारों के विरुद्ध उनकी उदासीनता तीखी आलोचनाओं का शिकार हुई। हिंदुओं में इस बात पर काफी गुस्सा है कि फिलिस्तीन में रहने वाले मुसलमानों के पक्ष में तो मुस्लिम धर्मगुरुओं के बयान खुलकर आते हैं। असदुद्दीन ओवैसी नामक सांसद ने तो लोकसभा में सदस्यता की शपथ लेते समय फिलिस्तीन समर्थक नारा लगा दिया। हाल ही में मुस्लिम त्योहारों पर निकले जुलूसों में भी फिलिस्तीन के प्रति हमदर्दी जताते बैनर - पोस्टर देखे गए। उसकी तुलना में हमारे शंकराचार्य हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों के बारे में उतने मुखर नहीं हैं , यह अवधारणा दिन ब दिन मजबूत होती जा रही है। ये भी सुनने में आता है कि बड़े - बड़े धर्मगुरु और कथावाचक आम हिंदू से कटते जा रहे हैं और धन तथा ग्लैमर के प्रति उनका झुकाव बढ़ता देखा जा सकता है। कुछ समय पूर्व देश के एक प्रसिद्ध उद्योगपति के पुत्र के विवाह में दो शंकराचार्यों सहित आध्यात्मिक जगत की ज्यादातर बड़ी हस्तियां मौजूद थीं। एक कथाकार तो आस्ट्रेलिया में प्रवचन के बीच से आये क्योंकि मेजबान ने उन्हें लाने के लिए विशेष विमान भेजा। हालांकि उक्त विवाह में राजनीति, उद्योग, मनोरंजन, और खेल जगत के हजारों नामी - गिरामी लोग शरीक हुए किन्तु शंकराचार्य सदृश विभूतियों की उपस्थिति पर समाज में आम प्रतिक्रिया अच्छी नहीं रही। इसका कारण ये माना जा सकता है कि वे साधारण जन के लिए सहज उपलब्ध नहीं हैं। कथावाचक और प्रवचनकर्ता तो फिल्मी सितारों की तरह महंगे हो गए हैं। वे श्रृद्धालुओं को तो त्याग और सादगी का उपदेश देते हैं किंतु खुद के लिए पाँच सितारा सुविधाएं और मोटी राशि मांगते हैं। धर्म के नाम पर इसी व्यापार के कारण धर्मगुरुओं के प्रति सम्मान में कमी आई है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी ने हिंदुओं के प्रमुख धर्मस्थलों का प्रबंध धर्मगुरुओं को सौंपने का जो मुद्दा छेड़ा वह सामयिक और आवश्यक है। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर आजादी के बाद केवल हिंदुओं के धर्मिक और निजी मामलों में सरकारी दखल बढ़ा। देश में मुस्लिम, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध और पारसी समुदाय के जितने भी धार्मिक स्थल हैं उनमें से कितनों का प्रशासनिक नियंत्रण शासन के हाथों में है ये शोध का विषय है । जबकि सनातन से जुड़े मामलों में स्थिति पूरी तरह से उलटी है। हालांकि इसके लिए कुछ हद तक हिंदुओं के धर्मगुरुओं को भी कठघरे में खड़ा किया जा सकता है जो अपनी श्रेष्ठता के अहंकार में अपने समकक्ष को तुच्छ समझते हैं। दशकों पहले दक्षिण के एक शंकराचार्य को तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने निजी खुन्नस के चलते जेल में डाल दिया। अन्य किसी धर्म की दिग्गज हस्ती के साथ वह हुआ होता तो देश भर में बवाल हो जाता। लेकिन शेष शंकराचार्य गण केवल निंदा करते रहे। एकता के इसी अभाव के कारण सनातन धर्म के प्रति ज्यादातर राजनीतिक जमात अपेक्षा भाव रखती है। यदि किसी मुद्दे पर सभी प्रमुख धर्माचार्य एक साथ आवाज बुलंद करें तो सत्ता में बैठे लोगों को सोचने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। उनसे किसी राजनीतिक दल के समर्थन अथवा विरोध की अपेक्षा भले न की जाए किंतु वक्फ बोर्ड संशोधन के विरोध में मुस्लिम मुल्ला - मौलवी जिस तरह खुलकर मैदान में उतरे उसकी तुलना में शंकराचार्य सहित अनगिनत महामंडलेश्वरों ने क्या किया, ये बड़ा सवाल है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
No comments:
Post a Comment