याणा के विधानसभा चुनाव में इन दिनों आयाराम - गयाराम का दौर जमकर चल रहा है। जिनकी टिकिट कटती है वे दूसरी पार्टी में मत्था टेकने पहुँच जाते हैं। भाजपा सांसद नवीन जिंदल की माँ सावित्री जिंदल को पार्टी ने टिकिट नहीं दी तो वे निर्दलीय लड़ने पर आमादा हैं। कुछ मंत्री और विधायक भी पत्ता कट जाने पर बगावत का झंडा उठाये घूम रहे हैं। भाजपा में इस बात से ज्यादा नाराजगी है कि बाहर से आये लोगों को उम्मीदवार बनाकर पार्टी के लिए बरसों से खून पसीना बहा रहे लोगों को दरकिनार कर दिया गया। दूसरी तरफ कांग्रेस में भी बड़े नेताओं के बीच खींचातानी खुलकर सामने आ गई है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा और उनके सांसद बेटे दीपेंदर पार्टी के चुनाव अभियान पर पूरी तरह हावी हैं किंतु दलित समुदाय की सांसद शैलजा उनके विरुद्ध लामबंदी करते हुए विधानसभा चुनाव लड़ना चाह रही हैं। तीसरा मोर्चा है रणदीप सुरजेवाला का जिन्होंने मुख्यमंत्री बनने की इच्छा खुलकर व्यक्त कर दी। हालांकि लोकसभा चुनाव के बाद से हीआम आदमी पार्टी ने कांग्रेस से गठबंधन तोड़ने का ऐलान कर दिया था किंतु कांग्रेस नेता राहुल गाँधी उसके साथ गठजोड़ के लिए लालायित हैं। इसे लेकर उनके श्री हुड्डा सहित राज्य के अन्य कांग्रेस नेताओं के साथ मतभेद भी उजागर हुए । श्री हुड्डा ने दबी जुबान आम आदमी पार्टी के साथ हाथ मिलाने का विरोध किया किंतु श्री सुरजेवाला ने खुलकर गठबंधन की मुखालफत कर डाली। लोकसभा चुनाव के बाद श्री गाँधी की वजनदारी जिस प्रकार बढ़ी उसे देखते हुए उनकी बात को सिरे से नामंजूर कर देना चौंकाने वाला है। कांग्रेस के भीतर चल रही इस खींचातानी के बीच गत दिवस आम आदमी पार्टी ने अपने 50 उम्मीदवारों की सूची जारी कर राहुल की उम्मीदों पर पानी फेर दिया जो भाजपा विरोधी मतों के विभाजन को रोकने के लिए उससे हाथ मिलाना चाह रहे थे। इस प्रकार हरियाणा में बहुकोणीय संघर्ष की स्थिति बन गई है। पूर्व उप प्रधानमंत्री स्व. देवीलाल का कुनबा भी कई टुकड़ों में बँट गया है। पिछली सरकार में उपमुख्यमंत्री रहे दुष्यंत चौटाला की पार्टी ने उ.प्र के दलित सांसद चंद्रशेखर आजाद की पार्टी के साथ गठबंधन कर जाट- दलित समीकरण बिठाने का दांव चला है। किसान आंदोलन के अलावा जाट मुख्यमंत्री नहीं बनाये जाने से जाट समुदाय भाजपा से नाराज बताया जा रहा है। लोकसभा चुनाव में इसीलिए उसकी सीटें आधी रह गईं। अतः शुरू से ये माना जा रहा था कि इस बार कांग्रेस यहाँ सरकार बना ले जायेगी। टिकिट वितरण से भाजपा में जिस प्रकार से असंतोष उजागर हुआ उससे कांग्रेस का उत्साह और बढ़ गया। लेकिन बीते कुछ दिनों में आये श्री हुड्डा, सुश्री शैलजा और श्री सुरजेवाला के बयानों ने पार्टी की छवि धूमिल की है। गलती श्री गाँधी की भी मामूली नहीं कही जायेगी जिन्होंने ऐन वक्त पर आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन का शिगूफा छोड़ दिया जबकि ये काम काफी पहले हो जाना चाहिए था। हरियाणा में जाटों की जनसंख्या 25 फीसदी मानी जाती है। यदि ये एकजुट होकर किसी का समर्थन कर दें तो उसकी सरकार बनना तय हो जाता है किंतु वर्तमान में जाटों का कोई सर्वमान्य नेता नहीं है। देवीलाल का कुटुंब बिखरा हुआ है, बंशीलाल की बहू भाजपा में आकर राज्यसभा पहुँच गई। समय के साथ स्थानीय स्तर पर भी युवा जाट नेताओं का उभार देखने मिल रहा है। इस प्रकार सबसे बड़े मतदाता समूह में ही सबसे अधिक बिखराव है। यद्यपि श्री हुड्डा जाटों के सबसे बड़े नेता माने जाते हैं किंतु उनकी अपनी पार्टी में ही उनकी चौधराहट को चुनौती मिल रही है। चर्चा तो ये भी है कि उनकी जरूरत से ज्यादा दखलंदाजी श्री गाँधी को भी नागवार गुजर रही है। यही महसूस कर शैलजा और रणदीप ने अपनी महत्वाकांक्षा जाहिर कर दी। हालांकि अभी ये कहना जल्दबाजी होगी कि इसका लाभ भाजपा उठाने में सफल हो जायेगी क्योंकि आम आदमी पार्टी यदि पूरी ताकत से लड़ गई तब वह दोनों राष्ट्रीय पार्टियों का खेल बिगाड़ सकती है। उसके सबसे बड़े नेता अरविंद केजरीवाल मूल रूप से हरियाणा के ही हैं। कुल मिलाकर जो चुनाव इकतरफा नजर आ रहा था वह अनिश्चित होता जा रहा है। कांग्रेस को अभी भी अपने आसार अच्छे नजर आ रहे हैं किंतु भाजपा अपने संगठन के बल पर ब्राह्मण, वैश्य और पिछड़ी जातियों के समर्थन से तिकड़ी बनाने की सोच रही है। बहुकोणीय मुकाबले में त्रिशंकु की स्थिति से भी इंकार नहीं किया जा सकता। हालांकि यदि कांग्रेस जाटों को एकमुश्त अपने पक्ष में रख सकी तभी उसकी राह आसान होगी।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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