दो दिनों से पेट्रोल - डीजल सस्ता किये जाने की खबरें आ रही हैं। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में आई गिरावट के चलते बीते कुछ महीनों में भारत की तेल कंपनियों ने भरपूर मुनाफा कमाया। कहने को तो पेट्रोल - डीजल की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया है किंतु ये केवल दिखावे के लिए है। केंद्र और राज्य सरकारों ने अपना पूरा नियंत्रण उन पर बना रखा है। इसीलिए दुनिया भर में कीमतें कम होने के बावजूद भारत में पेट्रोल - डीजल महंगा बेचा जा रहा है। ज्यादातर तेल कंपनियां सरकार का उपक्रम होने से उन पर पूरा नियंत्रण उसी का है। बीते सालों में एक या दो मर्तबा दाम घटाए भी गए तो बेहद कम। हालाँकि काफी समय से उनमें स्थिरता का बना रहना ही सरकारी मेहरबानी रही। दो वर्ष पहले तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दीपावली के पहले कीमतें घटने का ऐलान कर जनता को उपहार देने की बात कही। कोरोना की विभीषिका से उबरकर दुनिया यूक्रेन संकट में फंस गई। ऐसी स्थिति में आम तौर पर कच्चा तेल महंगा हो जाता है। लेकिन रूस से हुए सौदे के तहत भारत को सस्ते दामों पर कच्चा तेल मिलने से हम बड़े घाटे से बचे रहे। यही वजह है कि भारत की तेल कंपनियां भारी मुनाफा कमाने में सफल रहीं। जो खबरें अधिकृत तौर पर प्रसारित हुईं उनके अनुसार आज की स्थिति में उनको प्रति लीटर पर 15 रु. का मुनाफा है। ऐसे में यदि पिछली बार की तरह मात्र 2 से 3 रु. प्रति लीटर कीमतें घटाई जाती हैं तो इसे ऊँट के मुँह में जीरा कहा जाएगा। युद्द या किसी अन्य आपातकालीन स्थिति में जनता से अपेक्षा होती है सरकार का साथ दे किंतु आये दिन ये दावा किया जाता है कि अर्थव्यवस्था बेहद सुखद स्थिति में है और मेक इन इंडिया की 10 वर्षीय मुहिम के कारण देश निर्यात के क्षेत्र में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है । भारत में बने रक्षा उपकरणों की दुनिया भर में भारी मांग होने से व्यापार संतुलन की स्थिति सुधरी है। कूटनीतिक मंचों पर भारत को विश्व की महाशक्तियों के बराबर बिठाया जाता है। सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए हमारे दावे का समर्थन वे देश भी करने लगे हैं जो अब तक भारत को हेय दृष्टि से देखा करते थे। देश में वैकल्पिक ईंधन का उपयोग बढ़ने से पेट्रोल डीजल की खपत कम करने का प्रयास भी रंग ला रहा है। जीएसटी और टोल टेक्स से होने वाली कमाई उम्मीद से ज्यादा होने लगी है। आयकर संग्रह भी लक्ष्य से अधिक होना शुभ संकेत है। ये देखते हुए सबसे अच्छा तो यही होगा कि जीएसटी काउंसिल की आगामी बैठक में पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी में शामिल किया जावे। हालाँकि इसके लिए राज्यों की असहमति का बहाना बना दिया जाता है। लेकिन यदि किसी विशेष परिस्थितिवश ऐसा करना संभव न हो तब भी केंद्र सरकार पेट्रोल डीजल के दामों में कम से कम 10 रु. प्रति लीटर की कमी करे। इसके साथ ही रसोई गैस सिलेंडर के दाम भी 150 से 200 रु. कम किये जाएं, तभी इसे सही मायनों में दीपावली उपहार माना जाएगा। यदि इसमें भी सरकार के वित्तीय सलाहकार टांग फंसाएं तो फिर ईमानदारी इसी में है कि पेट्रोलियम उत्पादों को बाजार के उतार - चढ़ाव पर छोड़ दिया जावे। काफी समय तक पेट्रोल - डीजल की कीमतों में ये प्रयोग चलता रहा जिसके कारण दैनिक स्तर पर कीमतें घटती - बढ़ती रहीं और जनता भी उसे सहज भाव से लेने लगी थी किंतु निजी क्षेत्र को आर्थिक सुधारों को अपनाने की नसीहत देने वाला सरकारी तंत्र पेट्रोल - डीजल के दामों को अपनी मुट्ठी में कैद करने पर आमादा है। मोदी सरकार से मंहगाई को लेकर उसके प्रतिबद्ध समर्थक भी नाराज हैं। जिसमें पेट्रोल - डीजल की कीमतें बड़ा कारण है। ऐसे में जब दक्षिण एशिया के छोटे - छोटे देशों में इन चीजों के दाम भारत की तुलना में बेहद कम हैं तब हमारे यहाँ उनका 100 रु. प्रति लीटर से ज्यादा होना मुनाफाखोरी नहीं तो और क्या है? दाम घटाने की जो खबरें उड़ रही हैं उनके पीछे कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव भी हैं। खास तौर पर महाराष्ट्र को लेकर भाजपा काफी चिंतित है। ऐसे में यदि दाम घटाना ही है तो कम से कम उतने तो हों जिनसे लोग राहत का अनुभव करें।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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