जीएसटी काउंसिल की गत दिवस हुई बैठक के पहले ये उम्मीद जताई जा रही थी कि उसमें जीवन और स्वास्थ्य बीमा पर लगने वाले जीएसटी को खत्म कर दिया जाएगा। इसका कारण न तो केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के मन में उत्पन्न करुणा थी और न ही गैर भाजपा शासित राज्यों के वित्त मंत्रियों की ओर से आया दबाव। दरअसल ये उम्मीद जगाई केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी द्वारा श्रीमती सीतारमण को लिखे उस पत्र ने जिसमें उन्होंने जीवन और स्वास्थ्य बीमा पर लगने वाले जीएसटी को हटाये जाने का अनुरोध किया था। चूंकि उन्होंने उस पत्र को सार्वजनिक कर दिया इसलिए पूरे देश में वह चर्चा का विषय बन गया। और कोई मंत्री होता तब शायद श्रीमती सीतारमण उसके पत्र को नजरंदाज भी कर देतीं किंतु चूंकि श्री गडकरी न केवल वरिष्ट अपितु बेहद लोकप्रिय मंत्री हैं लिहाजा उनके सुझाव पर जीएसटी काउंसिल में चर्चा हुई। उस सुझाव का विरोध करने का साहस किसी भी राज्य के वित्त मंत्री में नहीं था क्योंकि वैसा करने पर उसकी छवि जनता की निगाह में खलनायक की बन जाती । बैठक के पहले से ही समाचार माध्यमों में श्री गडकरी के सुझाव को माने जाने सम्बन्धी खबरें भी आने लगीं जिसकी सुखद प्रतिक्रिया भी हुई। लेकिन बैठक खत्म होने के बाद जब उसका विवरण आया तो ये जानकर सारा उत्साह ठंडा हो गया कि सभी सदस्य जीवन एवं स्वास्थ्य बीमा पर जीएसटी घटाने तो सहमत हो गए किंतु वह कितना कम हो इसका निर्णय अगली बैठक में होगा जो संभवतः नवम्बर में होगी। वित्तीय मामलों में जल्दबाजी से कोई फैसला लेना आसान नहीं होता क्योंकि उसके दूरगामी परिणाम होते हैं। जीएसटी केंद्र और राज्य सरकारों की आय का बड़ा या यूँ कहें कि मुख्य स्रोत है। ऐसे में उससे होने वाली आवक को कोई सरकार नहीं खोना चाहती। लेकिन लोककल्याणकारी शासन व्यवस्था में सरकार का लक्ष्य केवल धनोपार्जन न होकर जनहित होता है। जीएसटी जब लागू हुआ था तब यह आश्वासन दिया गया था कि पूरे देश में करों की दर एक समान होगी। साथ ही ये भी कहा गया कि दरों के स्तर कम होंगे। वैसे आदर्श व्यवस्था तो यह होती कि विलासिता की वस्तुओं को छोड़कर बाकी वस्तुओं और सेवाओं पर जीएसटी की एक ही दर 8 या अधिकतम 12 प्रतिशत रहती किंतु ऐसा न करते हुए उसमें प्रयोग होते रहे। सालों बीत जाने के बाद भी आज तक उसकी व्यवस्था में स्थायित्व नहीं आया जिसके चलते आये दिन कोई न कोई नया आदेश आता रहता है। पेट्रोल और डीजल को जीएसटी से मुक्त रखने की मांग लगातार होने के बावजूद जीएसटी काउंसिल का एक भी सदस्य इस पर सहमत नहीं है जिससे ये लगता है कि जनता का तेल निकालने में सभी पार्टियों के बीच संगामित्ती है। भाजपा विरोधी जो पार्टियां पेट्रोल - डीजल के दाम ज्यादा होने पर केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करती हैं उनके द्वारा शासित राज्यों ने भी जीएसटी काउंसिल में कभी इस मुद्दे को नहीं उठाया । गत दिवस हुई बैठक में यदि केन्द्रीय वित्त मंत्री जीवन और स्वास्थ्य बीमा पर जीएसटी खत्म करने या कम करने का पूरा प्रस्ताव बनाकर लातीं तब शायद उसके स्वीकृत होने में कोई अड़चन नहीं आती किंतु लगता है श्री गडकरी के पत्र के कारण बैठक में वह विषय उठाकर रस्म अदायगी कर ली गई और फैसले को नवम्बर तक टरका दिया गया। ये भी हो सकता है श्री गडकरी को इसका श्रेय न मिले इसलिए ऐसा किया गया। यूँ तो कल की बैठक में अनेक चीजों और सेवाओं पर जीएसटी की दरें कम या ज्यादा की गईं जिनमें कैंसर की दवाओं पर 12 से घटाकर 5 प्रतिशत जीएसटी लगाने का निर्णय भी है। लेकिन सही मायनों में तो कैंसर सदृश बीमारी के उपचार से जुड़ी किसी भी चीज पर जीएसटी लगना ही नहीं चाहिए । हो सकता है ऐसा न करने के पीछे कोई बड़ी मजबूरी हो किंतु शिक्षा और चिकित्सा से जुड़ी चीजों और सेवाओं पर कम से कम कर होना अपेक्षित है। यदि जीएसटी काउंसिल के सदस्यों के मन में जरा भी मानवीयता है तो उन्हें विशेष बैठक बुलाकर जीवन और चिकित्सा बीमा को जीएसटी मुक्त कर देना चाहिए क्योंकि ये आम आदमी को सीधे प्रभावित करते हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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