मालदीव में नई सरकार बनने के बाद उसने भारत से पंगा लेना शुरू कर दिया। राष्ट्रपति मुइज्जू ने चुनाव प्रचार में ही कह दिया था कि जो भारतीय सैनिक वहाँ थे उनको वापस जाना होगा। भारतीय हैलीकाप्टरों के संचालन के लिए जो सैनिक टुकड़ी थी वह उनको बर्दाश्त नहीं थी। उनकी सरकार ने भारतीय हितों के विरुद्ध खुलकर बोलना शुरू कर दिया। इसका कारण मुइज्जू का चीन समर्थक होना था। इस छोटे से टापू नुमा देश का इस तरह से आँखे तरेरना चौंकाने वाला था। हालांकि वह भारत का कुछ बिगाड़ सकने में सक्षम नहीं है किंतु पहले श्रीलंका और फिर मालदीव के चीन के प्रभावक्षेत्र में आ जाने से मोदी सरकार की विदेश नीति पर सवालिया निशान लगने लगे , क्योंकि जो देश महाशक्ति बनने की राह पर हो उसके छोटे - छोटे पड़ोसी देश भी उसके प्रभाव में न हों ये बात कुछ जमती नहीं। पाकिस्तान, नेपाल और म्यांमार से भी हमारे रिश्ते सामान्य नहीं हैं। श्रीलंका में चीन ने अनेक बड़े प्रकल्पों का निर्माण कर 90 साल तक उनके उपयोग का अनुबंध कर लिया। हालांकि जब श्रीलंका में कंगाली के हालात बने तब भारत ने उसकी हर संभव सहायता करते हुए संबंधों को पुनः मजबूत किया। उसके बाद मालदीव भी चीन की शह पर ऐंठने लगा। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लक्षद्वीप के समुद्रतट पर बैठकर उसके सौंदर्य की प्रशंसा कर मालदीव की रीढ़ पर जबरदस्त प्रहार किया। उनकी सांकेतिक कूटनीति रंग लाई। भारत से सैलानियों ने वहाँ जाना रद्द कर दिया। इससे मालदीव के पर्यटन व्यवसाय पर बुरा असर पड़ने लगा। मुइज्जू सरकार तो अपराधबोध के कारण कुछ बोलने में हिचकी किंतु वहाँ पर्यटन उद्योग से जुड़े लोग दौड़े - दौडे़ भारत की पर्यटन एजेंसियों के पास आकर गिड़गिड़ाने लगे। उधर केंद्र सरकार के इशारे पर लक्षद्वीप में निवेश करने वाले उमड़ पड़े। थोड़े दिनों में ही मालदीव की अकड़ कम होने लगी। पहले तो मुइज्जू ने भारत से अच्छे रिश्तों का बखान करना शुरू किया और फिर मौका मिलते ही दिल्ली आकर भारतीय नेताओं की मिजाजपुर्सी में लगे रहे। श्रीलंका भी काफी कुछ रास्ते पर लौट आया है । नेपाल अपनी राजनीतिक अनिश्चितता में फंसा होने से फिलहाल ठण्डा है। वहीं म्यांमार के साथ झगड़ा केवल अवैध घुसपैठ को लेकर है। रही बात पाकिस्तान की तो वह अपने घरेलू मामलों में इतना उलझ गया है कि भारत से सीधे लड़ने की स्थिति उसकी है नहीं। चीन भी समझ गया है कि सैनिक मोर्चे पर भारत को दबाना असंभव होगा। बच रहा बांग्ला देश जिससे विगत 15 सालों में भारत के रिश्ते हर स्तर पर सबसे अच्छे दौर में थे। लेकिन अचानक हालात उलट पुलट हो गए। शेख हसीना को सत्ता छोड़ भागकर भारत आना पड़ा। उनके स्थान पर जो अंतरिम सरकार बनी उसमें बैठे लोग ऐलानिया भारत विरोधी हैं। वहाँ रह रहे हिंदुओं को जिस प्रकार से हमलों और लूटपाट का शिकार होना पड़ा उसके कारण भारत के सामने दोहरा संकट उपस्थित हो गया। सीमा पार से शरणार्थियों के आगमन को रोकने के अलावा वहाँ रहने वाले हिंदुओं की सुरक्षा की चिंता करना भी जरूरी है। शेख हसीना को शरण देने के बारे में भी अब तक सरकार कुछ तय नहीं कर सकी। बांग्ला देश उनको दिल्ली में पनाह दिये जाने से नाराज है । ऐसे में कूटनीतिक, आर्थिक और मानवीय तीन मोर्चों पर भारत को निपटना पड़ रहा है। चूंकि बांग्ला देश में हालात सामान्य होने के संकेत मिलने लगे हैं और वैश्विक दबाव के कारण हिंदुओं पर हमले भी कम होने लगे हैं इसलिए अब जरूरी है ढाका में बैठे नये हुक्मरानों से दो टूक पूछा जावे कि उनको भारत से रिश्ते रखने हैं या नहीं और रखने हैं तो कैसे ? क्योंकि वहाँ हुआ सत्ता पलट चीन की बजाय अमेरिका के इशारे पर हुआ है। भारत को वहाँ की अंतरिम सरकार को समझाना होगा कि यदि हम चीन के दबाव में नहीं आते और अमेरिका की नाराजगी के बाद भी यूक्रेन युद्ध में रूस का विरोध करने से बचे तब बांग्ला देश से डरने का सवाल ही नहीं उठता। श्रीलंका और मालदीव के बारे में भारतीय कूटनीति असरकारी साबित हुई है। आर्थिक नाकाबंदी ने नेपाल की अक्ल भी ठिकाने लगा दी। पाकिस्तान इस बात के लिए परेशान है कि भारत के साथ बातचीत शुरू हो। हालांकि बांग्ला देश के सुर भी कुछ नरम हुए हैं लेकिन वहाँ के कुछ नेता ज़हर बुझे तीर छोड़ने से बाज नहीं आते। ऐसे में कुछ न कुछ ऐसा किया जाना जरूरी है जिससे अंतरिम सरकार को ये चेतावनी मिले कि भारत से रिश्ते बिगाड़ने पर उनका हर मोर्चे पर नुकसान होना तय है। हालांकि किसी देश के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप उचित नहीं होता किंतु इस देश का तो जन्म ही भारत के खुले हस्तक्षेप से हुआ था। आज फिर यदि वहाँ की स्थिति हमारे हितों के विरुद्ध हो तो इतिहास द्वारा अपने आप को दोहराए जाने की कहावत को चरितार्थ करने में संकोच नहीं करना चाहिए।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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