केरल में संपन्न राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की समन्वय बैठक में जातिगत जनगणना और आरक्षण में क्रीमी लेयर जैसे ज्वलंत मुद्दों पर जो दृष्टिकोण सामने आया है उसने कांग्रेस के उस आरोप की जमीन, खिसका दी कि संघ आरक्षण के विरोध में है। जाति आधारित जनगणना के बारे में उसका यह कहना पूरी तरह सही है कि सरकार को सामाजिक कल्याण के लिए इस तरह के आंकड़ों की आवश्यकता होती है जिनका उपयोग राजनीति अथवा चुनाव जीतने के लिए नहीं होना चाहिए। क्रीमी लेयर को आरक्षण के लाभ से वंचित करने के बारे में भी संघ ने स्पष्ट किया कि इस बारे में संबंधित जातियों को विश्वास में लेकर ही निर्णय लेना उचित रहेगा। उल्लेखनीय है श्री गाँधी रोजाना जाति आधारित जनगणना के साथ ही जाति की संख्यानुसार हिस्सेदारी तय करने का राग अलापते हैं। यहाँ तक कि बजट बनाने वाली टीम में दलित और आदिवासी अधिकारी न होने पर भी उन्होंने लोकसभा में सवाल उठाया था। हाल ही में श्री गाँधी प्रयागराज में ये कहने के बाद हंसी का पात्र बन गए कि आज तक मिस इंडिया प्रतियोगिता में आरक्षित वर्ग की कोई लड़की विजेता नहीं बनी। हालांकि कांग्रेस की कर्नाटक सरकार उसके द्वारा करवाई गई जाति आधारित जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक करने का साहस नहीं जुटा पा रही क्योंकि जैसे ही उसका विवरण सामने आयेगा वैसे ही लिंगायत और वोक्कालिंगा जैसे ताकतवर समुदाय सरकार के लिए खतरा बन जायेंगे। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी जातिगत जनगणना करवाई थी । उसके आंकड़े भी जारी कर दिये गए जिससे पता चला कि ओबीसी वर्ग में यादवों की सबसे बड़ी संख्या है। इस रिपोर्ट के आने के बाद लालू प्रसाद यादव और उनका परिवार फूला नहीं समा रहा था किंतु जल्द ही गोप, गड़रिया, अहीर उपजातियों ने उनको यादवों से अलग दर्जा देने की माँग उछाल दी क्योंकि ओबीसी आरक्षण का बड़ा लाभ यादव उठा लेते हैं। लोकसभा चुनाव में लालू की पार्टी को बिहार में कम सफलता मिलने के पीछे जातिगत जनगणना के आंकड़ों से विभिन्न उपजातियों में उत्पन्न गुस्सा ही था। इसीलिए राहुल गाँधी के लगातार बोलते रहने के बावजूद कर्नाटक की कांग्रेस सरकार जातिगत जनगणना के आंकड़ों पर कुंडली मारकर बैठी हुई है। इंडिया गठबंधन की प्रमुख स्तंभ ममता बैनर्जी ने भी राष्ट्रीय स्तर पर जाति आधारित जनगणना की मांग को सिरे से नकार दिया। उनकी सरकार द्वारा नियम विरुद्ध जो ओबीसी आरक्षण किया गया वह भी कानूनी मकड़जाल में फंसा हुआ है। कांग्रेस 2018 से पाँच वर्ष तक छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सत्ता में रही। फिलहाल कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में उसकी सरकार है किंतु उनकी ओर से इस दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया गया क्योंकि उससे होने वाले राजनीतिक नुकसान का अंदेशा उनको है। राहुल भी इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं। लेकिन सही बात ये है कि जिस जातिवादी राजनीति के लिए कांग्रेस दूसरों को कठघरे में खड़ा करती रही वे उसे उसी राह पर घसीट रहे हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि 1990 में भाजपा द्वारा समर्थन वापस लेने पर मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव की राज्य सरकारों को गिरने से बचाने की जो गलती स्व. राजीव गाँधी द्वारा की गई थी उसका खामियाजा कांग्रेस आज तक भुगत रही है। भाजपा खुद भी लम्बे समय से सोशल इंजीनियरिंग रूपी दांव खेलने लगी है लेकिन वह दिखावे से बचते हुए समरसता बनाये रखने का प्रयास करती रही जिसमें संघ का पूरा समर्थन मिला। लोकसभा चुनाव के परिणामों से उत्साहित श्री गाँधी जाति आधारित जनगणना को राम बाण औषधि मान रहे हैं। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा क्रीमी लेयर को आरक्षण के लाभ से वंचित करने संबंधी टिप्पणी किये जाने से केंद्र सरकार और भाजपा दोनों असमंजस में थीं। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान संघ प्रमुख डाॅ. मोहन भागवत द्वारा आरक्षण की समीक्षा किये जाने संबंधी सुझाव को भाजपा विरोधी पार्टियों ने जमकर भुनाया था। इसी तरह 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष द्वारा आरक्षण खत्म करने के प्रचार से उ.प्र में भाजपा को जबरदस्त नुकसान पहुंचा। लेकिन केरल से रा.स्व.संघ द्वारा दिये गए संदेश के बाद अब राष्ट्रीय विमर्श इस बात पर केंद्रित हो जाएगा आरक्षण, क्रीमी लेयर और जाति आधारित जनगणना चुनाव के मुद्दे हैं या सामाजिक कल्याण के जरिये। जिस तरह हिंदुत्व के चुनावीकरण पर विपक्ष उंगली उठाता रहा है उसी तरह श्री गाँधी सहित जाति की सियासत करने वाले नेता संघ के निर्णय के बाद पिछले कदम पर आने बाध्य होंगे क्योंकि संघ किसी मुद्दे पर केवल प्रस्ताव पारित नहीं करता अपितु उसे घर - घर तक पहुंचाने के लिए भी हर संभव प्रयास करता है।
-रवीन्द्र वाजपेयी
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