गत दिवस केंद्रीय मंत्री परिषद ने एक देश एक चुनाव के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। इसे संसद के शीतकालीन सत्र में पेश किये जाने की संभावना है। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में गठित समिति द्वारा विभिन्न दलों से राय लेने के उपरांत देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ करवाने के साथ ही उसके 100 दिनों के भीतर स्थानीय निकायों और पंचायत चुनाव कराने की अनुशंसा की थी। 32 दल इसके समर्थन में हैं वहीं 15 को ये मंजूर नहीं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के अनुसार ऐसा करना संविधान और संघवाद के विरुद्ध होगा । उल्लेखनीय है कि उक्त फैसले को अमल में लाने के लिए संविधान संशोधन करना होगा जो सत्ताधारी गठबंधन के लिए आसान नहीं है। ऐसे में संभव है संसद में विधेयक पेश करने के बाद उसे वक़्फ़ बोर्ड संशोधन की तरह से ही जेपीसी बनाकर उसके विचारार्थ भेज दिया जाए। लेकिन यह प्रस्ताव राष्ट्रीय विमर्श का विषय अवश्य बनेगा। संसद द्वारा इसे पारित किये जाने के बाद भी इस व्यवस्था को लागू करने के लिए कुछ विधानसभाओं का कार्यकाल घटाना पड़ेगा वहीं कुछ का बढ़ाया जायेगा। ईवीएम मशीनों के साथ ही चुनाव कार्य हेतु कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि बड़ी चुनौती होगी। सुरक्षा बलों की तैनाती भी समस्या बनेगी। कुल मिलाकर इतने बड़े और विविधता भरे देश में एक साथ चुनाव सरकार के साथ ही राजनीतिक दलों के लिए भी बेहद कठिन होगा। लेकिन ऐसा करना चूंकि देश और लोकतंत्र दोनों के हित में है अतः इसको स्वीकार करना हर दृष्टि से लाभदायी है। श्री खरगे भले ही एक देश एक चुनाव की बात को संविधान और संघवाद के विरुद्ध बताएं किंतु ऐसा कहते समय वे भूल गए कि 1967 तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ ही होते थे। 1971 में इंदिरा गाँधी ने लोकसभा समय पूर्व भंग करवाकर मध्यावधि चुनाव करवाया और तभी से चुनाव की समय सारिणी गड़बड़ा गई। दरअसल जबसे लोकसभा और विधानसभा चुनाव अलग - अलग होने लगे तभी से संघवाद कमजोर होता दिखा जिसमें क्षेत्रीय दलों ने और योगदान दिया। इसी का दुष्परिणाम है कि विरोधी विचारधारा वाली राज्य सरकार केंद्र की सत्ता को चुनौती देने का दुस्साहस करती है। इसके पीछे चुनाव के दौरान उत्पन्न कटुता ही है। केंद्र और राज्यों में अलग - अलग दलों की सरकारें पहले भी रही हैं। पूर्वोत्तर के राज्यों में तो स्थानीय छोटे - छोटे दल शुरू से ही सत्ता के समीकरणों को प्रभावित करते आये हैं। तमिलनाडु में 1967 से क्षेत्रीय दलों का आधिपत्य बना हुआ है। प. बंगाल में 1977 के बाद पहले वामपंथी सरकार रही और उसके उपरांत तृणमूल नामक क्षेत्रीय दल की सत्ता है। जिन राज्यों के चुनाव लोकसभा के साथ होते हैं उनमें क्षेत्रीयता की भावना उतनी तेजी से नहीं उभरती। कई बार ऐसा भी हुआ कि एक साथ हुए चुनाव में लोकसभा और विधानसभा में अलग दल को मतदाताओं का समर्थन मिला। लेकिन जब अकेले राज्य के चुनाव होते हैं तो संघवाद को ठेंगा दिखाते हुए केवल स्थानीय मुद्दों पर जोर दिया जाता है। वर्तमान में केंद्र और राज्यों के बीच रिश्ते जिस हद तक बिगड़े उसमें अलग - अलग चुनाव सबसे बड़ा कारण है। उदाहरण के लिए उड़ीसा के विधानसभा चुनाव लोकसभा के साथ होते रहे और दोनों में अलग - अलग पार्टियों के जीतने के बाद भी केंद्र और राज्य के रिश्ते मधुर रहे। लेकिन अन्य राज्यों के साथ ऐसा नहीं है। सबसे बड़ी बात पूरे पाँच वर्ष कहीं न कहीं चुनावी कार्यक्रम होने से देश नीतिगत अस्थिरता में फंस जाता है। केंद्र सरकार को कोई बड़ा निर्णय लेने से पहले चुनावी समीकरणों की चिंता करनी पडती है। क्षेत्रीय दल भी अपनी जीत के लिए ऐसे वायदे कर देते हैं जो राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध होते हैं। केंद्र द्वारा लागू की गई अनेक नीतियों को राजनीतिक वैमनस्य के चलते राज्यों द्वारा उपेक्षित किया जाता है। चुनावी खर्च चूंकि चंदे से होता है इसलिए राजनीतिक दल चंदा देने वालों को उपकृत करने बाध्य होते हैं। इलेक्टोरल बॉण्ड के जरिये कांग्रेस से अधिक चंदा कुछ क्षेत्रीय पार्टियों ने बटोरा। यदि पूरे देश में एक साथ लोकसभा - विधानसभा चुनाव की व्यवस्था हो सके तो राजनीतिक स्थायित्व कायम हो सकेगा। साथ ही भ्रष्टाचार पर भी काफी हद तक रोक लगाना संभव होगा। सरकार का जो खर्च चुनाव व्यवस्था पर होता है उसमें बचत के अलावा प्रशासनिक मशीनरी की तैनाती से होने वाले कामकाज के नुकसान को भी रोका जा सकेगा। कुल मिलाकर केंद्रीय मंत्री परिषद ने जिस प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान की वह लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने के साथ ही निरंतर चलने वाली सियासी अखाड़ेबाजी पर भी विराम लगायेगा। देशहित इसी में है कि इसका दलगत मतभेदों से ऊपर उठकर समर्थन किया जाए जिससे चुनाव प्रणाली में आम जनता का विश्वास और बढ़े।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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