Thursday, 26 September 2024

राहुल के बयान से कश्मीर घाटी के अलगाववादियों का हौसला बढ़ेगा



कांग्रेस समर्थक प्रचार माध्यम लगातार ये दावा कर रहे हैं  कि राहुल गाँधी काफी परिपक्व हो गए हैं। संसद में उनके भाषणों के आधार पर ये अवधारणा बनाने का प्रयास भी जारी है कि  वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकल्प के तौर पर  स्थापित हो गए हैं। उनकी हालिया अमेरिका यात्रा में इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा ने भारतीय श्रोताओं के सामने कहा कि राहुल पप्पू  नहीं अपितु एक कुशल रणनीतिकार हैं। कोई पार्टी अपने नेता को महिमामंडित करे तो आश्चर्य नहीं होता। लेकिन ये नेता पर निर्भर है कि वह अपने को उस कसौटी पर साबित करे।  लोकसभा चुनाव में मिली 99 सीटों को लेकर श्री गाँधी में जो  उत्साह उत्पन्न हुआ वह पूरी तरह सही है किंतु अभी भी वे कुछ न कुछ ऐसा कह जाते हैं जिससे उनकी छवि तो खराब होती ही है , कांग्रेस को भी रक्षात्मक हो जाना पड़ता है। अमेरिका यात्रा में भी उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था और जातिगत जनगणना के मुद्दे पर जो टिप्पणियाँ कीं वे बेहद गैर जिम्मेदाराना थीं। वहाँ से लौटने के बाद भी वे जिस तरह से  बयानबाजी कर रहे हैं उससे उनके परिपक्व होने पर संदेह होता है। गत दिवस जम्मू कश्मीर चुनाव  में कांग्रेस का प्रचार करते हुए उन्होंने कह दिया कि भाजपा ने जम्मू कश्मीर से पूर्ण राज्य का दर्जा इसलिए छीना क्योंकि वह उप राज्यपाल के जरिये बाहरी लोगों से राज्य को चलाना चाहती थी। जब तक वे यहाँ रहेंगे जम्मू कश्मीर के खर्चे पर बाहरी लोगों को लाभ मिलता रहेगा। उनका यह कथन कश्मीर घाटी के अलगाववादियों के बयानों का समर्थन करने वाला है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के नाते उनको  इतना ज्ञान तो होना ही चाहिए कि देश के हर राज्य में राज्यपाल और  केंद्र शासित प्रदेश में उपराज्यपाल की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है। राष्ट्रपति शासन लगने पर विधानसभा के अधिकार भी संसद में निहित हो जाते हैं।  श्री गाँधी ने उपराज्यपाल के बाहरी होने का मुद्दा छेड़कर व्यर्थ की बहस को जन्म दे दिया। राज्यपाल अथवा उपराज्यपाल की नियुक्ति करते समय जाहिर तौर पर केंद्र की सत्ता में बैठी पार्टी अपने अनुकूल व्यक्तियों का चयन करती है। लेकिन वे उसी राज्य के हों ये न तो संवैधानिक तौर पर जरूरी है और न ही संघीय ढांचे की मजबूती के लिये। कांग्रेस जब - जब केंद्र की सत्ता में रही तब उसने जम्मू कश्मीर में जिन राज्यपालों को पदस्थ किया उनमें डाॅ. कर्णसिंह को छोड़कर सभी अन्य राज्यों के थे। श्री गाँधी द्वारा जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलवाने के लिए केंद्र पर दबाव बनाने की जो बात कही उस पर किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए। वह इस चुनाव का वह प्रमुख मुद्दा भी  है किंतु उपराज्यपाल को बाहरी व्यक्ति बताना संघीय ढाँचे की व्यवस्था को ध्वस्त करने का प्रयास माना जायेगा। उनके ऐसे ही बयानों के कारण उनकी राजनीतिक समझ पर संदेह होने लगता है। ऐसा कहते समय वे भूल गए कि जम्मू कश्मीर में सबसे लंबा राष्ट्रपति शासन 1990 से 96 तक लगा था। 6 वर्ष 264 दिन की उस अवधि के दौरान केंद्र में  5 साल कांग्रेस और शेष समय उसके समर्थन वाली सरकार थी। तब कश्मीर के अलगाववादी नेता और संगठन जो बातें कहते थे उन्हीं को श्री गाँधी ने एक तरह से दोहरा दिया। इस चुनाव में भी अनेक नेता जम्मू कश्मीर के भविष्य का फैसला वहीं की जनता की मर्जी पर छोड़ने की बात बोल रहे हैं। कांग्रेस की गठबंधन सहयोगी नेशनल काँफ्रेंस खुलकर धारा 370 की वापसी का वायदा कर रही है। कांग्रेस भले ही इस मुद्दे पर शांत है किंतु उसमें इस वायदे का विरोध करने का साहस भी नहीं है। शायद इसीलिए नेशनल काँफ्रेंस को वह बोझ लगने लगी। इसका प्रमाण उसके नेता उमर अब्दुल्ला द्वारा राहुल गाँधी को कश्मीर घाटी की बजाय जम्मू अंचल में ध्यान केंद्रित करने की नसीहत दिये जाने  से मिला। उन्होंने ये आरोप भी लगाया कि कांग्रेस को जम्मू क्षेत्र में ज्यादा सीटें दी गईं थीं किंतु उसने वहाँ काम शुरू ही नहीं किया जबकि मतदान को कुछ दिन ही शेष हैं। श्री अब्दुल्ला के इस बयान को गठबंधन में दरार  के तौर पर देखा जा रहा है। उल्लेखनीय है अब्दुल्ला परिवार इस बार गठबंधन के पक्ष में नहीं था किंतु राहुल पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को लेकर श्रीनगर गए और उसके लिए दबाव बनाया। लेकिन दूसरे चरण तक अब्दुल्ला परिवार को गलती का एहसास होने लगा जिसकी बानगी उमर द्वारा  नाराजगी व्यक्त किये जाने से मिली। इसके बाद भी यदि कांग्रेस को समझ नहीं आ रही तो ये उसकी इच्छा किंतु श्री गाँधी यदि इसी तरह के गैर जिम्मेदराना बयान देते रहे तो इससे उन्हें और उनकी पार्टी दोनों को नुकसान होगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

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