Monday, 16 September 2024

आम आदमी पार्टी और केजरीवाल की छवि पहले जैसी नहीं रही


दिल्ली के मुख्यमंत्री ने गत दिवस ऐलान कर दिया कि वे मंगलवार को अपने पद से त्यागपत्र दे देंगे और जनता की अदालत से निर्दोष साबित होने के बाद ही गद्दी पर आसीन होंगे। उन्होंने ये घोषणा भी कर दी कि पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया भी कोई पद नहीं लेंगे। नया मुख्यमंत्री कौन होगा इस पर रहस्य बनाकर रखा गया है। जिन नामों की चर्चा हो रही है उनमें श्री सिसौदिया ही ऐसे  हैं जिनको  विकल्प माना जाता रहा है किंतु  अरविंद केजरीवाल की  राजनीतिक शैली पूरी तरह से आत्मकेंद्रित है जिसमें संगठन और सत्ता दोनों पर एकाधिकार बनाये रखा जाता है। इसीलिए मुख्यमंत्री पद छोड़ने की घोषणा के साथ ही उन्होंने अपने सबसे निकटस्थ श्री सिसौदिया का रास्ता भी रोक दिया।  अब सवाल उठता है कि  जब उन्होंने जेल जाने के बाद भी इस्तीफ़ा नहीं दिया तब जमानत मिलने के बाद अचानक सत्ता त्याग करने का भाव उनके मन में कहाँ से आ गया ? और इसका सीधा - सीधा जवाब ये है कि अदालत द्वारा कार्यालय नहीं जाने और किसी फाइल पर हस्ताक्षर नहीं करने से रोक दिये जाने से आगामी विधानसभा चुनाव के पूर्व वे न तो नीतिगत निर्णय ले सकेंगे और न ही लोक - लुभावन घोषणाओं को लागू कर सकेंगे। ऐसे में किसी जनाधारविहीन व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाकर वे चुनाव तक शराब घोटाले से धूमिल हुई छवि को सुधारने का प्रयास करेंगे । उनकी चिंता का बड़ा कारण ये भी है कि लोकसभा चुनाव के पहले न चाहते हुए भी उन्हें जिस इंडिया गठबंधन में शामिल होना पड़ा उससे भी  नाता टूट चुका है। जिसके चलते हरियाणा में  कांग्रेस के साथ उसका गठबंधन नहीं हुआ। दरअसल श्री केजरीवाल को इस बात की चिंता सताने लगी है कि लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सातों सीटें भाजपा ने जीत लीं। हालांकि 2014 और 2019 में भी ऐसा हो चुका है लेकिन तब कांग्रेस भी अलग से लड़ी थी ।  2024 के मुकाबले में  दोनों मिलकर लड़ने के बाद भी भाजपा के वर्चस्व को नहीं तोड़ सके जबकि विधानसभा और दिल्ली नगर निगम में आम आदमी पार्टी का कब्जा है। यही बात श्री केजरीवाल को चिंतित कर  रही है। पंजाब में भी विधानसभा चुनाव की ऐतिहासिक जीत को वे लोकसभा चुनाव में नहीं दोहरा सके। इसमें दो मत नहीं हैं कि दिल्ली का गढ़ अब पार्टी के लिए उतना मजबूत नहीं रहा। पिछले नगर निगम चुनाव में आम आदमी पार्टी के 134 पार्षद जीते जबकि भाजपा ने 106 सीटें जीतकर उसे कड़ी टक्कर दी।   हाल ही में निगम के 12 ज़ोन समितियों के चुनाव में भाजपा ने  7 ज़ोन में जीत हासिल कर निगम के वित्तीय प्रबंधन का नियंत्रण हासिल कर लिया।  श्री केजरीवाल  को ये बात अच्छी तरह समझ आ गई थी कि शराब घोटाले का निपटारा जल्द होने वाला नहीं है। ऐसे में उन्हें आये दिन अदालत में हाजरी देनी पड़ सकती है। और बड़ी बात नहीं दोबारा जेल जाना पड़े। ये भी सत्य है कि उनके और श्री सिसौदिया के जेल चले जाने से दिल्ली सरकार का कामकाज बुरी तरह प्रभावित हुआ। कैबिनेट की बैठकें नहीं होने से नीतिगत निर्णय लंबित होते गए। इसका असर विकास कार्यों पर भी पड़ा। जिन मोहल्ला क्लीनिक और शालाओं के कारण दिल्ली सरकार की जमकर तारीफ होती थी उनकी दशा भी खराब होने लगी। सबसे बड़ा नुकसान हुआ शराब नीति के लागू किये जाने से बढ़ी शराबखोरी से। दरअसल शराब सस्ती होने से दिल्ली में शराब की खपत में बेतहाशा वृद्धि हुई जिसका दुष्परिणाम सामाजिक वातावरण पर पड़ा। लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत में शराब नीति के विरोध में बना जनमत भी सहायक साबित हुआ। ये सब देखते हुए श्री केजरीवाल के सामने पद त्यागने के सिवाय और कुछ रास्ता था भी नहीं। जमानत पर बाहर आने के बाद भी उनकी स्थिति दाँत और नाखून विहीन शेर सरीखी थी। यद्यपि सत्ता से प्रत्यक्ष तौर पर हटने के बाद भी सरकार तो वे ही चलाएंगे और ऐसे किसी व्यक्ति को गद्दी पर बिठाएंगे जो भविष्य में चंपई सोरेन न बन जाए।  जल्दी चुनाव करवाने की उनकी योजना भी फ़िलहाल कारगर होती नहीं लगती। इसलिए अब वे कुर्सी में उलझे रहने के बजाय जनता के बीच जाकर छवि को हुए नुकसान की भरपाई करने का प्रयास करेंगे। उसमें उन्हें कितनी सफलता मिलेगी ये तो समय बताएगा किंतु जिस तरह पार्टी विथ डिफरेंस का भाजपाई दावा अपनी चमक खो बैठा ठीक वैसे ही आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल की जो छवि भ्रष्टाचार विरोधी की बनी थी उसमें जबरदस्त कमी आई है। जिन भ्रष्ट नेताओं की सूची श्री केजरीवाल जारी किया करते थे उनके ही साथ उन्होंने गठबंधन कर लिया। दिल्ली शराब घोटाले की शिकायत कांग्रेस ने ही की थी और जब श्री सिसौदिया और श्री केजरीवाल गिरफ्तार हुए तो उसने उसका स्वागत भी किया। आज ही दिल्ली के वरिष्ट कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने उन पर हमला बोला है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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