मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व महासचिव सीताराम येचुरी के निधन से वामपंथी राजनीति का एक मजबूत स्तंभ ढह गया। स्व. सीताराम एक मेधावी छात्र रहे और दिल्ली के प्रसिद्ध जेएनयू से स्नातकोत्तर उपाधि अर्जित की । छात्र जीवन से ही उनका झुकाव साम्यवादी विचारधारा के प्रति हो गया था। स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया से जुड़कर वे जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष भी रहे। साम्यवादी राजनीति के सीपीएम धड़े से संबद्ध होने के कारण आपातकाल में जेल भी गए। उल्लेखनीय है सीपीआई नामक साम्यवादी पार्टी ने इंदिरा गाँधी द्वारा लगाए गए आपातकाल का समर्थन किया था। बाद में श्री येचुरी सीपीएम के महासचिव भी बने जो पार्टी संगठन में सबसे बड़ा पद होता है। पार्टी ने उन्हें प. बंगाल से राज्यसभा में भेजा जहाँ प्रभावशाली प्रदर्शन के आधार पर उन्हें सर्वश्रेष्ठ सांसद भी चुना गया। सांसद और पार्टी महासचिव न रहने के बाद भी वे राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा विरोधी खेमे को एकजुट करने में लगे रहते थे। यद्यपि वामपंथी विचारधारा का प्रभाव धीरे - धीरे लुप्त होने लगा किंतु श्री येचुरी अपनी सक्रियता के कारण विपक्षी राजनीति के एक महत्वपूर्ण रणनीतिकार बने रहे। प. बंगाल में वामपंथी सत्ता के पराभव के बाद केवल केरल में ही साम्यवादी सरकार बच रही है। लेकिन एक विरोधाभास जो देखने मिलता है वह है उक्त दोनों राज्यों में सीपीएम और कांग्रेस के बीच का रिश्ता। प. बंगाल में जहाँ वामपंथी और कांग्रेस ममता बनर्जी के विरुद्ध एकजुट हैं वहीं केरल में एक दूसरे के विरोध में हैं। इसकी वजह ये रही कि स्व. येचुरी जहाँ भाजपा के विरोध में कांग्रेस सहित शेष विपक्ष से निकटता के पैरोकार रहे वहीं सीपीएम के एक और कद्दावर नेता प्रकाश कारत अपनी कट्टरवादी सोच के चलते एकला चलो की सोच रखते थे। प. बंगाल में ज्योति बसु , सोमनाथ चटर्जी और बुद्धदेव भट्टाचार्य का दौर समाप्त होने के बाद वहाँ स्व. येचुरी का प्रभाव बढ़ा जबकि श्री कारत के चलते केरल में वामपंथी मोर्चा कांग्रेस और भाजपा दोनों को राजनीतिक दुश्मन समझता है। हालिया लोकसभा चुनाव में प. बंगाल में वामपंथी और कांग्रेस एकजुट होकर ममता बनर्जी के विरुद्ध लड़े। वहीं केरल में वामपंथियों और कांग्रेस में मुकाबला हुआ। यहाँ तक कि वायनाड सीट पर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के विरुद्ध सीपीआई दिग्गज डी. राजा की पत्नी खड़ी हो गईं। वामपंथी मोर्चे ने श्री गाँधी से इस सीट से न लड़ने का आग्रह भी किया। ये सब तब हुआ जब राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस, वामपंथी और ममता बनर्जी इंडिया गठबंधन में शामिल होकर भाजपा को रोकने एकजुट थे। वामपंथी विचारधारा के प्रति घटते रुझान का कारण यही विरोधाभासी नीति थी किंतु ये भी सही है कि राष्ट्रीय राजनीति में उसकी उपस्थिति जिस एक शख्स के कारण बनी हुई थी वह सीताराम येचुरी ही थे। उनके महत्व का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि नेपाल में माओवादी सत्ता काबिज हो जाने के बाद जब वहाँ के वामपंथी नेताओं में आपसी मतभेद उभरे तब मध्यस्थता के लिए स्व. येचुरी को बुलाया गया। इसका कारण उनकी समझ और राजनीतिक अनुभव ही था। उनके साथ असहमति रखने वाले श्री कारत का मानना रहा कि भाजपा के अंध विरोध में कांग्रेस और सपा तथा राजद जैसे जातिवादी दलों के पिछलग्गू बने रहने से वामपंथी आंदोलन कमजोर हो रहा है। जेएनयू के अध्यक्ष रहे चर्चित वामपंथी छात्र नेता कन्हैया कुमार का कांग्रेस में जाना इसका उदाहरण बन गया। लेकिन स्व. येचुरी को वामपंथी कट्टरता की बजाय भाजपा के विरोध में विपक्ष का एकीकरण ज्यादा पसंद था। दरअसल वे इस बात को भाँप चुके थे कि वामपंथी दल राष्ट्रीय राजनीति की मुख्यधारा में कभी नहीं लौट सकेंगे। केरल के अलावा चंद विश्वविद्यालयों की छात्र राजनीति में ही उनका प्रभाव शेष रह गया है। प. बंगाल में अब वह स्थानीय निकाय जीतने योग्य भी नहीं बचे। लोकसभा और विधानसभा चुनाव जीतना तो दूर रहा। प. बंगाल में मुख्य विपक्षी दल बनने के बाद केरल में भी भाजपा जिस तेजी से तीसरी राजनीतिक ताकत बन रही है उसे देखते हुए वामपंथी राजनीति का भविष्य अंधकारमय लगता है। बावजूद इसके अपनी संपर्क शैली और लचीले स्वभाव के कारण स्व. येचुरी एक महत्वपूर्ण शख्सियत बने रहे। उन्होंने युवावस्था में वामपंथ का उभार भी देखा और प्रौढ़ावस्था में उसके ढलान पर जाने के भी साक्षी बने। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि दिल्ली की राजनीतिक बिरादरी में वे वामपंथ के अकेले चेहरे थे। उनका न रहना साम्यवादी विचारधारा की बड़ी क्षति है क्योंकि उनका कोई विकल्प फ़िलहाल नजर नहीं आता।
विनम्र श्रद्धांजलि।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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