Tuesday, 17 September 2024

हिंदुत्व के कमजोर होने का दुष्प्रचार देश विरोधी ताकतों का हौसला बढ़ा रहा


लोकसभा चुनाव के बाद देश में ऐसा माहौल बनाया  जा रहा  है कि हिंदुत्व अब राजनीति का केंद्र बिंदु नहीं रहा। इसके उलट  समूचा राजनीतिक विमर्श  जाति और अल्पसंख्यकों पर सीमित हो गया है। राहुल गाँधी तो जातिगत जनगणना का मुद्दा देश की सीमा से निकालकर अमेरिका तक ले गए । उ.प्र में भाजपा की सीटें कम होने को इस तरह पेश किया जा  रहा है मानो केंद्र में सत्ता परिवर्तन हो गया। फ़ैज़ाबाद लोकसभा सीट पर भाजपा की पराजय पर राम मंदिर तक का मज़ाक बनाया जा रहा है।  इस प्रचार का असर मुस्लिम समुदाय पर सबसे ज्यादा देखा जा सकता है जिसको ये लगने लगा है कि  जैसा  श्री गाँधी बोलते हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेहद कमजोर हो गए हैं और उनकी सरकार जल्द गिर जायेगी। यद्यपि  राजनेता इस तरह की शिगूफेबाजी करते ही रहते हैं । भाजपा भी अवसर मिलते ही श्री गाँधी को कठघरे में खड़ा करने का कोई अवसर नहीं गंवाती किंतु लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनने से उत्साहित होकर जिस तरह की बयानबाजी वे कर रहे हैं उससे कुछ लोगों को ये लगने लगा है मानो उन्हें कुछ भी करने की स्वच्छंदता मिल गई हो। रेल की पटरियों पर पत्थर और लोहे की सलाखें रखने जैसी हरकतें जिस तेजी से बढ़ीं वे उसी स्वच्छंदता का परिचायक हैं। वक्फ बोर्ड  संशोधन को लेकर भी मुस्लिम समुदाय के मध्य बेहद भड़काऊ गतिविधियां देखने मिल रही हैं। जम्मू कश्मीर में धारा 370 की वापसी की डींग विधानसभा चुनाव में हाँकी जा रही है जबकि उस बारे में कुछ भी करना केंद्र के अधिकार क्षेत्र में है। राम मंदिर पर सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट फैसले के बाद भी बाबरी मस्जिद को दोबारा बनाने जैसी बातें उछालकर देश का माहौल खराब करने का कुचक्र रचा जा रहा है। सबसे अधिक चिंता का विषय है हिन्दू धर्म स्थलों और धार्मिक आयोजनों पर पथराव और हमले होना। राजस्थान और गुजरात  से इसकी शुरुआत होने के बाद म.प्र में मुस्लिम समुदाय ने थाने पर हमला कर दिया। जब मुख्य अपराधी के अवैध निर्माण पर बुलडोजर चला तो यहाँ से लेकर दिल्ली तक आसमान सिर पर उठा लिया गया। वरिष्ट कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और जीतू पटवारी थाने पर हमले की निंदा करने के बजाय आरोपी के पक्ष में खड़े हो गए।  इस तरह की राजनीतिक शैली का ही परिणाम है कि गत दिवस म.प्र के तीन शहरों में मिलादुन्नबी जुलूस में शामिल लोगों द्वारा हिन्दू धर्मस्थलों पर पथराव के अलावा आपत्तिजनक गतिविधियां की गईं। लेकिन मुस्लिम तुष्टीकरण की रोटी खाने वाले नेता मुँह में दही जमाये बैठे हैं। इस प्रकार की घटनाओं को श्री गाँधी जैसे विपक्षी नेताओं का दुष्प्रचार ही प्रोत्साहन देता है  ।  आज मोदी सरकार ने अपने तीसरे कार्यकाल के 100 दिन पूरे कर लिए। प्रधानमंत्री इस दौरान पूरी तरह सक्रिय नजर आये। अपनी विकास संबंधी कार्ययोजना को वे जारी रखे हुए हैं। विदेशी मोर्चे पर भी उनका प्रभावशाली प्रदर्शन जारी है। अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में ठोस कदम उठाने से भी वे पीछे नहीं हट रहे। सहयोगी दलों के साथ भाजपा का अच्छा समन्वय होने से केंद्र सरकार के स्थायित्व पर लगाई गई अटकलें हवा - हवाई साबित हुईं जो विपक्ष को विचलित कर रही हैं। अमेरिका यात्रा में श्री गाँधी की गैर जिम्मेदार बयानबाजी से ये लगने लगा है कि लोकसभा की 99 सीटें जीतकर कांग्रेस जिस प्रकार मदमस्त हुई थी  वह नशा उतरने लगा है। लेकिन समाज के एक वर्ग विशेष में जो ज़हर चुनाव के दौरान और बाद में बोया उसके चलते देश को कमजोर करने वाली ताकतें सिर उठाने से बाज नहीं आ रहीं। म.प्र के तीन शहरों  में मिलादुन्नबी  जुलूस के दौरान जिस तरह का उपद्रव मुस्लिम समुदाय की ओर से हुआ  उसकी प्रतिक्रिया भी यदि वैसी ही हो जाती तब पूरा प्रदेश अशांत हो जाता। इसलिए कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं को चाहिए कि लोकसभा चुनाव के परिणाम को हिंदुत्व की भावना कमजोर होने के रूप में देखने की गलती न करें। उदाहरण के लिए हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में  बनी मस्ज़िद में किये गए अवैध निर्माण के विरुद्ध  हिन्दू  संगठन एकजुट होकर मैदान में उतर आये। पहले तो मौलवी  बात को घुमाते रहे और प्रदेश की कांग्रेस सरकार भी   उन्हें संरक्षण देती रही किंतु जब हिन्दू समुदाय का दबाव बढ़ा तब जाकर उसे तोड़ने की कारवाई करनी पड़ी। इससे उत्साहित हिन्दू संगठनों ने पूरे हिमाचल में अवैध रूप से बने मुस्लिम धर्मस्थलों के विरुद्ध मुहिम छेड़ दी है। इसका असर पूरे देश में होने की चर्चा सुनाई देने लगी है। बेहतर होगा विपक्षी नेताओं की शह पर उन्माद में आ रहे मुस्लिम इस बात को समझें कि उनको मोहरा बनाया जा रहा है। हिंदुत्व का आभामंडल  फीका पड़ने की खुशफहमी जिनके मन में है वे उसे जितनी जल्दी निकाल दें उतना अच्छा । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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