देश के सर्वाधिक प्रसिद्ध धर्मस्थलों में आंध्र प्रदेश स्थित तिरुपति देवस्थानम अग्रणी है। भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर देश का सबसे संपन्न धार्मिक संस्थान है। इसकी एक और प्रसिद्धि है इसमें प्रसाद के तौर पर मिलने वाला लड्डू। इसकी कीमत और आकार घटने - बढ़ने की चर्चा संसद तक में होती है। दुनिया भर से सनातन धर्म के अनुयायी यहाँ दर्शनों हेतु आते हैं। चढ़ोत्री में केवल नगदी ही नहीं वरन सोने - चाँदी और जवाहरात भी होते हैं। तिरूपति देवस्थानम द्वारा अनेक जनकल्याणकारी प्रकल्पों का भी संचालन होता है। बड़े - बड़े उद्योगपति , फिल्मी सितारे और राजनेता तिरुपति के प्रति आस्था रखते हैं। लेकिन इन दिनों इसकी चर्चा जिस वजह से है उसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रा बाबू नायडू ने आरोप लगाया है कि तिरुपति देवस्थानम में प्रसाद का जो लड्डू मिलता है उसमें मिलावटी घी का उपयोग किया जाता रहा। यहाँ तक तो फिर भी गनीमत थी लेकिन ये जानकर करोड़ों भक्तों को धक्का लगा कि मिलावटी घी में मछली के तेल के अलावा गाय और सुअर जैसे पशुओं की चर्बी तक थी। शिकायत आते ही तिरुपति प्रशासन द्वारा घी की जाँच हेतु उसके नमूनों को प्रयोगशाला में भेजा गया जिनकी रिपोर्ट में मिलावट की पुष्टि हो गई। हालांकि इस रिपोर्ट की प्रामाणिकता पर संदेह किया जा रहा है किंतु मामला तब ज्यादा विवादित हो गया जब राज्य के मुख्यमंत्री श्री नायडू ने पिछली सरकार के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी को इसके लिए कसूरवार ठहराते हुए आरोप लगा दिया कि उनके शासनकाल में तिरुपति में पशुओं की चर्बीयुक्त घी से बने लड्डू बनवाये गए। ये आरोप भी लगाया गया कि श्री रेड्डी ने हिंदुओं की आस्था के प्रमुख केंद्र के प्रशासनिक अधिकारी के पद पर ईसाई धर्मावलंबी को नियुक्त किया। उल्लेखनीय है जगन मोहन भी ईसाई हैं। श्री नायडू ने आश्वस्त किया कि अब तिरुपति में बनाये जा रहे प्रसाद के लड्डुओं के लिए गैर मिलावटी शुद्ध घी उपलब्ध करवाया जा रहा है। मामला चूंकि धार्मिक आस्था से जुड़ा हुआ है इसलिये उसकी चर्चा सर्वत्र हो गई। आलोचना और चिंता युक्त प्रतिक्रियाएं भी देखने मिल रही हैं। सोशल मीडिया में तो ऐसी खबरों पर सबसे अधिक सक्रियता नजर आती है। हालांकि श्री नायडू द्वारा लगाए आरोपों की सत्यता पर संदेह जताने वाले भी कम नहीं हैं क्योंकि वे राजनीतिक व्यक्ति हैं और कठघरे में खड़ा किया जा रहा नेता उनका प्रतिद्वंदी। श्री रेड्डी जब मुख्यमंत्री थे तब चंद्रा बाबू को जेल जाना पड़ा था। ऐसे में यदि वे प्रतिशोधवश उनको घेरने का दाँव चल रहे हों तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। लेकिन इस प्रकरण को केवल तिरुपति के लड्डुओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता क्योंकि मिलावट हमारे देश का चरित्र बन गई है। किसी धर्मस्थल में बनने वाले प्रसाद की शुद्धता और पवित्रता बरकरार रखना नितांत आवश्यक है किंतु देश में रहने वाले करोड़ों नागरिकों को शुद्ध खाद्य सामग्री उपलब्ध होना भी उतना ही जरूरी है। उस दृष्टि से ये कहना गलत न होगा कि सरकार द्वारा मिलावट रोकने के लिए की गई व्यवस्था पूरी तरह विफल और बिकी हुई है। तिरुपति की खबर आते ही सोशल मीडिया पर घी की कीमत और गुणवत्ता को लेकर जो प्रतिक्रियाएं आईं उनमें से अधिकांश में ये स्वीकार किया गया कि जिस कीमत पर विभिन्न ब्रांड का घी बाजार में उपलब्ध है उतने में शुद्धता संभव नहीं। इसी तरह खाद्य तेल, मसाले आदि में भी मिलावट किसी से छिपी नहीं है। उन्हें लंबे समय तक खराब होने से बचाने के लिए प्रयुक्त रासायनिक चीजें भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। डेरियों से आने वाले खुले दूध की शुद्धता तो सदैव संदिग्ध रही है। भैंसों को जो इंजेक्शन लगाए जाते हैं उनका दुष्प्रभाव भी उपभोक्ता पर पड़ता है। ये कहना गलत नहीं है कि चाहे स्थानीय हो या बड़े ब्रांड द्वारा बनाये गए खाद्य उत्पाद , सभी में मिलावट या नुकसानदेह चीजों का उपयोग हो रहा है। उपभोक्ता आंदोलन भी कुछ एन.जी.ओ के प्रचार तक सिमटकर रह गया है। सरकार के जिस विभाग पर इस समस्या को दूर करने का दायित्व है उसकी कार्यप्रणाली में ही बेईमानी मिली हुई है तो फिर जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ को कैसे रोका जा सकेगा, ये गंभीर प्रश्न है। मिलावट के लिए कठोर दंड का प्रावधान है लेकिन जिस बड़े पैमाने पर उसका कारोबार चल रहा है उसे देखते हुए दंडित किये जाने वालों की संख्या नगण्य है। हमारे देश में छोटी - छोटी बातों पर चका जाम कर दिया जाता है। धरना और घेराव भी आम बात है। लेकिन मिलावट के विरुद्ध कोई जनांदोलन शायद ही कभी सुनने में आया हो। किसी एक मामले के उजागर होने पर कुछ दिन चर्चा होने के बाद फिर सब भुला दिया जाता है। तिरूपति से उठे प्रकरण में चूंकि राजनेता शामिल हैं इसलिए हो सकता है बात किसी परिणाम तक पहुंचे वरना तो मिलावट को रोक पाने के तमाम प्रयासों की स्थिति वैसी ही है जैसी वाराणसी में गंगा शुद्धि हेतु चलाये गए अभियान की।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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