Saturday, 14 September 2024

अदालत ने केजरीवाल को पंख कटी चिड़िया बना दिया

आम आदमी पार्टी में उत्सव का माहौल है। उसके सबसे बड़े  नेता अरविंद केजरीवाल को सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली शराब घोटाले में जमानत जो दे दी। दो न्यायाधीशों में से एक ने उनकी गिरफ्तारी को  पूरी तरह वैध माना जबकि दूसरे ने ईडी द्वारा की गई  गिरफ्तारी पर  जमानत मिलने के पहले ही सीबीआई  द्वारा  गिरफ्तारी  को अनुचित मानते हुए उसे पिंजरे में बंद तोते की छवि से बाहर निकलने की समझाइश दे डाली। बस फिर क्या था श्री केजरीवाल को विजेता के तौर पर पेश किया जाने लगा। वे भी महाबली के अंदाज में खुद को पेश करते नजर आये। पार्टी के तमाम बड़े नेताओं ने इसे न्याय की जीत बताते हुए  अपने पुराने आरोप दोहराए। सर्वोच्च न्यायालय ने उनको रिहा तो कर दिया किंतु  जमानत की शर्तों के अनुसार वे  न तो मुख्यमंत्री कार्यालय जा सकेंगे और न ही किसी फाइल पर हस्ताक्षर करने की अनुमति उन्हें रहेगी। संदर्भित प्रकरण के बारे में टिप्पणी करने और  गवाहों से मिलने  पर भी रोक लगा दी गई है। साथ  ही 10 लाख रु. का बॉन्ड भी भरना होगा। भाजपा द्वारा उनसे  पद छोड़ने  की मांग किया जाना तो नितांत स्वाभाविक है किंतु कांग्रेस ने भी आम आदमी पार्टी द्वारा मनाई जा रही खुशी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने श्री केजरीवाल को दोषमुक्त नहीं किया केवल जमानत दी है। पार्टी प्रवक्ता आलोक शर्मा ने  अनुसार अभी आरोप पत्र दाखिल है और ऐसे में जमानत को क्लीन चिट नहीं माना जा सकता। यद्यपि कांग्रेस  अपनी प्रतिक्रिया को यहीं तक सीमित रखते हुए उनसे त्यागपत्र मांगने  से बची जिसका कारण संभवतः हरियाणा विधानसभा के चुनाव हैं जिनमें राहुल गाँधी की इच्छा के बावजूद दोनों पार्टियों में गठबंधन नहीं हो सका। चूंकि श्री केजरीवाल अपनी पार्टी के स्टार प्रचारक होंगे इसलिए कांग्रेस उन्हें ज्यादा नाराज नहीं करना चाहती क्योंकि आम आदमी पार्टी द्वारा उम्मीदवार उतारे जाने से भाजपा विरोधी मतों में विभाजन से कांग्रेस को नुकसान होने का खतरा बढ़ गया है । कुछ राजनीतिक विश्लेषक ये भी मान रहे हैं कि श्री केजरीवाल को जमानत मिलने के पीछे भी केंद्र सरकार का नर्म रवैया रहा। उसे लगने लगा था कि  मामले के निपटारे में लंबा समय लगेगा। चूंकि मनीष सिसौदिया , संजय सिंह और के. कविता सहित एक अन्य आरोपी जमानत पा चुके थे अतः श्री केजरीवाल को जेल में रखने का औचित्य नहीं बचा था। लेकिन  जेल रूपी पिंजरे से  बाहर आने के बाद भी उनकी स्थिति पंख कटी चिड़िया जैसी है । जिस मुख्यमन्त्री को अपने कार्यालय जाने की अनुमति न हो और न ही वह किसी फाइल पर हस्ताक्षर कर सकता हो उसका पद पर बना रहना मजाक ही है। लेकिन श्री केजरीवाल का रवैया समझ से परे है। उनमें यदि जरा भी स्वाभिमान होता तो वे अदालत में मांग रखते कि जमानत पर रिहा होने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में उनके दायित्वों का  निर्वहन करने का अधिकार मिले। लेकिन वे जेल से बाहर आने के लिए इतने आतुर थे कि  सभी शर्तों को सिर झुकाकर मान लिया। दिल्ली में आगामी वर्ष विधानसभा चुनाव होंगे। सवाल ये है कि क्या तब तक वहाँ की सरकार ऐसे मुख्यमंत्री के मातहत चलेगी जो शासन चलाने से वंचित कर दिया गया हो। स्वतंत्रता के बाद ये पहला अवसर है जब कोई मुख्यमंत्री जेल जाने के बाद भी गद्दी नहीं छोड़ रहा और अधिकार विहीन होने के बाद भी पद पर बना हुआ है। सही बात तो ये है कि श्री केजरीवाल ने पार्टी के भीतर वैकल्पिक नेतृत्व की गुंजाइश छोड़ी ही नहीं। बीच में तो उन्होंने पार्टी और सरकार चलाने का जिम्मा अनौपचारिक तौर पर अपनी पत्नी को सौंप दिया था जो जेल में उनसे मिलकर निर्देश लाती थीं। हालांकि जेल जाने के बाद लंबे समय तक मनीष सिसौदिया और सत्येंद्र जैन ने भी मंत्री पद नहीं छोड़ा था किंतु बाद में उनसे तो त्यागपत्र दिलवा दिया गया किंतु श्री केजरीवाल ने मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली करने का खतरा मोल नहीं लिया। हरियाणा विधानसभा चुनाव में पार्टी की ओर से जारी स्टार प्रचारकों की सूची में उनके बाद दूसरे स्थान पर उनकी पत्नी सुनीता केजरीवाल का नाम होना काफी कुछ कह जाता है। इस प्रकार श्री केजरीवाल जमानत पर बाहर आकर भी अदालत द्वारा  मुख्यमंत्री के रूप में कार्य करने से रोक दिये गए जो उनके गाल पर तमाचे से कम नहीं है। आम आदमी पार्टी चाहे कुछ भी कहे किंतु निचली अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक ने ईडी और सीबीआई द्वारा प्रस्तुत आरोप पत्र को रद्द करने से इंकार कर दिया। ऐसे में  जमानत पर जेल से बाहर आये श्री केजरीवाल अपनी पार्टी के नेता भले हों किंतु बतौर मुख्यमंत्री उनकी शक्तियां छीन ली गईं हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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