नेशनल काँफ्रेंस के वरिष्ट नेता डाॅ. फारुख अब्दुल्ला का साफ कहना है कि उनकी पार्टी धारा 370 को जम्मू कश्मीर के आगामी विधानसभा चुनाव में मुद्दा बनायेगी। उन्होंने माना कि अदालती फैसले उसको हटाने के पक्ष में आये किंतु पूर्व में हुए कुछ निर्णयों ने उसे स्थायी माना था। ये पूछे जाने पर कि उनकी चुनावी भागीदार कांग्रेस धारा 370 पर गोलमाल रवैये का प्रदर्शन करती है , डाॅ. अब्दुल्ला ने बचाव करते हुए कहा कि वह राष्ट्रीय पार्टी है जिसे पूरा देश देखना है। उनके उत्तर से स्पष्ट है कि राहुल गाँधी जम्मू कश्मीर के दौरे पर राज्यपाल शासन और केंद्र शासित प्रदेश बनाये जाने जैसे मुद्दे तो उठाते हैं किंतु धारा 370 को हटाये जाने के बारे में मौन क्यों साधे रहते हैं ? निश्चित रूप से मंहगाई, बेरोजगारी, कानून - व्यवस्था , स्वास्थ्य सेवाएं अन्य राज्यों की तरह से ही जम्मू कश्मीर में भी पूरी तरह प्रासंगिक मुद्दे हैं । लेकिन 2019 में केंद्र सरकार ने जिस तरह से राज्य का विशेष दर्जा समाप्त कर लद्दाख़ को अलग करते हुए जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य की बजाय केंद्र शासित राज्य बना दिया उससे घाटी के लोग नाराज बताये जाते हैं। लेकिन हिन्दू बहुल जम्मू में धारा 370 हटाये जाने का विरोध इसलिए कम दिखाई दिया क्योंकि इसके रहते घाटी में अलगाववाद का बोलबाला था। वहाँ लोगों के मन में अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार के साथ ही कुकुरमुत्ते जैसे पनप उठे अन्य पाकिस्तान समर्थक संगठनों द्वारा यह बात बिठाई जाती रही कि धारा 370 के रहने से उनको देर - सवेर जनमत संग्रह द्वारा ये फैसला करने का अवसर मिलेगा कि यह राज्य भारत के साथ रहेगा या पाकिस्तान में मिलना पसंद करेगा। लेकिन ये सच्चाई लोगों से छिपाई गई कि जिस सं. रा. संघ के निरीक्षण में जनमत संग्रह का प्रावधान था उसी ने ये निर्णय कर लिया कि कश्मीर विवाद भारत और पाकिस्तान का आपसी मामला है जिसमें तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप की कोई आवश्यता नहीं है। उसी के बाद श्रीनगर स्थित सं. रा. संघ के कार्यालय को बन्द कर दिया गया। जो अमेरिका और ब्रिटेन लंबे समय तक पाकिस्तान के पक्ष में बोलते रहे वे भी किनारा कर गए। ऐसे में जम्मू कश्मीर के पाकिस्तान जाने की संभावना लेश मात्र भी नहीं बची। पंडित नेहरू की सरकार ने जब स्व. शेख अब्दुल्ला को गद्दी से हटाकर नजरबंदी में रखा तब ही उन्हें धारा 370 खत्म करने का साहस दिखाना था। लेकिन बाद में उनकी बेटी इंदिरा गाँधी ने ही शेख को राज्य की सत्ता सौंप दी। उनके दोबारा ताकतवर होते ही घाटी में अलगाववाद के बीज पुनः अंकुरित होने लगे। वरना फारूक अपनी विदेशी पत्नी के साथ इंग्लैंड वासी हो चले थे। धारा 370 स्थायी थी या नहीं ये विवाद भी अब अर्थहीन हो चला है क्योंकि हर देश अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार समयानुकूल नीतियाँ बनाता है। आजादी के बाद जिन परिथितियों में धारा 370 का प्रावधान किया गया उनमें भारत विरोधी ताकतें तो सिर उठा रही थीं किंतु जैसा आतंकवाद नब्बे के दशक से वहाँ पनपा उसे रोकने के लिए उसे हटाया जाना निहायत जरूरी था क्योंकि सीमा पार से मिलने वाली सहायता ने आतंकवाद को घाटी में कुटीर उद्योग की शक्ल में विकसित कर दिया था। ऐसे में डाॅ. अब्दुल्ला जिस तरह की बातें धारा 370 को लेकर कह रहे हैं उसके बारे में राहुल गाँधी को अपनी नीति स्पष्ट करनी चाहिए क्योंकि जैसी संभावना सर्वेक्षण एजेंसियां जता रही हैं उसके अनुसार नेशनल काँफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन के सत्ता में आने के आसार हैं। उसकी बागडोर निश्चित रूप से फ़ारुक या उनके बेटे उमर अब्दुल्ला के हाथ में होगी। यदि वे विधानसभा में धारा 370 और जनमत संग्रह पर अपना पुराना रवैया दोहराएंगे तब क्या कांग्रेस उनके साथ खड़ी होगी ? उल्लेखनीय है निकट भविष्य में अनेक राज्यों में विधानसभा चुनाव होना हैं। जिनमें धारा 370 को लेकर कांग्रेस को अपना रुख स्पष्ट करना होगा क्योंकि राष्ट्रीय पार्टी होने के कारण ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर वह जम्मू कश्मीर में अलग नीति पर चले और उसके बाहर उसके उलट ये संभव नहीं क्योंकि संचार क्रांति के इस युग में मतदाता से ऐसी बातें छिपी नहीं रहतीं। और ये भी सब जानते हैं कि फारुख अब्दुल्ला अपने मरहूम पिता की तरह ऊपर से कितना भी दिखावा करें किंतु उनके मन में भारत से जरा सा भी प्रेम नहीं है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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