Monday, 2 September 2024

प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा न्यायपालिका से की गई अपेक्षाओं का कोई असर नहीं होने वाला


राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का ये कहना पूरी तरह सही है कि ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब न्यायालय जाने से हिचकते हैं क्योंकि उनके मन में ये बात बैठ गई है कि अदालत जाने के बाद उनका जीवन तनाव पूर्ण हो जायेगा। जिला न्यायपालिका के राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र  में बोलते हुए उन्होंने कहा कि दुष्कर्म जैसे अपराधों में जब दशकों तक न्याय नहीं होता तो लोगों में ये अवधारणा प्रबल होती है कि  न्यायपालिका में  संवेदनशीलता खत्म हो चुकी है। उन्होंने सुनवाई टालते रहने की प्रवृत्ति को समाप्त करने की अपेक्षा भी व्यक्त की। सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी भी इसी आशय के विचार व्यक्त कर चुके थे। देश की दो सबसे बड़ी संवैधानिक हस्तियों द्वारा कही गई उक्त बातों में कुछ भी नया नहीं है क्योंकि आम नागरिक के मन में न्यायपालिका की ऐसी ही छवि बन चुकी है। हाल ही में कुछ चर्चित मामलों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निचली अदालतों को फटकार लगाते हुए कहा गया था कि वे अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए मामला ऊपरी अदालतों के लिए छोड़ देते हैं। मुख्य न्यायाधीश डी. वाय. चंद्रचूड़ तो इस बारे में खुलकर बोलते आ रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय पर भी ये तोहमत लगती रही है कि कुछ दिग्गज अधिवक्ताओं को वहाँ विशेष महत्व मिलता है। राजनेता और धनवान लोग उन अधिवताओं की मोटी फीस चुकाकर अपने पक्ष के मामले में तो जल्द  सुनवाई करवा लेते हैं वहीं  विरुद्ध चल रहे प्रकरणों में पेशियाँ बढ़वाकर न्याय प्रक्रिया को विलंबित करते हैं। इससे न्यायपालिका की छवि को तो बट्टा लग ही रहा है न्यायाधीशों के प्रति भी आम जनता के मन में जो सम्मान का भाव था उसमें कमी आ रही है। वकीलों की बढ़ती फीस भी न्याय प्राप्ति में बड़ी बाधा है। दीवानी प्रकरणों के निपटारे की कोई समय सीमा नहीं है और फौजदारी में जमानत हासिल करने के लिए  मुँह मांगी फीस चुकाना हर किसी के बस में नहीं। किसी वी. आई. पी की गिरफ्तारी में निचली अदालत से जमानत रद्द होते ही ऊपरी अदालत में फौरन तारीख मिल जाती है जबकि साधारण व्यक्ति को महीनों इंतजार करना होता है। यही वजह है कि कानून के रास्ते  पर चलने वाले साधारण नागरिक की न्यायपालिका में आस्था कम हो रही है वहीं कानून तोड़ने का दुस्साहस करने वालों के मन में उसके प्रति खौफ बचा ही नहीं । इस स्थिति के लिए वकील ज्यादा जिम्मेदार हैं या न्यायाधीश इस पर बहस हो सकती है किंतु कुछ हद तक दोनों की जिम्मेदारी बनती है। बलात्कार जैसे घिनौने अपराध के लिए मृत्यदंड का प्रावधान होने के बाद भी वह रुकने का नाम नहीं ले रहा। प. बंगाल में ममता बैनर्जी की सरकार दुष्कर्म के विरुद्ध कोई नया कानून विधानसभा में लाने जा रही है । विपक्षी दल भाजपा ने भी उसको समर्थन देने की घोषणा कर दी। इसके पहले ममता ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर बलात्कार पर मृत्युदंड   देने संबंधी कानून बनाने की मांग भी की थी। लेकिन इस तरह की कोशिशें भी महज दिखावा है जो दुष्कर्म की हर बड़ी वारदात के बाद किया जाता है। कोलकाता में हाल ही में एक महिला चिकित्सक की बलात्कार के बाद हत्या  देश भर में चर्चा का विषय बन गई। उसे लेकर वैसा ही गुस्सा फूट पडा जैसा बरसों पहले दिल्ली में निर्भया काण्ड के बाद देखने मिला था। उस काण्ड के बाद  बलात्कार के मामलों में निचली अदालतों ने बिजली जैसी फुर्ती से निपटारे किये। कुछ में तो  एक महीने के भीतर ही मृत्यदंड तक दे दिया गया। लेकिन वह उत्साह  क्षणिक ही था। न तो दुष्कर्म  रुके और न ही अदालतों की वह तेजी बरकरार रही। ये देखते हुए प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा न्यायपालिका को जो नसीहत दी गई वह भी उस सम्मेलन में उपस्थित  प्रतिनिधियों के एक कान से घुसने के बाद दूसरे से निकल गई होगी। कोलकाता कांड से राज्य सरकार की छवि पर लगे धब्बे  प्रस्तावित कानून के पारित होने पर भी नहीं साफ होने वाले। सही बात तो ये है कि जनता को सस्ता और जल्द न्याय दिलवाने के प्रति सबंधित कोई भी पक्ष ईमानदार नहीं है। कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका तीनों अपने आप में मस्त हैं। उन्हें न्याय व्यवस्था में कमी और खामी तभी नजर आती है जब उससे उनका कोई अहित हो रहा हो। जहाँ तक बात जनता  की है तो उसकी तकलीफ सुनने की फुर्सत किसी के पास नहीं। इस आधार पर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा न्यायपालिका से की गई अपेक्षाएं कुछ दिन के बुद्धिविलास के उपरांत हवा - हवाई होकर रह जाएंगी क्योंकि पहले भी ऐसा होता रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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