दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन का अब छात्रों से कोई लेना - देना नहीं रहा। इसे शांतिपूर्ण कहना भी हास्यास्पद है। जिस तरह शालीन बाग में धरने के पीछे अलगाववादी ताकतें सक्रिय रहीं उसी तरह किसानों के साल भर चले धरने में धीरे - धीरे खालिस्तानी अलगाववादी घुस आये जिसकी परिणिति लाल किले पर खालिस्तानी झंडा फहराने के तौर पर हुई। यही स्थिति इस आंदोलन की है जिसमें असली छात्र कितने हैं ये जाँच का विषय है। ये बात इसलिए उठी क्योंकि प्रश्न पत्र लीक होने पर दोबारा हुई नीट परीक्षा के परिणाम घोषित होने के बाद सफल हुए छात्र भविष्य की तैयारी में लग गए । नया शैक्षणिक सत्र प्रारंभ होने से भी अन्य छात्र प्रवेश आदि में व्यस्त हैं। किसी राजनीतिक दल के छात्र संगठन ने भी जंतर मंतर आंदोलन से जुड़ने में रुचि नहीं दिखाई। आम आदमी पार्टी को छोड़ अन्य कोई राजनीतिक दल भी सक्रिय रूप से सामने नहीं आया। धरना स्थल पर आकर अपनी मौजूदगी की औपचारिकता जरूर अनेक नेताओं ने दिखाई किंतु 20 जुलाई को संसद भवन की तरफ बढ़ती भीड़ पूरी तरह नेतृत्वविहीन होने से अराजक हो उठी। इस तरह के आंदोलन जब भी हुए उनका नेतृत्व करने वाले आगे - आगे रहते थे। लेकिन 20 जुलाई को जंतर मंतर पर मंच लूटने वाले कथित छात्र हितैषी छू मंतर हो गए। भीड़ को संसद भवन में घुसने के लिए उकसाकर कॉकरोच जनता पार्टी के नामचीन चेहरे कहाँ रहे इसका जवाब उन्हें देना चाहिए। एक को तो बर्गर खाने के अपराध में प्रवक्ता पद से हटा दिया किंतु कुछ युवाओं ने ही पकड़कर उसके वीडियो बना लिए वरना उसे भी न हटाया जाता। कहा जा रहा है दो नेताओं को जगत प्रकाश नड्डा ने अपने निवास पर रोके रखा लेकिन पार्टी के सबसे बड़े चेहरे अभिजीत संसद जाने वाले जत्थों के अग्रिम भाग में क्यों नहीं दिखे ? हर आंदोलन में बेगानी शादी में अब्दुल्ला बनकर कूदने वाले योगेंद्र यादव एक कोने में खड़े अपना वीडियो बनवाते रहे। मुंबई से अभिनेता नसीरुद्दीन शाह भी अपने दो बेटों को जंतर मंतर लेकर आये किंतु जब लाठीचार्ज हुआ तब वे कहां थे कोई नहीं जानता। नीले झंडों के साथ जय भीम का नारा लगाने वाली भीड़ भीम आर्मी के नेता सांसद चंद्रशेखर रावण लेकर आये थे किंतु पुलिस की कारवाई से बचने वे भी भीड़ से दूर रहे। अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसौदिया, आतिशी भी आग में पेट्रोल डालकर दूर बैठ गए। कुल मिलाकर आंदोलन को अराजक तत्वों के हाथ सौंपकर तमाम नेता पीछे रह गए। यही वजह है कि वे पिटने से भी बचे और उनके विरुद्ध कोई प्रकरण भी दर्ज नहीं हुआ। उस घटनाक्रम के बाद जो राजनीति हो रही है उसमें न तो शिक्षा प्रणाली में सुधार की चिंता है और न ही छात्रों के हित की क्योंकि आंदोलन की कमान पेशेवर आंदोलनजीवियों के हाथ में है जिन्हें छात्र राजनीति का धेले भर अनुभव नहीं है। कॉकरोच जनता पार्टी अभी तक आम आदमी पार्टी को छोड़कर अधिकांश दलों के लिए अछूत बनी हुई है। राहुल गाँधी द्वारा प्रधानमंत्री आवास पर दिये धरने को आप सांसद संजय सिंह और आतिशी ने जिस तरह कांग्रेस और सरकार की जुगलबंदी करार दिया उससे स्पष्ट हो गया कि विपक्ष की राजनीति आपदा में अवसर तलाशने पर केंद्रित है। गत दिवस लोकसभा में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस सांसदों के बीच हुई कहा सुनी के पीछे भी श्रेय लूटने की प्रतिस्पर्धा ही थी। यद्यपि सरकार के सामने भी संकट कम नहीं हैं। विपक्ष की रणनीति उन महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित नहीं होने देने की है जिन पर भाजपा की आगामी व्यूह रचना निर्भर है। बीते काफी समय से अन्य पार्टियों में तोड़फोड़ मचाकर भाजपा दो तिहाई बहुमत का प्रबंध करने में जुटी थी। हालांकि धर्मेंद्र प्रधान को अभी तक नहीं हटाया जाना इस बात का संकेत है कि मोदी - शाह का आत्मविश्वास कायम है। लेकिन अंदरखाने की राजनीति का अंदाजा लगाना मुश्किल है। बात इतनी आगे बढ़ चुकी है कि किसी भी पक्ष के लिए पीछे लौटना आत्मघाती होगा। रही बात आंदोलनकारियों की तो वे खुद भ्रमित हैं। शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र की मांग तो पूरी हुई नहीं और वे प्रधानमंत्री को हटाने की मांग कर बैठे। सोनम वांगचुक भी अनिर्णय में फंसे हुए हैं। चूंकि सरकार के विरोध में खड़ी ताकतों में समन्वय और आपसी विश्वास नहीं है इसीलिए आंदोलन गैर जिम्मेदाराना तरीके से संचालित है। रोज शाम को जंतर मंतर पर दिखाई देने वाली अराजकता इसका प्रमाण है। चीन के साम्यवादी नेता माओ त्से तुंग ने कहा था क्रांति कोई चाय पार्टी नहीं है। लेकिन जंतर मंतर पर सुबह से रात तक पार्टियां देखी जा सकती हैं। वहाँ से जो वीडियो लगातार आ रहे हैं उनसे अनेक चेहरों के नकाब उतर चुके हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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