म.प्र विधानसभा का मानसून सत्र समय से पहले ही समाप्त होने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। सरकार द्वारा प्रस्तुत तमाम विधेयक होहल्ले के बीच पारित हो गए जिनमें समान नागरिक संहिता जैसा महत्वपूर्ण विधेयक भी था। बीते कुछ सालों से देखने मिल रहा है कि विधानसभा और संसद के सत्रों का ज्यादातर समय हंगामे की बलि चढ़ जाता है। विपक्ष अपनी कुछ मांगों को लेकर अड़ता है जिन्हें सत्ता पक्ष द्वारा नहीं माने जाने पर गतिरोध बना रहता है। अक्सर विपक्ष और आसंदी के बीच कहासुनी होने पर भी सदन स्थगित करने की नौबत आ जाती है। आम तौर पर सत्ता और मुख्य विपक्ष में टकराव से सदन की कारवाई बाधित होती है जिससे छोटे - छोटे दलों के सांसदों को अपने क्षेत्र के मुद्दे उठाने का अवसर नहीं मिल पाता। म.प्र विधानसभा को ही लें तो पिछली बार कोई भी सत्र पूरी अवधि तक कब चला, ये शायद ही कोई बता पायेगा। संसद के भी अनेक सत्र बिना कोई विधायी कामकाज किये ही पूरे हो गये और मौजूदा सत्र भी उसी ओर बढ़ता दिख रहा है। इस स्थिति के लिए दोनों पक्ष एक दूसरे को कसूरवार ठहराते हैं लेकिन सही बात ये है कि संसदीय प्रणाली के महत्व को कम करने में दोनों पक्षों का बराबर दोष है। सत्ता पक्ष को लगता है सदन जितना कम चले उतना उसके लिए हितकर है क्योंकि सदन स्थगित रहने से वह संवेदनशील मुद्दों पर जवाबदेही से बचने में सफल हो जाता है। हंगामे के माहौल में प्रश्नकाल तक स्थगित होता है जबकि इसके जरिये बहुत सी ऐसी जानकारियां उजागर होती हैं जो अन्यथा लोगों तक नहीं पहुँच पातीं। प्रश्नकाल में मंत्री द्वारा दिये उत्तर पर प्रश्नकर्ता सांसद पूरक प्रश्न भी पूछ सकता है। इस अवसर के छिन जाने से सांसदों के अधिकारों का हनन होने के साथ ही प्रश्नों के उत्तर तैयार करने में लगने वाले समय और संसाधन व्यर्थ चले जाते हैं। ये देखते हुए विपक्ष को ये सावधानी रखनी चाहिए कि प्रश्नकाल को स्थगित होने से बचाये। हालांकि वह ये कहकर बचना चाहता है कि सदन चलाना सरकार की जिम्मेदारी है किंतु ऐसा कहने मात्र से वह अपनी भूमिका के निर्वहन से नहीं भाग नहीं सकता। मसलन सत्र शुरू होते ही किसी मुद्दे पर तत्काल चर्चा की जिद सत्ता पक्ष द्वारा स्वीकार नहीं किये जाने पर सदन को नहीं चलने देने की गलती विपक्ष के लिए नुकसान दायक होती है। संसद के वर्तमान सत्र में भी यही देखने मिल रहा है। सत्र शुरू होने के पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सर्वदलीय बैठक बुलाकर सत्र के सुचारु रूप से संचालन पर आम सहमति बनाते हैं। लेकिन सत्र शुरू होने पर ऐसा लगता ही नहीं कि ये लोग दो दिन पहले बैठकर सदन चलाने के लिए मीठी - मीठी बातें कर रहे थे। सदन की कार्य सूची पहले से तैयार होती है। आकस्मिक घटनाओं और मुद्दों पर ध्यानाकर्षण और स्थगन प्रस्ताव लाये जा सकते हैं। लेकिन सब काम छोड़कर तुरंत चर्चा कराये जाने की मांग पूरी नहीं होने पर सदन को न चलने देने पर सरकार से ज्यादा हानि विपक्ष की होती है क्योंकि सत्ता पक्ष के पास तो अपनी बात रखने के तमाम साधन हैं जबकि विपक्ष के लिए संसद और विधानसभा ही हैं जहाँ से वे अपनी बात जनता तक पहुंचा सकते हैं। ये देखते हुए रणनीतिक तौर पर बेहतर होगा कि विपक्ष सदन को बाधित करने की गलती से बचे। वैसे भी व्यवधान के दौरान सरकार अपनी जरूरत के विधेयकों को पारित करवा ही लेती है किंतु विपक्ष उन पर अपनी राय रखने से वंचित रह जाता है। संसदीय प्रणाली की खूबसूरती सदन में होने वाली बहस में से ही उभरकर सामने आती है। देश की छवि भी इस बात से बनती है कि देश और जनता से जुड़े मुद्दों पर सत्ता और विपक्ष की सोच क्या है? वर्तमान परिदृश्य इस लिहाज से निराश करने वाला है क्योंकि संसद और विधानसभाओं में ऐसे प्रभावशाली सदस्य कम ही हैं जिनका भाषण उनके विरोधी भी ध्यान से सुना करते थे। आज देश में विश्वास का जो संकट है उसके लिए संसदीय प्रणाली की गिरती छवि भी बड़ा कारण है। भारत में भी बांग्लादेश और नेपाल जैसी अराजकता की आशंका के पीछे संसद के भीतर होने वाले हंगामे भी हैं। जनता के मन में ये बात बैठती जा रही है कि जनप्रतिनिधि केवल अपना और अपनों का ही भला सोचते हैं। इस अवधारणा को और प्रबल होने से रोकने के लिए संसदीय प्रणाली की पुरानी गरिमा की पुनर्स्थापना जरूरी है जिसका दायित्व किसी एक दल या नेता का न होकर सभी का है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
No comments:
Post a Comment